Sunday, April 28, 2024

७)पानी

 ७)पानी

लेखक: निशिकांत हारुगले.


पानी


महाराष्ट्र राज्य में पश्चीम घाट में अनेक गाव बसे हुवे है l यहा पर हरे भरे वादियों मे इतिहास की गाथा सुनाने वाले किल्ले पाये जाते हैl यहा पर पहाडी किल्ले के अआस पास बहुत सारे छोटे छोटे गावं पाये जाते है l महाराष्ट्र के दक्षिण मे स्थित एक जिल्हे मे एक किल्ला है l उसके आस पास छोटे छोटे से गावं बसे हुवे है l उन मे तीन गाव है l एक वनगाव, सोनगाव और तिसरा कडेगांव l वनगाव जो था वह किल्ले के नीचे बसा हुवा था l उसके नीच थोडी दूर पूरब की तरफ कडेगाव था l तो दुसरी तरफ पश्चिम की तरफ नीचे सोनगाव था l वनगाव के नीचे से एक नाला निकलकर सोनगाव और कडेगाव के बीच से होकर नदी की तरफ जाता था l बरसात के दिनो मे यह नाला इतना उफान पर होता की एक नदी के माफीक भाता l

 लेकिन शिशिर तथा वसंत ऋतू तक वह पुरी तरह सुख जाता l और यहा के गाव में पानी की दिक्कत हो जाती l यहा के लोगो को काम जो मिलता जो भी बरसात के चार महिने मे, वह भी खेत से, उसके बाद यहा के लोग नजदीक वाले शहर, या पूना, मुंबई को जाते l जो भी काम मिले वह करते l और अपना गुजारा करते l और गावं मे रहते सिर्फ बुढे बुजुर्ग तथा स्कूल मे पढने वाले बच्चे और औरतें l शिशीर ऋतू के दौरान गाव के देवता की यात्रा आ जाती l और शहर गये रोजी रोटी कमाने के लिये लोग गावं की तरफ आते l

हर साल की तरह इस साल भी वनगाव की यात्रा थी l शहर गये जवान लडके गावं की तरफ आने लगे थे l जब यात्रा का दिन आया, गाव मे पानी की किल्लत होणे लगी थी l गाव के लोग यात्रा के दिन ही पानी के लिये इधर उधर भटकणे लगे l यात्रा के दिन आये बाहर से मेहमान यह सब देखकर छि थू करने लगे l एक मेहमान ने जवान लडको के सामने दो बाते सुनाई की कैसे लोग है यहाँ के l यहा पर पानी की किल्लत है l कैसे इस गावं मे लडकी ब्याह के देगा कौन? यह बाते जवान लडको को बहुत ही चुभ गई l यात्रा के दुसरे ही दिन गाव की पंचायत की सभा बुलाई गई l गाव के सरपंच को उन्होंने भली बुरी सुनाई l इस समस्या के बारे मे गाव सभा मे बहुत ही कही - सूनी हुई l सभा में सरपंच की बॉडी मे नियुक्त हुवा एक माधव नाई था l उसका नाम माधव नाई था l अपना पुरखों से चला आया हजामत का काम वह करता था l वह सभा मे उठ खडा हुवा l

“ क्यो की जो न जाणे कोई वह जाणे नाई l” ऐसी कहावत है l माधव नाई हजामत के कारण इधर उधर के गावं जाता था l उसका आना जना सोनगाव से लेकरं कडेगांव तक था l इस कारण बहुत से लोगो मे उसकी जान पेहचान होती थी l उसने उनके गावं के झरणे का पानी सोनगाव तथा कडेगांव के लोगो ने किस तरह चुराया वह सब कहाणी उसने बताई इतना ही नहीं उसका हल भी बताय l

उसने पहले सोनगाव के लोगो ने पानी कैसे चुराया वह बताया, उसने कहा “सोनगाव का एक शिक्षक किल्ले के नीचे वाले पहाडी पर बसे हुवे शिवपेठ नामक गावं मे पढाने के लिये जाता था l उसकी वहा पर सरकार ने नियुक्ती की थी l वह अपने गावं के पश्चिम छोर वाले रस्ते से जाता था l सोनगाव मे पानी की समस्या दूर करने के लिये उसने हमारे गावं की पश्चिमी छोर के झरणे का पानी पाईप डालकर ले जाणे का सुजाव दिया l सोनगाव के लोग जब नल डालने आये l तो उस पानी से खेती करने वाले गाववालोने उन्हे रोका l तब यह मामला सरकारी न्यायालय जा पहुंचा l तब यह मामला सुलजाने के हेतू तहसीलदार सोनगाव की तरफ से आया l तब तहसील दार ने कहा की झरणे के पास छोटा तालाब बनाया जाय l जिसमे से मिलने वाले पानी का एक हिस्सा सोनगाव को दिया जाय l और तीन हिस्सा पानी वनगाव के खेत वाले किसानों को दिया जाय l तब कूछ वनगाव के अडेलतट्टू किसनो ने अपने मुछोपर ताव मारते हुवे तहसील दार को कहा की पानी हमारे गाव की हद्द मे है l एक हिस्सा क्या मूछ का बाल उगाने जितना भी ना दे हम l तब सरकारी कोर्ट ने खेत से बढकर प्यास को महत्त्व देते हुवे सोनगाव को तीन हिस्सा पानी देने को कहा l और एक हिस्सा पानी खेत के लिये छोडने को कहा l लेकीन सोनगाव के चलाख लोगो ने नल डालते वक्त गेहरा खड्डा खुदवा दिया l ताकी किसान पानी न ले पाये l और उनका गावं नीचे होने के कारण उन्हे आसानी से पानी जा सका l

पानी


अब भी हमे पानी मिल सकता है l लेकीन वह पूरब की हद्द से , हमारे गाव से पुरब की तरफ एक नाला है उसके ऊपर एक झरणा है l उसका पानी कडेगांव के लोग सिमेंट का पाईप डालकर ले गये है l वहा पर पाईप भर के जाकर भी थोडासा पानी बेहता रहता है l वही सही हम पानी पा सकते है l लेकीन कडेगाव के लोगो से टकरायेगा कोण?”

तब सरपंच जी बोले, “ पहले हम गाव का नक्षा देखेंगे l की वह पानी किस गाव की हद्द मे है l कल फिर से सभा भरेगी l” ऐसा कहकर सभा बरखास्त हो गई l दुसरे दिन श्याम को फिर से सभा का आयोजन किया गया l

दुसरे दिन सरपंच और दो होशियार पढे लिखे गाववाले तहसील कार्यालय गये l वहा जाकर उन्होंने गाव का नक्षा देखा l नक्षे की प्रत मिल गई l तो उन्होंने गाव के ईलाके की जाणकारी इकठ्ठा कर ली l और गावं की सभा मे सब खुलासा किया l दोनो पानी के प्रवाह गाव के इलाकें मे थे l तो उस पानी पर गावं का हक था l भिड मे से एक लडका उठा l और बोला , “ हमारे गावं का पानी है l हमे चूप नहीं बैठणा है l गाव मे पानी लाकर ही रहेंगे l”

तब मधू नाई बोला, “ चूप कर लडके, गरम जोशीले खून का उबाल मत दिखा l पहला पानी गावं के नादान किसानो की वजह से सोनगाव को देना पडा l अब अकल से दिमाग थंडा करके काम चलाना है l जो की साप भी मरे और लाटी भी ना तुटे l”

फिर माधव नाई बोला, “ अब मै केहता हु l उस तरह तिन अर्जिया लिखी l एक सोनगाव के सरपंच को, दुजी कडेगांव के सरपंच को और तिसरी तहसील को l”

माधव नाई के कहे अनुसार अर्जीया लीखी गई l अर्जी मे लीखा गया था l की वनगाव मे पानी की किल्लत सुरु हो गई है l और पुरब तथा पश्चिम के झरने से हमे पानी दिया जाय l आर्जी पहुंच गई l अर्जी देणे वाले ने सोनगाव और कडेगांव के सरपंच को कहा की कल आप लोग वनगाव आकर इस समस्या का निवारण किजीये गा l अगर नहीं आये तो इसका अंजाम बुरा होगा l

पानी


दुसरे ही दिन दोन सरपंच वनगाव आ गये l काफी देर तक यह चर्चा चलती रही l दोनो ने हात खडे कर दिये l और पानी देणे के लिये एक दुसरे को कहने लगे l असल में समस्या यह थी की उनके गाव वालो ने उन को धमकी दी थी l की अगर पानी के बारे में हमें नुकसान हुवा l तो अगले चूनाव मे तुम्हे दिखा देंगे l इस कारण वह एक दुसरे से अपने स्कीम से पानी देने को कह रहे थे l वनगावं के लोग एक घंटे से यह तमाशा देख रहे थे l वनगाव के सरपंच ने कहा की ये चुहे बिल्ली का खेल बंद कर दो l पानी हमारा है l हम चाहें तो दोनो गाव का पानी बंद कर सकते है l हम सिर्फ पांच दिन की सहुलियत देते है l अगर पाच दिन मे यह निपटारा न हुवा तो तुम्हारे गाव की प्यास् कैसे बुझाते हो वो हम देखेंग l

नाही तुम लोगो को छटी का दूध याद दिलाया तो हम भी वनगाव के नहीं l तुकोबाजी का अभंग हमे भी याद है l चाहें दान मे पुरे कपडे भी देंगे l लेकीन बुरे लोगो पर हमारे दंडे बरसेंगे l अब चले जाव यहा से सिर्फ पाच दिन है तुम्हारे पास l” ऐसा कहने पर वे लोग चूप होकर चले गये l तिनो गाव मे एक ही चर्चा थी l की पानी का बटवारा कैसे होगा?

देखते ही देखते पाच दिन हो गये l छटे दिन एक गाववाले को कडेगांव और सोनगाव को भेजा गया l वह हात हिलाते आया l उसने कहा की दोनो गावं वाले मान नही रहे है l तब वन गावं का सरपंच आग बबुल हो गया l उसने अपने गाव की सरपंच बॉडी तथा गावं के जिम्मेदार लोगो से सलाह मशवरा किया l गाव के पंद्रह सोलह नौजवान इकट्ठा कीये l उन्हे रात को चावडी में बुलाया l दो गुट बना दिये गये l एक पुरब की तरफ तो दुसरा पश्चिम की तरफ भेज दिया l उनके हात मे कुदल ,फावडा , हातोडा ये अवजार दिये l वे गुट दो तरफ चले गये l पूरब की नाले की तरफ कडेगाव की सिमेंट की पाईप थी l उस गुट ने दो दनको मे ही उसका काम तमाम किया l और सभी पानी की लाईन उखाड फेकी l पानी के फवारे उडने लगे l पानी झरणें से बहकर नाले की तरफ जाणे लगा l

इधर पश्चीम दिशा की तरफ गया हुवा गुट पानी के नल के पास पहुंचा l उन्होंने पाईप तोडने की कोशिश सुरू की लेकीन वह बीड के धातू का बना था l कितने घाव डाले पर तुटणे का नाम हि नहीं ले रहा था l लडके तोडणे के लिये हिचकिचाने लगे l तब उनके साथ गया हुवा माधव नाई बोला, “ अरे कैसे मरगठ्ठे के लडके हो l देखो ए हमारी गावं की इज्जत का सवाल है l अगर ए नल नहीं तुटा तो हमारे गावं के लोग और गाय भैस् पानी पानी करके मरेंगे l देख क्या रहे हो ये लो गणू लुहार का हातोडा और तोड दो ये नल,”

बहुत प्रयास से भी वह नल टस से मस नहीं हो रहा था l तब माधव नाई बोला, “ अगर ये नल जो तोडेगा उसकी एक मास की हजामत मै बिना रुपये लिये करूंगा l और न तोडा तो एक एक की आधी मूछ मुंडवाके रहुंगा l ”

तब उन मे से एक युवक आगे आया l दिखने मे दुबला पतला लग रहा था l उसने हातोडा लिया l और नल के पास गया l और नल पर हातोडा चलाने लगा l

उस हतोडे की आवाज से आस पास का माहोल कंपित हो रहा था l रात के अंधेरे मे उन युवको को भारी जोश आया था l उन्होंने बारी बारी जाकर उस नल पर घाव डाले l देखते ही देखते नल तूट गया l पानी झरणे मे जाने लगा l उसके बाद वे लोग गाव आ गये l नल तुटणे के कारण उन दोनो गावों का जलपुरवठा खंडित हुवा l जब देखने गये तो नल तुटे पाये l दोनो गावों ने वनगाव के लोगो के खिलाफ शिकायत दर्ज की l दुसरे दिन देखने के लिये पुलिस आने वाले थे l तब वनावनात के लोगो को जब यह खबर मिली तो सरपंच बोले, “पुलिस लेकरं आणेवाले है क्या? अब देखते है क्या करती है पुलिस?, कोई आदमी नही जायेगा उधर सभी औरतो को बाहर निकालो l आज चुला बंद पानी की लढाई होगी l गाव की महिला को चावडी पर इकट्ठा किया गया l उनके दो गुट बना दिये गये l और दोनो तरफ भेजां l उनमे कूछ झगडालू थी l पुलिस और उन गाव के लोगो के आने से पहले वनगाव की औरते नल के पास जाकर बैठ गई l जब पुलिस को लेकरं कडेगांव के लोग आये l तब औरतों को देखकर वे लोग आगे आने से कचरणे लगे l तब कडेगांव का एक आदमी बोला, “ अरे, वो वनगाव की चुडेलो तुम्हारे आदमी चूहे के माफीक घर में दुबक कर बैठे हुवे है क्या? जो तुम आई हो पानी चूराने l”

तब वन गावं की सरपंच की बिवी बोली, “ अरे, वो मेंढक किसे पानी चोर केह रहा है l चांद, सूरज और धरती मां जाणे पानी किसका है l हमारी गावं की सरहद मे है, यह पानी, चुराके ले गये तुम और हमे चोर केहते हो l ये तो उलटा चोर कोतवाल को डाटे l”

दुसरा आदमी बोला, “ तोहरी जबान तो कैची की तरह चलती है l काट के फेक देंगे l चूप चाप यहा से चली जावो l वरना पत्थर मारके भगा देंगे l

तब वनगाव की सभी औरते बोली देखते है l कोण भगाता है किसे l उन मे से एक बोली, “चौथी कक्षा मे हमने भी पढाई की है l की मावलो ने किस तरह पावनखिंड लढी थी l और हम तो पहाडी शेरनी है l चलो उठवो पत्थर धावा बोल दो l”

उन्होंने जोर से पथ्थर फेकणे सुरु किये l जैसे पथ्थर लगणे लगे l कडेगांव के लोग और वे पुलिस इधर उधर भागणे लगे l चढण उतरण के रास्ते भागते हुवे वो हाफने लगे l उनकी सास फुलणे लगी l उनकी हालत देखकर वनगाव की औरते हसणे लगी l तब एक पुलिस दुसरे से बोला, “ अबे खा बिर्याणी , वडा पाव, देख कैसी हालत हुई हमारी”

दुसरा पुलिस वाला, “ छोडुंगा नहीं इनको, ठाणेन में बंद कर दूंगा l”

पहला पुलिसवाला, “ किस किस को ठाणे मे बंद करवायेगा l पुरे गावं की औरते थी l और हमे सिर्फ देखने का नाटक करना था l असल में यह पानी वनगावं का ही है l"

दुसरा पुलिसवाला, “ अरे, वो ठीक है l लेकीन पुलिस पर हात उठाना जुरुम है l कायदा कानुन कूछ है क्या नहीं l”

पहला पुलिस वाला, “ कैसा कायदा कानुन पहले तो हमने ही गलत किया है l इन कडेगाव और सोनगाव की बातों मे आकर l इनकी शिकायत न सुनकर दी हुई बिर्याणी खाकर आग ये रोक झाडणे, तो क्या दुसरे चूप बेठेंगे l देख में तो कोई शिकायत न करूंगा l और तुम भी मत करना l वरना l”

दुसरा पुलिस वाला, “ वरना क्या होगा l”

 पहला पुलिस वाला, “ मेरा घर में हुक्का पानी बंद होगा l क्यो की मेरी बिबी वनगाव की है l उसने मुझे धमकी दि है l की अगर वनगाव वालो के साथ कूछ गलत सलत किया तो घर मे आना बंद करवा देगी l”

 दुसरा पुलिस वाला बोला, “ अरे, बापरे यह बात है l इसलीय तुम इधर आने से मना कर रहे थे l चलो तो फिर सुलाह करते है l”

 दोनो ठाणे चले गयेl जाकर सब बाते ठाणेदार से की, तब ठाणेदार उलटा गुस्सा होकर एक पुलिस की तुकडी लेकरं वनगावं चला गया l लेकीन तब पुरा गावं पुलिस के साथ लढणे झगडणे के लिये तयार था l तंग वातावरण देखकार ठाणेदार ने शांती से पुरा जायजा लिया l और शांती से बातचीत करने हेतू पूरी घटना जाकर तहसीलदार को दे दी l

दुसरे दिन तहसीलदार ने तीनो गावं की सरपंच तथा अन्य सदस्य को बातचीत करने के लिये बुलाया l कडेगांव तथा सोनगाव के सरपंच पानी देने को राजी हुवे l तब तहसीलदार बोले की वन गाव को थोडा पानी देना चाहिए l वे चाहें तो छोटासा नल डालकर भी ले जा सकते है l तब वनगाव का सरपंच बोला की साहेब आप भी बिर्याणी खाकर बोल रहे है क्या? पानी का बटवारा हम करेंगे l हमारा पानी है l आप कोण होते है l इस झरनों के मालिक l

तब उसने कहा की सोनगाव की तरफ के पानी के तीन हिस्से होंगे l पहला वनगावं दुसरा सोनगाव और तिसरा जंगली जानवरो के लिये l और उसी तरह कडेगांव की तरफ के पानी का भी होगा l उसके लिये वहा पर एक छोटीशी टंकी बनाकर यह बटवारा होगा l कल से हम नल खुदाई का काम चालु करेंगे l

पानी


दुसरे दिन से ही गाववालो को लेकर वनगावं के लोग काम करणे लगे l कूछ दिनो में उन्होंने नल का काम पुरा किया l और गावं मे पानी आया l तहसीलदार ने भी इस योजना को मान्यता दे दी l और इस तरह पानी का बटवारा हो गया l और इस प्रकरण पर पडदा पड गया l


Thursday, April 18, 2024

६)साहस

 ६) साहस


६)साहस
सौमीत्र


सौमीत्र एक होनहार लडका था l उसके पीताजी एक उद्योजक थे l उनकी शहर के बाजार मे बडी कपडो की दुकान थी l कारोबार मे अच्छा जम बैठने के कारण उनकी आर्थिक स्थिती अच्छी थी l सौमित्र के दादाजी फौज में थे l वह फौजी होणे के कारण उनका ब्याह नहीं जम रहा था l बहुत प्रयास के कारण उस जमाने मे उनकी शादी हुई थी l उसके दादा और दादी जब साथ में खडे रहते l तो ऐसा लगता की नारीयल के पेड के पास छोटा आम् का पेड खडा हो l इस कारण उनके बच्चो में यह अनुवंशिकता दिखती थी l सौमित्र के पिताजी अपने मां के जैसे खुजे हो गये थे l और उसके पिताजी की बहने अपने पिता की तरह लंबी बनी थी l सौमित्र के पिताजीं नाटे होणे के कारण वह फौज मे भरती हो ना सकते थे l इस कारण दादाजी की इच्छा पुरी ना हो सकी l लेकीन दिमाग में तेज होणे के कारण एक अच्छे व्यावसायिक हो गये थे l दादीजी के खुजे होणे के कारण दादीजी की सास् हमेशा ताने मारती थी l लेकीन दादाजी उसवक्त हमेशा दादीजी की तरफदारी करते l क्यो की दादीजी एक अच्छी जीवन संगिनी है l दादाजी बाहर दहाडते शेर की तरह थे l उनकी मुच्छे देखकर आस पास के छोटे बच्चे भी डर जाते l औरते तो सर पर पल्लू का घुंगट ओढ के सामने आती थी l लेकीन दादीजी नाटी होणे के बावजुद उनका आवाज बाळासाहेब ठाकरे के मफिक करार था l उनके आवाज से घर के सभी भयकंपित होते थे l क्यो की वह सक्त मिजाज की थी l सौमित्र की अम्मा और पापा भी उनसे डरती थी l दादी के बिना घर का पत्ता भी नहीं हिलता था l

दादाजी की जो इच्छा जो अपने बेटे से थी l वो जो पूरी ना हो पाई थी l वह अब पोते से पूरी होणे की आशा थी l सौमित्र को अपने जैसा फौजी बनाने की उन्होंने ठाणी थी l वह बचपन से ही उसके पीछे हात धोकर पडे थे l वह हर दिन उसे सवेरे उठते l उससे कसरत करवाते l दौड लगवाते l उसे तैराणे के लिये ले जाते l उन्होंने उसे फटाफट बनाने की ठाणी l सौमित्र को दादाजी पर गुस्सा आता था l उसके आसपास के बच्चे हमेशा देर से उठते l टिव्ही देखते l खेल कुद अपने मन के माफीक करते l लेकीन दादाजी तो उसे फौजी बनाने के लिये कसरत करवाने के पीछे पडे थे l वह सोचता की उसके पिताजी का बंगला है l गाडी है l कारोबार है l लेकीन दादाजी के सीर में क्यो ए फौजी बनवाने की ख्वाईश है l

दादाजी के इस रवये से वह तंग आ गया था l अब वो बडा हो रहा था l और आठवी कक्षा मे भी गया था l स्कूल के लडके उसकी तबीयत देखकर उसे फौजी कहकर चिडाते थे l

सौमित्र के पिताजी ने अब अपना कपडों का व्यवसाय बढाया था l अलग अलग जगह पर उन्होंने अपने दुकान खोले थे l उस कारण उनके तरक्की के चर्चे सभी ओर गुंजने लगे l सौमित्र अब बडा हो रहा था l आठवी कक्षा मे जाणे के कारण वह अब अकेला स्कूल जाणे लगा था l रोज की तरह सौमित्र स्कूल गया था l दोपहर हो गई l लघु छुट्टि हो गई l बच्चे बाहर मेदान में उछल कुद करने के लिये चले गये l सौमित्र भी चला गया l मैदान के एक छोर पर होनेवाले खाद्य पदार्थ के ठेले के पास वह चला गया l उसने वहापर चन रुपयों की शेकी हुई मुंगफलीयां ली l और पास होनेवाले कट्टे पर जाकर बैठ गया l और मुंगफलीयां खाने लगा l इतने में एक इसम वहा पर आया l उसने अपने आँखो पर गॉगल लगाया था l सौमित्र को अकेला पाकर वह नजदीक आया l

वह बोला, “ अरे, सौमित तुम्हारे पिताजी का अक्सीडेंट हो गया है l चलो जलदी तुम्हे बुलाया है l देखो वह कार उनके मित्र ने भेजी है l सौमित्र को यह सुनकर धक्का सा लगा l क्रोध की वह अपने पिताजी से बहुत प्यार करता था l उसके हातों से मुंगफलीया गिर पडी l सौमित्र कूछ सोचे बिना उस आदमी के साथ गाडी में बैठ गया l उस गाडी मे और दो लोग थे l वह सौमित्र को देखकर् मुस्कुराये l गाडी चल पडी l सौमित्र ने उस इसम को पुंछा की उन्हे कहा ले गये है l

वह बोला, “अरे, सौमित्र उन्हे जिल्हा सिटी हॉस्पीटल मे रखा है l”

 सौमित्र अब रोने लगा l गाडी चलती रही l थोडी दैर बाद सौमित्र के ध्यान में आया, की वह गलत रास्ते जा रहे है l क्यो की दादाजी ने उसे सारा शहर घुमाया था l वह भी पैदल चलकर l इस कारण सौमित्र को सब शहर की ठिकाणे याद थी l

सौमित्र बोला, “ अरे भाई तुम गलत रास्ते जा रहे हो l यह रास्ता तो शहर के बाहर जाता है l”

तब उसमें से एक ने पीछे मुडकर करारी नजर से देखा l तो सौमित्र के मन में शंका आ गई l वह बोला, “ यह गलत रास्ता है l मुझे यहापर उतार दो l में अपने आप चला जाऊंगा l”

६)साहस
अपहरण


तब आगे की सिटवाला आदमी पीछे मुडा l और उसने एक रामपुरी सुरा निकाला l उसे देख कर सौमित्र डर गया l तभी उसके पास वाले ने उसके हात पकडे और सौमित्र चिल्लाणे से पहले उसके मुंह मे एक कपडा ठुसा दिया l और उसे नीचे की तरफ ढकेला l और एक रुमाल उसके नाक पर रखी l सौमित्र बेहोश होने लगा l उस मे से एक बोला की यह लडका तो सब रास्ते जानता है l उसे सुला दो l” सौमित्र समज गया l की यह लोग उसका अपहरण कर रहे है l और उसके पिताजी को कूछ नही हुवा है l

इधर स्कूल की घंटी हो गई l और सभी बच्चे अपने अपने कक्षा मे जा चुके थे l सौमित्र को उनके साथ जाते हुवे किसिने भी नहीं देखा था l सब बच्चों को लगा की तासिका चुकाने हेतू वह कही छिपा होगा l इधर गाडी ने तेज रफ्तार पकड ली l वह अब छोटा रोड छोडकर महामार्ग पर आ गई l गाडी के हादरे से और नशा जादा न चढणे के कारण सौमित्र को होश आ गया l लेकीन सर बहुत दर्द कर रहा था l लेकीन उसने चुपचाप से लेटा रहणा ही ठीक समजा l अब उन अपहरण कर्तावों की भाषा बदल चुकी थी l वे अब भोजपुरी में बाते करने लगे l थोडी देर बाद वह गाडी सूनसान झाडी की तरफ जाणे लगी l थोडी ही देर में वह गाडी जंगली एरिया मे घुस गई l वहा पर जंगल से नजदीक एक फार्म हाऊस था l वहा पर वह गाडी घरी गई l वाहा पहुंचने के बाद उन्होंने सौमित्र को उठाकर फॉर्म हाऊस के पीछे के रास्ते से उसे ले जाकर एक कमरे मे पटक दिया l अब सौमित्र को लगा की अब यहा से बचना मुश्किल होगा l वाहा पर और दो आदमी थे l वह राह ही देख रहे थे l सौमित्र को एक कमरे मे बंद करके वह कामयाबी का जश्न मनाने दुसरे कमरे मे चले गये l वाहा पर जाकर वे शराब पिणे लगे l सौमित्र को उनकी सभी बाते सुनाई दे रही थी l उनकी बाते सुनकर सौमित्र ने जाना की यह लोग उसका अपहरण करके उसके पिताजी से पच्चास लाख रुपये की वे फिरोती मांगणे वाले है l उन मे से एक ने किसी को फोन किया और सभी जाणकारी दे दी l बाद में कूछ देर बाद उनमें से दो वहा पर रह गये l और तिन बाहर चले गये l गाडी जाणे की आवाज सनाई दी l वह थोडा डर गया l उसके मन मे अनेक प्रश्न उमटणे लगे l उसने कई बार अखबारों मे पढा था l और टिव्ही पर भी समाचार मे देखा था l की अगर इन अपहरण कर्तावों की मांग पूरी नहीं की तो जिसका अपहरण किया है l उसे मारकर कही एकांत जगह पर फेक देते हैं l यह सोचकर वह डर गया l डर के मारे उसको पासिना आने लगा l इतने मे कमरे का दरवाजा धाड से खुला और एक आदमी अंदर आया l उसने सौमित्र के मुह की पट्टी खोली और एक पकोडा सौमित्र के मूंह मे ठूस दिया l उसने किसी तरह से वह खाया l उसे हीचकिया आणे लगी l तब उसने थोडे पाणी की मांग की,तब उस आदमी ने थोडा पानी पिलाया l और अंदर धकेलकर वह दरवाजा बंद करके चला गया l उस आदमी के मुह से शराब और बिडी की बास आ रही थी l

इधर सौमित्र स्कूल से नहीं आने पर उसके घरवाल चिंतित हो उठे l उन्होंने आस पडोस और स्कूल तथा उसके दोस्तों से पूछताज की, लेकीन कूछ पता नहीं चला l तब वह पुलिस स्टेशन जाणे के लिये तयार हुवे l तभी घर में मोबाइल की रिंग बजने लगी l तब सौमित्र की मां ने कॉल रिसिव्ह किया l तब उस ओर से किडन्यापर बोला, “ देखो तुम्हारा बच्चा हमारे कब्जे मे है l अगर उसकी खैरियत चाहते हो तो पचास लाख रुपये तयार रखणा l अगर थाने मे रपट लिखाई या किसी से कूछ कहा l तो याद रखणा l बच्चा नहीं उसका सिर् मिलेगा l”

फोन बंद हो गया l सौमित्र की मां उसकी बाते सुनकर फूट फुटकर रोने लगी l उसने वह बाते अपने पती और ससुर को बताई l सभी को चिंता होणे लगी l तब दादाजी ने उन्हे भरोसा दिलाया l

दुसरे दिन फिर उसका फोन आया l तब दादाजी ने फोन उठाया l उससे वह बाते करने लगे l और बोले हम अपने बच्चे की आवाज सूने बिना कैसे जान ले की वह हमारा बच्चा है l तब उसने कमरे से घसिटते हुवे फोन के पास ले आया l उसके हात में फोन देकर बोलणे को कहा l, जब दादाजी ने सौमित्र की आवाज सुनी l तब वह बोले, “मेरे शिकाये गये पर गौर करो l डरो मत तुम, साहस जुटावो, मै कूछ करता हुं l”

तभ् उस अपहरण कर्ता ने फोन छिन् लिया और वह बोला की बच्चे की सलामती के लिये कल श्याम तक हनुमान टेकडी के घने जंगल मे लाल रंग का धागा बांधे हुवे बरगद के पेड के नीचे रुपये की बॅग रख आणा l अगर होशियारी की तो बच्चे के तुकडे दुसरी बॅग मे मिलेंगे l उसने फोन रखा l

सौमित्र के पापा रुपये का इंतजाम करने में लगे थे l लेकीन रक्कम बहुत बडी थी l इतना रुपये का इन्तजाम करना कोई साधारण बात नही थी l

इधर जब से दादाजी से बाते हुई l तब से दादाजी ने कहे लब्ज सौमित्र के कान मे गुंजने लगे l जब वह कमरा बंद करके बाहर गये l तब सौमित्र ने थोडी देर ध्यान किया l उसने दादाजी जो शिकाते थे वह याद किया l उस कारण उसके दिमाग से वह डर निकल गया l और उसकी मती स्थिर और शांत हो गई l उसके बाद उसका दिमाग गाडी के पहियों जैसा घुमणे लगा l उसके दिमाग में विधायक विचारों की श्रृंखला खडी होने लगी l उसने अपहरण की बाद की घटनाओं को याद किया l तब उसके दिमाग में भाग जाने का खयाल आने लगा l उसे अपने चौथी कक्षा का छत्रपती शिवाजी महाराज का पाठ याद आया l की छत्रपती शिवाजी महाराज औरंगजेब की कैद से कैसे छुटे थे l उसे प्रेरणा मिली l थंडे दिमाग से वह योजना बनाने लगा l

उसने उनकी हरकत देखी थी l रात के वक्त यह लोग शराब मे तर्र होते है l और कमरे की तरफ नही आते l तो रात को ही वह यहा से भागेगा l उसने पुरे कमरे का जायजा लिया तब उसे ध्यान में आया की बाथरूम की व्यवस्था में एक काच की खिडकी है l वहा से आसानी से वह जा सकता है l

रात का खाना देने के बाद वह लोग कमरा बंद करके चले गये l थोडी देर मे वह शराब पिकर् तर्र हुए l सौमित्र ने अपने आप को रस्सी से किसी तरह छुडा लिया l और अपने मुह से वह कपडा निकाला l और जोर की सास ली l उसके बाद अपने पैर के शूज के लेस अच्छी तरह से बांधे l और उसने दादाजी ने पढाये हुवे उपक्रम को याद किया l दादाजी ने बिना पैर की आवाज किये कैसे चलना है वह सिखाया था l वह बाथरूम की तरफ गया l बाथरूम का दरवाजा धीरे से खोला l बाथरूम मे जाणे के बाद उसने दरवाजा बंद किया l और बाथरूम के खिडकी के नये बनाये उपर नीचे करने वाले काच निकाल कर राख दिये l उसने बाहर झाका तो उसे बाथरूम का पाईप दिखाई दिया l उसने पूरी पाईप का जायजा लिया l उपर से नीचे तक कैसे जा सकता है यह जाच लिया l चांद के प्रकाश में उसने वहा से उतरणे का सोचा l और वह खिडकी से बाहर निकला और पाईप को पकडकर बंदर जैसा चढना और उतरना जो दादाजी ने सिखाया था उस प्रकार से वह पाईप से नीचे उतरा l और पैर का आवाज किये बिना वह कूछ दूर गया l और वाहा से फिर भागकर कूछ अंतर चला गया l अंधेरे के कारण कूछ दिखाई नहीं दे रहा था l थोडी देर चलने के बाद उसे दादाजी की बाते याद आई l उन्होंने कहा था, की जब हम अकेले होते है l तब हमे आस पास के वस्तूवों का इस्तेमाल करना चाहिए l और हमारा रास्ता हमे ही बनाना चाहिए l अंधेरे मे चलना बडा ही कठीण हो रहा था l तब उसके हात मे घडी थी l जो रोशनी दे सकती थी l जिसमे लाईट थी l उसने उसका प्रकाश ऑन किया l और वह चल पडा l जाते वक्त उसके दिमाग में विचार आया l की जब इन लोगो को मै भागा हुं l यह पता चलेगा l तब वे मेरी तलाश करेंगे तब वह मुझे सिधे रास्ते धुंडेगे l अब क्या करें? इतने में उसे अपने चौथी कक्षा का पाठ याद आया l की छत्रपती शिवाजी महाराज औरंगजेब बादशहा के चंगुल से कैसे छुटे l तब उसने सोचा की सिधे रस्ते नही तेढे रस्ते जाना होगा l तब वह जंगल की तरफ मुडा और जंगल मे घुस गया l अब उसने ध्यान से चलना शुरू किया l बारीकी से देखकर वह अंधेरे मे सतर्कतता से वह चलने लगा था l थोडी थोडी चांद की रोशनी से अब दिखाई देणे लगा l

तो उसने अब आकाश की तरफ देखा l तब दादाजी ने ग्रह, तारो के बारे में जो पढाया था l वह उसे याद आया l उसने उस से दिशाओ के बारे मे जाचा l और उसे वह अपहरण कर्ता किस दिशासे लेकरं आये l यह अंदाज लगाया l और अपना मार्ग तय किया l अब वह नौ बजे से लेकरं लगातार पांच घंटे चल रहा था l उसे थोडी थकान लग रही थी l इसलिये उसने आराम करने की सोची l और उसने एक पेड को अच्छी तरह से जांचा l और उसपर वह चढ गया l और उसके बडे खोड पर बैठ गया l अपने हात की घडी में अलार्म एक घंटे का लगाया l और वह सो गया l एक घंटे बाद उसकी जब घडी अलार्म करने लगी l तब उसकी निंद खुली l घडी मे रात के तीन बजे थे l अब वह थोडा फ्रेश हो गया था l अब फिर से उतरकर उसने चलना सुरू किया l जंगल के उपरी क्षेत्र में वह पहाडी पर चला गया l तब तक सवेरा होने का समय हो चला था l पुराब की ओर प्रभा होने लगी थी lवहा पर जातेवक्त उसे लगातार चलने से बहुत भूक लगी थी l इसलिए उसने इधर उधर देखा l की शिशिर ऋत के कारण बहुत सारे पेडो के पत्ते गिर गये थे l कूछ पेडो पर नये पत्ते और बहर आने लगे थे l उसके ध्यान में आया l की दादाजी उसे हर दिन रात के समय कूछ ना कूछ पढने को जबरन बिठाते थे l एक दिन जंगली पेडो के बारे मे लिखी किताब उन्होंने पढणे को दी थी l उसमे हर एक पेड की जाणकारी और उसके बारे मे लिखा था l वह उसने पढा था l तो उसने निरीक्षण किया l और कूछ पेड के पत्ते निकाले और वह खा गया l उसके बाद उसने जंगली नाले का पानी पिया l और आगे निकल वह पहाडी पर आया l भगवान की दया से अब तक का सफर अच्छा हुवा था l पहाडी पर खडे होकर, उसने वहा से सभी ओर देखा , तो दूर एक जगह उसे धुवां उठता दिखाई दिया l उसने स्कूल मे पढा था l की जहाँ पर धुवां होता है, वही विस्तव याने आग होती है l और आग जहा वहा पर मनुष्य यह सोचकर उसने फिर बारिकी से देखा, और वहा पर बस्ती होने का अंदाज लगाया और वह उस दिशा की ओर चलता गया l

६)साहस


 थोडी देर बाद वह उस धुवे की जगह तक पहुंचा l जो घने जंगली इलाके मे बसा हुवा था l उस इलाके मे एक आदमी गावं के नजदीक दिखाई दिया l तब सौमित्र ने वहा के बारे मे उससे पूछताज की तब उसे यह पता चला की वह रहणेवाला शहर यहा से पच्चास किलो मिटर दूर है l तब सौमित्र ने पूछा यहा पर नजदीक का शहर कोणसा है l तब उस आदमी ने नजदीक वाले बडे गाव के बारे मे बताया l उसने सौमित्र के बारे मे पूछताज करने की कोशिश की लेकीन सावधानी के लिये सौमित्र ने वह कॅम्प के लिये आया था l और रास्ता चूक गया है l येसा कहकर वह आगे गावं के नजदीक गया l तब उसे गावं से नीचें बडे रास्ते की तरफ जाणेवाला रास्ता मिल गया l वह उस रस्ते से चल पडा l आगे एक नुकड पर एक मंदिर दिखाई दिया l वह वहा पर चला गया l वहा एक शिव मंदीर था l वाहा पर जाकर उसने शिवलिंग को प्रणाम किया l शिवलिंग को देखकर उसे दिशा का ज्ञान हुवा l वह आगे बड गया l इधर उधर के निशाण देखते हुवे वह आगे बढता रहा l

इधर उन अपहरण कर्तावो की नशा उतर गई थी l सवेरा होकर बहुत देर हो गई थी l सूरज की रोशनी से वह जाग गये l उसमे से एक सौमित्र को देखने आया l उसने देखा की सौमित्र वाहा पर नहीं है l उसने फिर बाथरूम मे जाकर देखा l फिर वह जोर से चिल्लाया l उसने अपने साथियों को हाक दी l आवाज सुनकर उसके साथी अंदर रूम मे चले आये l जब सौमित्र भाग गया है l यह जब पता चला तब वह इधर उधर धुंडणे लगे l पुरा फार्म हाऊस धुंद l उसके बाद वह गाडी लेकरं रास्ते पर धूंडणे लगे l उन्होंने सोचा की शहरी लडका है l जायेगा कहा कही रस्ते मे मिल जायेगा l और वह इधर उधर धुंडते रहे l

इधर सौमित्र जंगली ईलाके से जंगली प्राणीयो से बचते हुवे वह एक नदी के तट पर पहुंच गया l उसे बहुत प्यास लगी थी l उसने नदी के पानी को निहारा l फिर थोडासा पानी पिया l और उसने नदी के प्रवाह को जाच नदी मे पानी कम था l तो उसने नदी के रास्ते जाणे का सोचा, ताकी वह लोग ढुंड न पाये l और एक नदी मे बहकर आई हुई एक लकडी ली l और नदीके रस्ते वह चल पडा l रास्ते मे नदी के किनारे मिलने वाले पेडों को निहारकर उसके पत्ते , मोहर खाकर वह आगे चलता गया l थोडी देर में उसे आगे चलते हुवे एक पूल लगा l वह एक बडे राहते का पूल था l वह उस राहते के किनारे से आगे की गावं तक पहुंचा गया l इतना चलकर भी उसे थकान नही लगी थी l क्यो की उसके दादाजी उसे हर दिन दौड लगवाते थे l

थोडीही देर में वहा से एक बस गुजर रही थी l वह बस के पीछे भागकर पीछे की सिडी पकडकर उसके ऊपर चढ गया l

सिडी से ऊपर जाकर लगेज रखने वाले रॅकेट मे जाकर जगह बनाकर सो गया l वह बस मजल दरमजल करते हुवे नजदीक वाले शहर राजापूर चली गई l राजापूर स्थानक पहुंचते ही सौमित्र बस स्टॉप पर उतर गया l और उसने शहर के थाने के बारे मे पूछताज की, और वह थाने की तरफ चला गया l वहा पर जाकर उसने पुलिस को सारी हकिकत बयान की l उसके बाद थाने के आफिसर ने सौमित्र के शहर वाले थाने से संपर्क किया l सौमित्र के पिताजी रुपयों का इंतजाम कर रहे थे l इतने मे एक हवालदार उनके घर आया l और सौमित्र के बारे मे जाणकारी दे दी l सौमित्र के कहे अनुसार राजापूर पोलीस हरकत मे आये l जाच पडताल करके उन्होंने उन अपहरण कर्तावो को पकड लिया l पहले तो उन्होंने गुनाह कबुलने से इनकार किया l लेकीन जब पुलिसने खाकी रवय्या दिखाया l तो उन्होंने सब कबूल किया l पूछताज के बाद पता चला की यह सब कुछ उनके दुकान के कर्मचारी रजत शर्मा का किया धरा है l पुलिस ने रजत शर्मा को पकडकर उस पर कार्यवाही की l उसे जेल में डाल दिया l अपने नाती का साहस देखकर दादाजी को बडा संतोष हुवा l अनेक सेवा मंडल तथा संस्थांवोंने सौमित्र का सत्कार किया l तबसे सौमित्र किसी के भी ऊपर बिना परखे आंख मुंद कर भरोसा नहीं करता था l दादाजी के प्रती उसका आदर अब कूछ जादा ही बढ गया था l उस दिन के बाद वह कसरत, खेल कुद तथा अन्य उपकर्मो मे खुद ही शौक से सहभागी होणे लगा l और पढाई मे भी अव्वल आने लगा l अब दादाजी को यह लगता की सौमित्र भले ही फौज मे भरती हो या ना हो उसने अपने भविष्य के लिये अपना जीवन बिताने के लिये आवश्यक उपयुक्त शिक्षा ली है l वह अपने राह का एक कुशल, सशक्त ज्ञान से संपृक्त फौजी बना हुवा हैं l

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Thursday, April 11, 2024

५) अतिथ्य कोकण का?

 ५) अतिथ्य कोकण का?



महाराष्ट्र राज्य के पश्चिम सागर किनारे स्थीत घनी झाडीयों में सह्याद्री पर्बत के दरो में अनेक गाव बसे हुवे है l वहा के लोग बडे ही प्यारे नारीयल के पानी के भाती अपर से कडक अंदर से मुलायम है l वहा के प्रदेश के दो अंग है l एक का नाम वलाटी जो सह्य पर्वत से लगा हुवा पहाडी प्रदेश है l और दुसरा भाग है खलाटी , जो सागर के नजदीक है l वाहा के वलाटी नामक क्षेत्र मे बहुत जादा बारिश होती है l इस कारण जमीन की पानी के कारण धूप होती है l इस करणं वहा की जमीन बहुत कम सकस है l वहा पर आम, काजू के बगीचे पहाड के ढलान पर मिलेंगे l वहा पर चावल, नागली की फसल पकाई जाती है l घाट प्रदेश से आनेवाली सब्जी और समंदर के इलाके से आई मच्छी l और जो रुखा, सुखा मिल जाये l वह खाकर यहा के लोग गुजारा करते है l बहुत मेहनत करने के बाद ही यहा पर फसल मिलती है l यहा के घर जादा तो खेतो मे ही हैं l दो घरो के बीच पाव किलो मीटर का फासला होता है l घरो के आसपास खेंती और बाग होती है l ऐसे ही दरे मे बसा हुवा एक गाव वांजोली, वहा पर राजू नाम का लडका अपनी मां और बहन के साथ रहता था l उसके पिताजी पैसा कमाने के लिये मुंबई गये थे l यहा के लडके जादा तो सातवी – आठवी तक ही पढते l उसके बाद मुंबई चले जाते l कूछ दिन बाद गाव को लौट के आते l और हिंदी, अंग्रेजी मिक्स मराठी बोलते l तब उन्हे लगता की उन्होंने आसमान के तारे तोडे हो l

राजू के पिताजी भी मुंबई मे एक उपहारगृह मे काम करते थे l दो चार मास के बाद गाव लौट आते l लाई हुई कमाई कब खत्म् हो जाती पता ही नहीं चलता l फिर रुपया कमाने के लिये फिर शहर की तरफ दौड सुरु हो जाती l शहर मे रहणे की मारामार होणे के कारण अपने साथ परिवार ले जाना कठीण था l इसलिये घरवाले सभी गाव में रहते थे l राजू के घर का खर्च उसकी माँ किसी तरह से चला लेती थी l एक दिन राजू की मां हर दिन की तरह घर का काम करके दुसरे के खलिहान में काम के लिये चली गई थी l राजू आम् के बगीचे मे अपने मित्रों के साथ खेल रहा था l

५) अतिथ्य कोकण का?


तभी उसकी सुशीला  बहण ने उसे आवाज लगाई, “ भैया ओ भैया इधर आवो l कोल्हापूर के काका आये है l”

राजू उसकी आवाज सुनकर उसकी तरफ खेलना छोडकर चला गया l वह बोला, “ थोडी देर खेलने दो ना, कूछ चायवाय पिलावो ना l”

तब वह बोली, “ अरे, चाय कैसे पिलाये l घर में चायपत्ती भी नहीं है l और तुम तो जाणते हो ना की पिछले दो महिनो से पिताजी ने एक रुपया भी नही भेजा l इसलिय तो मां दुसरे के खेत मे काम के लिये गई है l तुम तो अब बडे हो l

पिताजी के गैर हजरी में तुम्हे ही घर का ध्यान रखणा है l घर में अतिथी आये और उनकी खातिरदारी ना हो तो हमारी नाक कट जाएगी l और यह काका तो मामा के गावं मे जाकर डिंगे मारे बिना नहीं रहेगा l हमेशा ही हमारे पिताजी को बुरा भला कहने के लिये अवसर देखता है l

उतने में राजू और उसकी बहण सुशीला को पुकारने की आवाज सुनाई दी l वे लोग घर की तरफ भागते हुवे आये l

उन्हे देखकर काका बोला, “ अरे कितनी देर हो गई है l मुझे यहा पर आये हुये l और तुम लोग हो जो इधर उधर घूम रहे हो l तुम्हरी मां किधर है l

सुशीला बोली, “काकाजी मां तो काम करणे के लिये पडोस के साऊताई के खेत मे काम करणे के लिये गई है l”

काका बोले, “ क्या? काम करणे के लिये l कब आयेगी? मुझे तो वापस जाना है l”

 राजू बोला, “ क्या वापस जाना है l लेकीन कैसे जाओगे l श्याम होणे आई है l और जादा तो गाडिया इधर नहीं होती l अब रात को ही आयेगी l”

“ चलो न काका , घर में, मै तुम्हारे पैर धोणे के लिये पानी लाती हुं l” सुशीला बोली और वह अंदर गई l और पानी लाके काका को दे दिया l

काका ने हात पैर धोये l राजू ने टॉवेल दिया l और काका ने हात पैर पोंछे और वह बाहर वाले कमरे में आ गया l उनके बैठणे के लिये पथारी बिछाई गई l काकाजी पथारी पर बैठ गये l उन्हे पिने के लिये पानी लाकर सुशीला ने दिया l और वह दोनो अंदर रसोई घर में चले गये l वहा के सभी डिब्बो में उसने झाककर देखा l एक डिब्बे में थोडासा गुड मिला l सुशीला राजू से बोली, “ भैया जाओ पडोस से कूछ चायपत्ती मांगकर ले आवो l तो राजू पीछे के रास्ते पडोस् के घर चायपत्ती मांगणे गया l पडोस में शिवाय बुढी नानी तारा के अलावा कोई नहीं था l उसने उससे चायपत्ती मांगी l तो उसने थोडी शी दे दी l राजू भागते हुवे घर आया l सुशीला ने चाय बनानी सुरू की l तब सुशीला बोली, “ अरे भैया काले रंग की चाय देना क्या अच्छी बात है l हमारी गौ अब पेट से है l इस कारण दूध नही दे सकती l अब जाकर कही से दूध ले आवो l अब राजू को लगा l की अब दूध की समस्या से कैसे उभारा जाये l

अगर फिर से तारा नानी के पास गये तो वो तो आगबबुला होगी l तो उसके ध्यान में उसका मित्र शंकर आया l वह छोटा कप लेकरं दौडते हुवे खेल की मैदान की तरफ भागा l वहा पर शंकर उसे मिल गया l उसने शंकर से थोडासा दूध लाने की बात चलाई l शंकर ने थोडी देर सोचा l और वह कप लेकर उसने खिसे मे डाल दिया l और घर की तरफ निकला l घर के अंगण मे उसकी दादी अनाज सुकाने के लिये डालकर अपने पडोसन के साथ गप्पे लडाते हुवे बैठी थी l जैसे ही शंकर घर के आंगण से गुजरते घर में जाणे लगा l तो दादी ने उसे देखा और वह बोली, “ आ गये लाड साहब, जरा तेवर तो देखो इनके, पढाई छोडकर हमेशा खेल कुद की तरफ ध्यान, आने दो श्याम को तुम्हारे पिताजी को घर, अगर मैने तुम्हारी शिकायत ना की तो मेरा भी नाम चंपा नहीं l मूर्ख कही का? खाने के लिये आगे, सोने के लिये बीच में, और कामकाज या पढाई हो तो लाडसाहब भाग खडे होते l जा मुझे मालुम है l तू खाना खाणे के लिये आया है l जा मैने पुरा खाना पेटी मे बंद करके रखा है l तुझे आज भुका ही रखूंगी l”


 दादी की बातो की तरफ ध्यान ना देकर वह घर के भीतर चला गया l रसोई घर में जाकर उसने शींके की तरफ गया l शिंके के बर्तन को नीचे उतारकर उसने झाका l उसमे थोडासाही दूध था l उसने वह कप मे ले लिया l और कप रसोई घर के पीछे की खिडकी खोलकर उसे बाहर की तरफ रखा l और खिडकी बंद कर दी l और वह घर से बाहर निकलने लगा l

तो दादीने गुसैले नजर से उसकी तरफ देखा l और वह बोलणे लगी l क्या करने आया था l देखु तो खिसे मे क्या हैं l

तब शंकर को गुस्सा आया l शंकर बोला, “तेरे अम्मा का डबोला लेने आया था l हमेशा गुस्सा करती रहती है l तू तो घर मे एक द्वारपाल के भाती है l हमपर पेहरा गाड के बैठी है l” यह कहकर शंकर घर के पीछे चला गया l उसकी बाते सुनकर दादी देर तक चपड चपड करती रही l शंकर घर के पीछे रसोई घर की खिडकी के पास आया l उसने वह कप लिया l और राजू को जाकर दे दिया l आधा कप दूध देखकरं राजू बोला, “ बस इतनासा ही.”

तब शंकर बोला, “ चुपचाप ले जा l इसके लिये मैने बहुत पापड बेले है l वो जो घर में रखा है ना वाचमेन उससे छुपा के लाया हुं l शिंकाले के बर्तन मे इतना ही था l अगर दादी को पता चलता l तो भुखी बिल्ली की तरह नोच डालती मुझे l जा जल्दी से ले जा l उसकी बाते सुनकर राजू दूध का कप लेकरं घर की तरफ निकल गया l उसके मन में प्रश्न उमड रहे थे l

की यह दूध घर से बिना पूछे लाया है l शंकर उसके चेहरे को भाप गया l और बोला, “ज्यादा सोच मत कृष्ण लीला सर्व श्रेष्ठ है l”

राजू घर दूध लेकरं आया l और उन बहण- भाई ने चाय बनाकर अपने मेहमान काका को पीला दी l काका चाय पिते ही बोला, “ अरे कैसी चाय बनाई है l बहुत फिकी है l उसका रंग भी फिका है l यहा की गाय, भैस दूध देती है या नहीं l क्या सिर्फ गोबर देती है l”

काका की बाते सुनकर बच्चों को बुरा लगा l लेकीन वह समजदार थे l वह अंदर चले आये l अंदर आकर सुशीला ने चूले के बर्तन मे रही चाय एक प्याले मे निकाली l उसका एक घुट उसने दिया l तो दुसरा अपने भाई को दिया l चाय का घुट पिकर वह बोली, “ अच्छी खासी तो बनी है l लेकीन यह काका क्यो इस तरह बाते कर रहा है l”

“ भैया कूछ भी करो मां को जाकर बुलाके लाव l”

उसकी बाते सुनकर उसने काका को आराम करने हेतू चारपाई पर इंतजाम किया l और वह चला गया अपनी मां को बुलाने l खेत मे जब वह गया तो उसकी माँ वहा पर काम कर रही थी l राजू को देख मां बोली, “ तुम क्यो आये इधर l थोडी देर बाद मै आती ना घर l कूछ काम है क्या?”

राजू बोला, “ घर में काकाजी आये है l”

तो वह बोली, “ हाय रे दय्या, अब क्या करु? घर में चायपत्ती भी नहीं है l क्या करें अब “ वह खेत मालकीण के पास चली गई l और बोली , “ क्या करें कमला बहन घर मे बहन का पती आया है l और चायपत्ती भी नहीं है l कूछ रुपये दे दो न हाजरी ही सही “

कमला ने अपने कमर को भापा और वहा से बटवा निकालकर दो दिन के काम के पैसे दिये l राजू की मां ने वह रुपये राजू को दे दिये और कूछ राशन लाने को कहा l और वह कूछ देर बाद वो आयेगी ऐसा कहकर वह काम पर लग गई l राजू रुपये लेकरं घर में आया l उसने रसोई घर में लगनेवाले चीजो की यादी बनाई और वह बनिये के पास से वह सब ले आया l” उसके बाद अपने खेत से अटहल के पेड से अटहल और कूछ करवंदे, तोरणे, लिंबोलीया यह रान का मेवा लेके आया l काकाजी को रानमेवा खाणे को दिया l काकाजी खुश हो गये , और अटहल  रसोई घर. में रख आया l सुशीलाने घर में तबतक सफाई करके पानी भरा l और वह खाना बनाने के काम मे लग गई l

उसके बाद राजू काका के पास आ गया l तबतक काका सोकर उठ चुके थे l उन्होंने राजू को एक थैली दे दी, और कहा की ए ले जाओ और खाली कर लावो l उसमे एक गुड की ढेली और थोडीशी ज्वार है l जो तुम्हारी मौसी ने दी है l उसे रख दो l काकाजी की बाते सुनकर राजू ने वह थैली अंदर ले जाकर उसमे से गुड और ज्वार निकाल के रख् आया l उसके बाद अपने मित्र को लेकरं उसने अपने बाग के नारियल के पेड के नारियल निकाल लिये l और उसका पानी निकालकर उसने काकाजी को दे दिया l नरियल का पानी पिकार काकाजी को बहोत अच्छा लगा l बच्चो ने नारीयल निकालने के लिये किया हुवा प्रयास काका जी ने देखा था l बच्चो की अतिथ्य की तडफ देखकर अच्छा लगा l

राजू ने नारियल का पानी निकालने के बाद नारीयल के अंदर का गर निकाला l और बहण सुशिला को मसाला बनाने को कहकर वह दुकान जाकर कूछ अंडे लेकरं आया l और घर में अपने बहण के हातो में थैली दे दी l शाम होने को आई थी l सुशीलाने मां के आने तक चावल  पकाये और अटहल की सब्जी बनाई l

५) अतिथ्य कोकण का?


श्याम हो गई l राजू की मां काम से लौटी l जब वह घर आई l तब उसने देखा की बच्चोने घर का जादातर काम पुरा किया है l तो उसे वह देख बडा ही संतोष हुवा l घर मे आने के बाद अपने जिजाजी से देर से आने के लिये उसने माफी मांगी l फिर अंदर जाकर हात पैर धोकर चाय फिर से बनाकर जिजा को दे दी l उसके साथ कूछ बिस्कीट भी दिये l उसके बाद वह हालचाल पुंछकर घर के काम मे लग गई l देखते देखते आठ बज गये l राजू की मां ने खाना बनाया l और राजू को काकाजी को खाना खाने को बुलाने को कहा.

राजू ने पथरी बीछाई l पानी का लोटा काकाजी को हात धोणे को दिया l फिर उनके हात पैर पोंछने को टॉवेल दिया l और खाना खाणे को बुलाया l सुशीला ने मां ने बनाई नागली की रोटी, अटहल की सब्जी, और तरह के बनाये व्यंजन परोसे l सुशीला ने बनाई हुई नरियलं की सोलकडी भी परोसी l इतना ही नहीं बगीचे के आम् की बनाई मिठी सलाद भी परोसी l काकाजी को खाना मन को भाया l वह बडे चाव से खाने लगे l बच्चों को साथ बेठणें को उन्होंने कहा l लेकीन उन्होंने मना किया l बाद में वह खायेंगे ऐसा कहा l

खाना खाते वक्त काकाजी बोले, “क्या तुम्हारा पती तुम्हे रुपये नही भेजता क्या? जो तुम काम पे जाती हो l”

 राजू की मां बोली, “ जी भेजते है की, पिछले महिने ही भेजे थे l घर की मरम्मत करवा ली बारिश के दिन आणे वाले हे ना l यहा पर तो मुसलाधार बारिश होती है l और घर पर बैठकर मेरा मन भी नही लगता तो क्या करें l घर में बिना काम के बैठकर मुफ्त की रोटीयां तोडना क्या अच्छी बात है क्या?”

काकाजी बोले, “ ए भी सई है l आदमी को हमेशा कोई ना कोई काम करना चाहिए l तभीं तरक्की होती है l”

 इधर उधर की बतियां करते करते काकाजी ने खाना खाय l और वह बाद मे बाहर की तरफ चले गये l राजू ने उनके सोने के लिये इंतजाम किया l उनके सिरहाने पानी का लोटा भी रखा l और वह खाना खाने चला गया l काकाजी वाडी मे टेहलने लगे l तबतक बच्चों ने खाना खाया l बाद में वह काकाजी के पास गये l तबतक वाडी मे टेहलकर काकाजी आये थे l बच्चोने उनसे एक कहानी सूनाने को कहा l काकाजी ने एक अच्छी पंचतंत्र की कहानी सूनाई l कहानी सून ते वक्त राजुने काका की तेलमालिश की तो सुशीला ने पैर दबाये l कहानी सुनने के बाद काकाजी सो गये l और बच्चे भी भितर सोने गये l रात के रसोई के काम निपटाकर राजू की मां भी सोने को चली गई l

सवेरा होते ही काकाजीने स्नान किया l और राजू की मां ने किया हुवा नाष्टा करके वह अपने गावं की तरफ निकल पडे l जाणे से पहले काकाजी को बच्चोने प्रणाम किया l और पुरे संतोष पूर्ण होकर काकाजी निकल पडे l बच्चे बस स्टॉप तक पहुचाने गये l गाडी आ गई l काकाजी ने कूछ रुपये बच्चो के हात पर रखें l और वह गाडी में चड गये l गाडी निकल पडी l बच्चो ने टाटा किया l

५) अतिथ्य कोकण का?


गाडी मे बैठकार काकाजी के दिमाग मे खयाल आया l की हम इन्को तुच्छता पूर्ण नजरिये से देखते हुवे भी बच्चो ने मेरा ठेहराव अच्छी तरह किया l अगर में अपने बहण के घर गया l तो उसके बच्चे मुझे पानी तक ना पुछते l और ये बच्चे अपने घर मे मेहमान आये l तो जो भी रूखा सुखा हो वह देकर उनका आदरातिथ्य भली भाती करते है l गरीब हुवा तो क्या हैं l उनकी मेहमान का अतिथ्य करने की रीत तो अमिरो को भी ना आयेगी l ऐसा कहकर वह अपने गावं कोल्हापूर की तरफ चले गये l

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Wednesday, April 3, 2024

४) उजाले की ओर

 ४) उजाले की ओर

४) उजाले की ओर


निर्मलाजी का जन्म एक मध्यमवर्ग स्तर के परिवार मे हुवा l जन्मतहा वह एक बुद्धिमान लडकी थी l दिमाग तेज होने के बावजुद भी उसे उसके योग्य शिक्षा नहीं मिली l वह चाहती तो एक डॉक्टर या इंजिनीयर बन सकती थी l स्कूल मे हमेशा सबसे उच्चतम गुण पाती थी l लेकीन घर की आर्थिक स्थीती अच्छी ना होणे के कारण उसके प्रतिभा योग्य शिक्षा न मिल सकी l उसने फिर कला शाखा मे शिक्षण लेते हुवे एक स्कुल टीचर का कोर्स किया l वहा भी वह टॉप पर थी l इस कारण उसे जल्द ही एक स्कूल मे अध्यापिका की नोकरी लग गई l पढाई करते वक्त ही उनकी शादी हो गई l उनका घरबार ठीक था l उनके पती एक मेकॅनिक थे l उनके साथ काम करने वाले लोग कहते की आप एक टीचर होकार एक मेकॅनिक से शादी कैसे की आप इतनी सुंदर है l कोई ना कोई अच्छा अध्यापक मिल ही जाता l तब उनका दिया हुवा जवाब बडाही मार्मिक था l वह काहती के मेरा पती मोटर मेकॅनिक है तो क्या हुवा l है तो एक डॉक्टर ही ना l जिस तरह एक डॉक्टर रुग्ण को ठीक करता है l उस प्रकार बिगडी गाडीया मेरा पती ठीक करता है l वह हर वक्त हसी खुशी रहती थी l हर दम चेहरे पर मुस्कुराहट रहणे के कारण उनसे बाते करने में कईयों को आनंद मिलता था l बडे बुजुर्गो से लेकरं छोटे बच्चे भी उन्हे मास्टर जी ही बुलाते थे l


स्कुल मे हमेशा कूछ तो मनमुटाव होता ही है l कई स्कुल संस्थापक के बगल बच्चों की साजीश के कारण उनकी बदली शहर के नजदीक वाले स्कूल के उप विद्यालय मे करवा दी l वह उप विद्यालय शहर के नजदीक बिखरी हुई मजदूरों की बस्ती के नजदीक था l वहा के मजदुर के लडके बहुत ही चलाख थे l उनमे बुध्दीमत्ता कुट कुटकर भरी थी l वह एसी मिट्टी के बने थे, की जो बहुत ही उपजाऊ या मुलायम हो l लेकीन आजतक उन्हे योग्य आकार देणेवाला कोई कुम्हार या किसान नहीं मिला था l निर्मलाजी की जब वहा नियुक्ती हो गई l तब उसने देखा l स्कूल की इमारत बहुत बेचिदा हालत में हैं l लेकीन उसे वहा ही पढाना होगा l पहली दफा जब वह दसवी कक्षा के वर्ग मे पढणे गई l जब कक्षा मे प्रवेश किया l तब टेबल के नीचे बच्चोने फटाके फोड दिये l जिस कारण उनकी साडी पर कई ठीकरे गये l और वह थोडी जल गई l जब हेडमास्तर जी को यह बात पता चल गई l तब वह छात्रो को शिक्षा करने हेतू पधारे l तब निर्मला जी ने उन्हे रोका l

और कहा कूछ नहीं सर, ये तो छोटे बच्चे है l तब हेडमास्तर जी बोले, “ मॅडम इन लोगो की कर्तुत को नजर अंदाज ना करो l इनका बरताव खुंकार बिगडे जानवरो के भाती है l उनके कारण इस स्कूल का नाम खराब हो गया है l इनके तेवर बहुत ही बुरे है l लकडी के बिना उनकी मकडी ठीक नहीं होगी l


निर्मलाजी हेडमास्तर की बातो से सहमत नहीं थी l उन्हे लगता बच्चे तो बच्चे होते है l खेल कुद् की उम्र मे अगर शैतानी नहीं करेंग तो क्या बुढापे में करेंगे l लेकिन वह चुप्पी साद के बैठ गई l कूछ ही दिनों मे निर्मलाजी ने अपने अध्यापन और स्कूल के इतर कामो में अपना कौशल्य दिवाकर बचौ पर छाप बनाई l उन्होंने मन में ठाण ली की वे इस स्कूल के बच्चो में ऐसा बदलाव करेंगी l और उन्हे उन्नती के कगारपर उच्चतम स्थान पर खडा करेंगी l के सभी ओर उनकी तरक्की के चर्चे ही चर्चे होंगे l


इसकी पहली मंजिल की सिडी का पहला पाव उसने स्कूल की मरम्मत से सुरु किया l अध्यापक, छात्र की एकजूट करके चंदा मांगकर उन्होंने स्कूल की हालत सुधार दी l स्कूल के मैदान में अलग अलग कुशलता बढाणे हेतू बदल किये l स्कूल के बच्चों का मानस टेस्ट किया l उनके अंदर छिपे गुणों को भाटकर उसके अनुसार शिक्षा देणी शुरू की l सुंदर हस्ताक्षर होणेवाले बच्चो की मदत से स्कूल की दिवारे पेंट करके उनपर अध्ययन के डिजिटल रूप दिये l


निर्मलाजी को मानसशास्त्र विषय में बहुत ही रुची थी l वह छात्र देखकर उसकी मानस स्थिती समजती थी l हर इतवार के दिन वह बच्चों के लिये महत्त्वपूर्ण तासिका लेती थी l बच्चों को व्यावहारिक कुशलता, तथा व्यवसाय प्रशिक्षण, व्यापार, अर्थ का नियोजन इस प्रकार का ज्ञान देती थी l इसके लिये संगणक का इस्तेमाल करके उन्हे दुनिया के बाजार मे हम कैसे आगे बढे उसके बारे मे ज्ञान देती थीl उनके इस तरीके के पढाई के कारण उनके स्कूल के बच्चों ने बहुत तरक्की की, स्कूल के बच्चे हर क्षेत्र मे चमकणे लगे l बच्चे उन्हे मास्टर जी के नाम से बुलाने लगे l


स्कूल के कूछ अध्यापक को निर्मलाजी के प्रति बच्चों का स्नेह देखकर जलन होती थी l

वो हर वक्त उनके उपक्रमो में कूछ गलतिया मिलती है क्या? हर वक्त धुंडते रहते थे l उनमें से एक थे महेंद्र सिंग वह एक रईस घराणे मे से थे l उनको नोकरी संस्था के कोटे से लग गई थी l वो स्कूल मे चमचमाती कार मे बैठकर आते थे l हर दिन नया कुर्ता, घडी, अलग स्टायल का गॉगल लगाके आते थे l स्कूल के बच्चों से दुरी बनाके ही रहते l पढाना तो नहीं आता था l लेकीन बडी बडी डींगे हाकता था l निर्मलाजी से हरवक्त झगडता रहता l एक दिन जोर की बहस हो गई l बात मुख्य हेडअध्यापक तक पहुंची l तब हेड अध्यापक ने निर्मलाजी के तरफ से बोलते हुवे कहा, “ सर जी पहले आप पढाना सिको l ए सुट बूट पहनकर शायनर मत बनो l निर्मलाजी नही होती तो आज इस स्कूल को ताला लग जाता l ये ध्यान में रखो l”

तब वह गुस्सा होके वहा से निकल गया l उसका बदला लेने की उसने ठाणी l और एक दिन रात के वक्त स्कूल मे डुपलिकेट चाविया बनाकर उसने निर्मलाजी के खाने से उनके उपक्रम की फाईल चुराकर ले गया l और उसे जला दिये l दुसरे दिन जब पता चला की निर्मलाजी के लोकर में चोरी हुई है l तब बच्चो ने भाप लिये की उसके पीछे किस लोमडी का दिमाग है l उनमे दसवी छात्र के बच्चे बहुत ही चिडे थे l उन्होंने महेंद्र सर को सबक सिखाने की ठाणी l और वह सवेरे टेहलणे जाते थे l उस वक्त कूछ बाहरी अपने दूर के मित्रों को बुलाकर उसे टेहलने गये वक्त आकेला पाकर उसकी पिटाई की उस दिन से उसका व्यवहार बदल ही गया l क्यो की वह अब जान चूका था l की उसके पीछे कोण होगा l


साल पर साल बितते गये l स्कूल मे निर्मलाजी ने अनेक उपक्रम चलाये थे l कूछ सालों बाद निर्मलाजी अब रिटायर हो गई थी l एक दिन वह अपने परिवार के साथ घुमने के लिये एक किल्ले पर गये थे l किल्ले की सैर करके वह जब लौट रहे थे l तब रास्ते में एक भेल का ठेला उन्होंने देखा l वहा पर बहुत भिड थी l वो भी भेलं खाने के लिये रुके l एक लडका आकार भेल् देकर चला गया l भेल खाकर वह उसके पैसे देने के लिये ठेले के पास गई l तब ठेले के पास रुपये लेनेवाले लडके ने उनसे भेल के पैसे लेने से इन्कार किया l और उनके पैर उसने छुये l और वह बोला , मॅडम आपने मुझे पेहचाना नहीं l”


निर्मलाजीने अपने आंखों का ऐनक ठीक किया l और गौर से देखा l एक सुंदर युवक उनके सामने खडा था l

वह बोला, मॅडम मे अशीश आपका छात्र, जिसे आपने जीने की कला शिकाई l आप जो इतवार के दिन जादा तासिका लेकरं हम बच्चो को व्यवहार कुशल उद्योग के बारे में पढाती थी l उस कारण मेरे जैसे कई छात्र आज अपने पैरो पर खडा होकर स्वावलंबन से कमाई कर रहे है l”

४) उजाले की ओर


निर्मलाजी ने उसे पहचाना l फिर भी वह अपने भेल के पैसे देने लगी l लेकीन उसने लेणे से मना किया l निर्मलाजीने उसे आशीर्वाद दिया l और वह चल पडी l निर्मला जी आज बहुत खुश थी l उन्होंने जो उपक्रम स्कूल के नाकरा कहे गये बच्चों के लिये चलाया l वह अब यशस्वी हो गया था l उन बच्चो के लिये निर्मलाजी एक सुरज देवता की तरह थी l जिस प्रकार सूरज अपने असंख्य अंशू से सारी वसुंधरा प्रकाशमय बनाता है l उस प्रकार अपने किय गये उपक्रम से अनेक बच्ची के जीवन मे उजाला निर्मलाजीने लाया था l अपने घर की तरफ जाते वक्त गाडी मे उन्हे एक सुकून सा लग रहा था l उन्होंने बच्चों को उजाले की ओर जाने की राह दिखाई थी l महात्मा गांधीजी का मुलोद्योगी शिक्षा का उपक्रम जो निर्मलाजी ने चलाया था l वह अब यशस्वी हो गया था l


उस प्रकार ही निर्मलाजी की सोच थी l वे कहती ती की जो शिक्षा आपमे विनम्रता, साहस, स्वावलंबन और दो वक्त की रोटी कमाने का ज्ञान दे lवह सही शिक्षा है l

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Friday, March 29, 2024

३)प्रलयकाल

3) प्रलयकाल

३)प्रलयकाल


सभी ओर अंधेरा छा गया था l मानवता खत्म हो रही थी l एक ही अनुवंश के संकर से बने लोग एक दुजे का गला काट रहे थे l चन रूपये, पैसे , जवाहरात के लालच में एक दुजे के खून के प्यासे बन गये थे l वे अब रो रहे थे l सूरज देवता का सफेद प्रकाश सिकुड गया था l और आकाश की अंधियारे में उसने विचित्र चुल्हे के निखारों की भाती रंग इक्तियार लियां था l जिस प्रकार चुल्हे के निखारे बुझते वक्त दधकते है l उस प्रकार सूरज की लालिमा दिख रही थी l झूठ का सहारा लेकरं कमाई गई संपत्ती के बारे में सोचकर अनेक लोग रो रहे थे l अंधियारा कब हटेगा l उसके बारे में पूछ पूछ कर वैज्ञानिको को हर बार फोन करके सता रहे थे l वह उन्हे कहते की हमारा सबकुछ ले लो l हमारे लिये एक ऐसा यान बनावो जो सुरज की गुरुत्व के बाहर होणेवाली वसुंधरा के माफिक दुजा ग्रह हो वहा पर हमे छोड आये l ताके हम दुजा जीवन जी सके l ये सुरज अब कामका नहीं रहा l कब फुटे और हमे निगल जाये पता नाही l कृपा करो सोना लो चांदी लो लेकीन हमे बचालो l सभी ओर अंधियारा छा गया है l फुल, पौधे तो क्या सभी वृक्ष, लता अब बुरे हालत मे जा चुके हैं l

३)प्रलयकाल


सृष्टी की सभी बर्फ पिघल चुकी है l उसके कारण सागर का जलस्तर इतना बड गया है की उस कारण सागर समीप होनवाले बडे शहर कब के जलमग्न हो गये है l इस कारण वहा रहणे वाली जनता इधर उधर का आसरा धुंडती हुई घुम रही है l लेकीन झुठी संस्कृती की चादर ओढे हुवे लोग उन्हे आसरा देणे से मुह फेर रहे है l झूठ की राह पर चलने वाले लोग आखों से आसू बहाकर अपने भविष्य के बारे में सोच रहे हैं l वहा सच्चाई के राह पर चलने वाले लोग हस कर भगवान को प्यार और शांती की गुहार लगा रहे हैं l सृष्टी की हालत नर्क से बत्तर हो गई है l सूरज आसमान में आग् बबुला होणे से सागर के पानी की जलद ही भाप होकर पासवाले खंड पर जोर से बारिश गिरा रही हैं l जिसकी एक एक बूँद मुसल की भाती लग रही हैं l

लोगो ने कूछ सालों में इकठ्ठा किया हुवा अनाज ही उनकी उदर निर्वाह का साधन बन गया था l

भारत वर्ष के एक गाव मे एक छोटासा बारह वर्ष का लडका रहता है l उसका नाम शंभू है l वह अपने घर से बाहर आकर देखकर फिर अंदर जाता है l और अपने मां से पूंछता है l की यह बारिश कब रुकेगी l और अच्छी तरह उजाला कब दिखेगा l

तभी उसकी माँ बोली, “ भगवान हमसे रुठ गया है l”

तब वह बोला, “ क्यो रूठ गया है l में तो हर दिन उसकी मुरत पुजता हुं l”

“ वह तूमसे ही नहीं, पुरी सृष्टी बरबाद करणे वाले हर एक से रुठ गया है l जिनको बुध्दी की देन उसने दी l वही अब सृष्टी को नर्क की आग मे धदकते हुवे छोडे है l इसलिये यह प्रलयकाल आया है l इसमे जो अच्छा है वही तरेगा l बुरा डुब मरेगा l

“ लेकीन मां यह अच्छा बुरा क्या हैं? हम कैस पहचाने उन्हे?”

माँ बोली, “ जो सच्चा हैं l नेक हैं l अच्छे कर्म करता है l दान धर्म करता है l प्यार बाटता हैं l विनम्र है l वही अच्छा है l”

“ अब वह बाते छोड और यह ज्वार का डिब्बा ले l जा और चक्की से आटा बनाके ला l जो रात दिन पिसने का काम कर रही है l”

अपनी मां के कहे बोल उसकी कानो में गुंज रहे थे l उसने ज्वार का डब्बा लिया और वह चक्की की तरफ चला गया l जाते वक्त बारिश से बचने हेतू उसने एक छाता लिया ज्वार का डिब्बा अपने सिरपर रखकर उसपर छाता खोले हुवे अपने नन्हे हातों से उसे संभालते हुवे वह चक्की में आया l अपना डिब्बा चक्की के कठडे पर रखकर वह एक कोने मे जाकर खडा हूवा l और इधर उधर देखणे लगा l

वहा पर आई हुई औरते आपस में बतीया कर रही थी l

एक बोली, “ क्या करें, कल किसने देखा है l जो भी दिन मिले हैं वह भगवान के नाम में लगाउंगी l कुछ भी कहो, थोडे बहुत हुवे जाने अनजाने हुवे पाप धुल जायेंगे l”

दुसरी बोली, “ हाय राम! कैसा यह काल आया हैं l हमारी जान लेकरं ही छोडेगा l में ने तो अभी जवानी के हसी पल भी नहीं देखे l “

थोडी देर बाद अपना आटे का डिब्बा डब्बा लेकरं वह अपने घर की तरफ जाने निकला l तो सडक के एक कोने में एक खैराती नल के पानी पर अपने बर्तन लेकरं धोणे के लिये एक मुस्लिम युवती आई थी l उसने शंभू के हात मे आटे का डिब्बा देखा तो वह बोली, “ क्या आटा बनाने गये थे क्या?”

 शंभू बोला, “ हा, क्यो?”

वह युवती बोली, “ कुछ नहीं , मुझे भी थोडा दे दो न, मेरी अम्मा बहुत बिमार है l घर में अनाज का दाना तक नहीं l दो रोटी का ही सही, दे दो न आटा l”

“ ना बाबा ना, मै न दू आटा, तुम्हे आटा देकर हम क्या भुके रहे l उस पर तुम हो एक मुसलमान, में न दू? मैने सूना है l तुम बुरे हो l गाय काटकर खाते हो?

“ अलाह कसम? मैने तो आज् तक गाय का मास एक बार भी नहीं खाया l हमारे घर में दो वक्त की रोटी के लाले है l और मास कहा से लाये? कभी कबार बकरी ईद को मिला था l वो भी प्रसाद स्वरुप l मैने नहीं खाया l दया करके दे दो न दो रोटी का आटा?”

उसके कहे पर ध्यान न देकर वह उसे झूठा कहकर अपने घर आया l और अपनी मां को आटा दे दिया l मां ने आटा गुणकर चुला फुंका और आटे की रोटिया बनाने लगी l शंभू को बडी भूक लगी थी l तो वह छोटीशी ताटली लेकरं चूले के पास आकर बैठ गया l और मां को रोटीया शेकते हुवे देखने लगा l

थोडे ही देर में मां ने आटे की रोटी बनाकर उसकी ताटली मे डाल दी l और थोडीशी चटणी भी डाल दी l शंभू ने एक निवाला तोडा और अपने मूह में डालने लगा l तो उसके सामने उस मुस्लिम युवती की छबी उभर आई l उसे बहुत ही बुरा लगा l उसका उदास और याचक की तरह दिखनेवाला चेहरा उसके सामने आ गया l वह खाना खाना छोड के उठा उसने वह रोटी और माने बनाई दुसरी रोटी भी ले ली और अपने कमीज मे छिपा ली l वह घर से बाहर की तरफ भागा l मां पीछे से बोली, “ शंभू किधर जा रहे हो l खाना तो खाके जावो l बाहर बारिश हो रही थी l शंभू भिगते हुवे ही चक्की के पास होणे वाले मकान के पास पहुंचा l वहा चक्की के पास होणेवाले औरतों से उसने उस मुस्लिम युवती के बारे मे पूंछा l और उनके बताये हुवे मकान मे वह घुस गया l उसने देखा की एक औरत चार पाई पर लेटी हुई है l और वहा पर बंद चुले के पास बैठी हुई हैं l वह उदास है l घर में इधर उधर उसने देखा l घर में खाणे के लिये कुछ नहीं है l उसने अपने कमीज के अंदर रखी हुई रोटिया निकाली और उसे दे दी l उसके आंखो से आसु छलक रहे थे l उसने शंभू को भिगा हुवा देखा और टॉवेल लेकरं उसके गिले बाल पोंछने के लिये बढी l

तो शंभू बोला, “मुझे जाना है l मां राह देख रही हैं l मैं कल रोटी लेके आऊंगा यह कहकर वह घर से बाहर निकला l

वह जब बाहर आया l उसने देखा की एक बडी कतार में हिंदू साधूओ का जथा वहा से गुजर रहा है l वह लोग परमेश्वर का नाम लेते हुवे जा रहे हैं l और उससे क्षमा मांग रहे हैं l वह गुजरे नहीं तो थोडी देर में और एक जुलूस शंभू ने देखा l बडे दाढीवाले फकीर वहा से गुजर रहे है l उन्होंने कंबल ओढ रखा था l वह शिसक रहे थे l और कह रहे थे l ‘हे परवर दिगार हमे माफ कर दो l’ शंभू को बडा ही अचरज हुवा l की ये लोग इस तरह किधर जा रहे है l वह उनके पीछे गाव की एक छोर तक चला गया l गाव की सीमा पर होनेवाले मंदीर से एक तेज दिव्य रोशनी दिखाई दे रही थी l उसके सामने कूछ लोग साफ किये हुवे नारियल फोड रहे है l उसने आगे जाकर देखा l तो मंदीर के गर्भगृह की भगवान की मुरत तूट गई है l और उससे वही तेज रोशनी निकल रही है l जो उसने थोडी देर पहले देखी थी l वह रोशनी उत्तर दिशा की तरफ जा रही थी l वह सब देखकर उसे अचरज हुवा l उसे अब घर की याद आई l वह पीछे मुडा l और घर की तरफ जाणे लगा l बारिश जोर से हो रही थी l वह रुकने का नाम नहीं ले रही थी l रास्ते में बहुत कीचड हो गया था l उसमें चलने के कारण पाव मैले हो गये थे l वह घर की तरफ जाणे लगा l तभी उसे चर्च की घंटा सुनाई दी l वह उधर मुडा l और चर्च की तरफ चलता गया l रास्ते में उसे एक कब्रगाह लगी l वहा से आगे वह चर्च की तरफ चला गया l वो चर्च के अंदर गया l वहा भी उसे मंदीर की तरह दिव्य रोशनी दिखाई दी l वहा चर्च मे एक सफेद कपडा पहणे हुवे एक पाद्री थे l उसके गले में एक क्रॉस का लॉकेट था l वह रो रहे थे l उनकी आँखो से आसू गिर रहे थे l उन्होंने जब शंभू की तरफ देखा l की एक नन्हा सा लडका चर्च में आया है l तब उन्होंने गौर से देखा l और वह बोले, “ ए लडके चला जा यहा से, कुछ देर बाद सबकुछ नष्ट होणे वाला है l देख उधर वह पवित्र किताब जल रही है l थोडी देर मे यहा से दिव्य शक्ती जाणेवाली है l उसके बाद वह कब्रगाह से गढे मुर्दे उठणे लगेंगेl उनमें से कूछ बुरे है l वह तुम्हे जकड ना ले l जल्दी भाग जा अपने मां के पास, वही तेरे लिये सबसे सुरक्षीत जगह है l क्यो की प्रभू की माता पर बहुत कृपा है l क्यो की वही ही बस प्रभू का कार्य कर रही है l जा चला जा l वह बाते सूनते ही वह वहा से भागने लगा l

भागते हुवे उसने देखा की कब्रगाह में गढे़ मुर्दो के उपर् की मिठ्ठी हिल रही है l और उनमे से आवाज निकल रही है l कूछ चिल्ला रहे है l ‘ इन्साफ करो, इन्साफ करो ‘ तो कूछ शिसक शिसक कर रो रहे थे l और हमे माफ करो ऐसा कह रहे है l तो कूछ गुस्से से चिल्ला रहे है l शंभू डर गया l और अपने घर के तरफ भागा l अपने घर जाते वक्त वह घर के पीछे होणेवाले रास्ते से गया l घर के पीछे जब वह पहुंचा l तब उसने देखा l की घर के पीछे होनवाले नारीयल के पेड के नीचे बहुत सारे नारीयल गिर गये है l पेड पर चडा हुवा एक आदमी नीचें उतर आया l और शंभू की मां से बोला, “ दीदी काम हो गया l मै अभी चलता हुं l”

 माँ ने शंभू की तरफ देखा वह मुस्कुराई, और उसे बोली, “ चलो घर में जल्दी बारिश के कारण कितना भीग गये हो l खाना भी नहीं खाया l”

शंभू को अचरज हुवा वो की मांने उसे क्यो नहीं डाटा l क्यो की वह मां को बिना पुंछे घर से बाहर गया था l शंभू को मां घर में लेकरं आई l उसको टॉवेल लेकरं वह पोंछने लगी l बादमें उसने उसे खाना खाणे को बिठाया l

उसने खाना खाते वक्त अपने मां से पूंछा की इतने सारे नारियल उसने बरबाद क्यो किये?

तो मां बोली, “ मैने कहा बरबाद कीये, वह तो मैने शिवजी को रिहा कर दिया है l”

“ वो कैसे” शंभू ने पूंछा l

“ कैसे मतलब l शिवजी ने जन कल्याण हेतू नरियल के फल रूप अपना कार्य किया l तो अब अगली सृष्टी के चयन हेतुं मैने नारियल के फल काटकर मुक्त किया l

माँ की बाते उसकी समज में नहीं आ रही थी l उसने खाना खाया l और सभी बर्तन उठा के रसोई घर के कोने मे रख दिये l और मां के पास जाकर बैठ गया l अचानक धरती हिलने लगी l घर के छप्पर उडणे लगे l शंभू डर गया l अपनी मां से जाकर लिपट गया l मां ने उसे अपने आचल में छिपा लीयां l मां के मुख से शिव नाम निकलने लगा l वह भी शिव शिव कहने लगा l थोडे ही देर में जल जला आया l और पानी का बडा बहावं आया l सभी लोग उसमें बहणे लगे l नाक - मुहं में पानी चला गया l सभी ओर लोगो के चिल्लाने की आवाजे आने लगी l शंभू अपनी ममां को चीपक गया था l वह पानी में मां के साथ बहने लगा l सभी ओर पानी ही पानी हो गया l जमीन कब की पानी मे समा गई l इधर उधर चिल्लाने की आवजे आने लगी l शंभू तैरने की कोशिश करने लगा l

३)प्रलयकाल


लेकीन वह तैर नहीं पा रहा था l इतने में उसे हलका हलका महसुस होणे लगा l थोडी देर में उसे एक लकडी का तुकडा मिला l उसपर वह बैठ गया l उसने इधर उधर देखा l तो कई लोग डुबकर मरे हुवे है l उनके शव पानी में तैर रहे थे l इतने में उसने एक शव देखा l वह हुबहू उसके जैसा था l उसने फिर आस पास देखा l कई लोग पानी के उपर चलते हुवे जा रहे थे l थोडी देर में एक समुद्री बेट जैसा कूछ दिखाई दिया l वाहा पर तेज रोशनी थी l वह वाहा चला गया l वाहा पर उसने देखा की वही चर्च का पाद्री खडा है l वह शंभू को देखकर् बोला, “ तुम भी आ गये l चलो आजावो मेरे पास बैठ जावो”

३)प्रलयकाल


शंभु ने इन्कार किया l और वह अपने उस लकडी पर बैठकर आगे निकल गया l तब उसे आगे नर्क सी जगह दिखाई दी l वाहा पर एक आदमी नींचे गिरे गिडगिडाता दिखाई दिया l उसने गौर से देखा l तो वह जॉन था l जो चोरी करता था l जीसे बहुत से किडे नोचकर खा रहे थे l वह घबरा कर फिर पानी की तरफ चला गया l और अपने लकडी पर जाकर बैठ गया l और आगे निकल गया l थोडी देर मे उसे आगे दुसरा बेट दिखाई दिया l वाहा पर कई मुसलमान उसे एक पेड को बंधे हुवे मिले l वो रो रहे थे l उन्हे एक आदमी कोडे लगा रहा था l उसके आगे जब वह गया तो उसने देखा l उसके घर के नजदीक रहणेवाले अब्दुल चाचा जिसकी चार बिबिया थी l जो अपने पहली बिबी को छोड चूका था l जो बिमार थी l उस अब्दुल चाचा के पैर मे अंगार बीछे हुवे है l वह घबरा गया और आगे दौडता गया l तब उसने देखा की वहा पर एक बाग है l वहा सुंदर झरने के पास वही मुस्लिम युवती बैठी हुई है l जिसके पैरो में फुल बिखरे हुवे है l जिनसे महक आ रही थी l

वह उस युवती की तरफ गया l उसने पुंछा की तुम यहा क्या कर रही हो l तुम्हारी मां कहा हैं?”

वह बोली, “ क्या कर रही हो याने, मै तो मर कर कहा जाउँगी l अलाह के पास मे ही न l”

वह बोला, “ क्या तुम मर गई हो?”

“ हा मै मर गई हुं l मैने मेरी माँ की सेवा की इसलीये अलाहने मेरे पैर मे फुल बिछाये है l”

शंभू बोला, “ तुमने ऐसा क्या काम किया है l तुम तो गरीब हो l तो ऐसा क्या काम तूमने किया?”

वह बोली, “ मै हर रोज नदी पर जाकर लोगो के मैले कपडे धोती थी l जो भी रोटी मुझे मिलती उसमे से थोडी मै खाती l थोडी अपनी अम्मा को खिलाती l और एक तुकडा हमारे गली के भुके कुत्ते को खिलाती l इसलिये अलाह ने मेरे पैरो में फुलो की चादर बिछाई है l और कहा आवो नेक बंदी तुम्हारा जन्नत में स्वागत है l”

शंभु बोला, “ अब तुम यही रहोगी घर नहीं जाओगी l”

“ कैसा घर? कोणसा घर? वह तो पूरी तरह से जलजले में बरबाद हो गया l अब वह जमीन नष्ट हो चुकी है l वहा अब बुराई की खान हो गई थी l इसलीये परम ईश्वर अल्लाह ने उसे मिटा दिया है l अलाह हमे अब दुजी जमीन पर भेजेगा l हमारा पाप पुण्य देखकर अलाह हमे दुजे सुरज मंडल में होनेवाले सूरज के पास होनेवाली वसुधापर जो उसने बनाई है l उधर देख वहा उबलती हुई कढाई में पक रहा हैं l वही कासिम जो मुझे बेचने ले जा रहा था l आज तक कितनी लडकियों को उसने बुरे काम में लगाया l उसकी हालत देख l और वह करीम मीया जिसने कितने निर्दोष लोगो को मारा l अब उसे जिंदा करके गिधो द्वारा नोचने की सजा दिलायी है l देखा क्या हालत हो गई है उनकी l

शंभू बोला, “ तो क्या मेरी भी हालत वैसी ही होगी l”

“ ना, तुम तो मासूम हो l तुम से जाणे अनजाने में भी कोई पाप नहीं हुंवा होगा l तो कैसे सजा मिलेगी l” वह बोली.

तभीं वह प्रेषित आये l उन्होंने बिना शिलाया सफेद रंग का कपडा पहना था l वह बोले, “ आवो बच्चे मेरे पास आवो l तुम ने बडा ही नेक काम किया है l”

शंभू डर गया l

“ अरे डर मत, देख वह उजाला पवित्र परम आत्मा का, यही अलाह है l जो तुझे पहले भी दिखाई दिया है l तुम्हारी मां तुम्हारे हातों से भुके लोगो को खाना भिजवाती थी l तुमने भी भूकी रुबिणा को खाना दिया था l बोल क्या चाहिए तुमको?"

शंभू बोला, “ मुझे मेरी मां चाहिए l”

तब प्रेषित हसकर बोले, “ठीक है l में तुम्हारी राह देखता हुं l” और उन्होंने अपना हात उठाया l वह बोले, “चलो मै तुम्हे राह दिखाता हुं l”

 उनके हात से तेज रोशनी निकली l उससे एक दिव्य ज्योत निकली l वह चमकने लगी l

प्रेषित बोले “ जावो इस ज्योती के संग, वह तुम्हारे मंजिल तक पहुंचा देगी l”

शंभु उस ज्योती की राह पर चलता गया l वह ज्योती उसे एक जगह पर ले गई l वहा पर एक बर्फ के जैसा पहाड था l उसके नीचे स्वर्ग से सुंदर हरियाली देख रही थी l वहा एक बडी चट्टान पर बैठे व्याघ्र चर्म, रुद्राक्ष धारण कीये हुवे त्रिनेत्र धारी तेजस्वी शिव शंकर दिखाई दिये l वह उनके नजदीक चला गया l तभी शिव शंकरजी ने उसे गोदी मे उठाया l और प्यार से कहा, “ सत्य की राह पर चलने वालों का जीवन सुंदर ही होता है l जावो वहा पर दिव्य शिवलिंग के पास तूम्हारी अम्मा वहा पर बैठी है l

३)प्रलयकाल


वहा पर जाओ l उससे मिलो l मै तुम दोनो को अगले पडावं को भेज दुंगा l वह भागते हुवे गया l वहा पर उसके जान पहाचान वाले थे l कूछ को तो वह जानता भी नही था l लेकीन जब मां से मिला तब वह फुलो नहीं समाया l वह अपने मां के पास गया l उसे लिपटकर रोने लगा l मां ने उसके आसू पोंछे l उसे प्यार किया l उसे गोदी मे बिठाया l थोडी देर बाद उन्हे दुसरे पाडाव पर ले जाणे के लिये एक गण आया l वो उन को वहा से ले गया l शंभू उसके साथ जाणे लगा l जाते वक्त उसने पीछे देखा l सभी और अवकाश की पोकली है l वहा पर एक दिव्य रोशनी है l उसके जरिये अलग अलग जगह प्रकाश की रेखा जा रही है l वहा पर भगवान् के अलग अलग रुप दिख रहे हैं l अब उसे लगणे लगा , की कोई धर्म, मजहब नहीं है l यह तो परमेश्वर का खेल है l और हम उसकी शतरंज के प्यादे l वह जैसा नचाना चाहेगा वैसा सब कूछ चलेगा l सिर्फ कर्म पर हमारे निर्भर सब है l उसने नीचे देखा अब वहा पानी ही नहीं था l वहा पर अवकाश और अनेक तारे दिखाई देने लगे l वह हलका महसुस करने लगा l

३)प्रलयकाल


गण ने उसे अवकाश के एक ओर लाकर उसके शिर्ष पर रुद्र रखा l और वह मंत्र पठण करने लगा l तो शंभू एक स्मृतिभस्म दिव्य ज्योती में परावर्तीत हुवा l उसके बाद उसने उसे किसी ओरा सूर्य मंडल की वसुधा पर अपना कर्म करने के लिये भेज दिया l

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Sunday, March 24, 2024

२) यहा पर कुछ तो पवित्र गिरा है l

 २) यहा पर कुछ तो पवित्र गिरा है l



महाराष्ट्र राज्य में बहनेवाली कृष्णा सरिता के तटपर बहुत उपजाऊ मिट्टी है l जिसमे गन्ना, हरभरा, चावल, ज्वार की हरिभरी फसले खेती में लहराती है l कृष्णा के पानी से यहापर जीवन खिला है l वहा पर कई सारे गाव बसे हुवे है l उस हरेभरे गावो में बसा एक गाव था l वहा पर एक जमिनदार रहता था l उसका नाम था मधुसुदन पाटील l पुर्वजों के जायदाद का वह अकेला वारिस था l गाव की अधिकांश नब्बे प्रतिशत जमीन का वह अकएलआ मलिक था l उसके पुर्वजों ने राजा और राज्य की रक्षा हेतू बलिदान दिया था l इस सेवा के लिये राजा ने उन्हे इनाम में यह जमीन का तुकडा दिया हुवा था l अधिकांश जमीन में से गाव के लोग तथा नजदीक गाव में रहणेंवाले मजदुरोसे काम करके उपज निकाली जाती थी l उसके खेत में से निकलनेवाले अनाज पर ही गाववालों का गुजारा चलता था l उसके पूर्वज सक्त मिजाज के थे l वह गाववालों से तथा मजदुरो से बहुत ही सक्ती से पेश आते थे l

मधुसूदन का व्यवहार उसके पूर्वजो से बहुत ही विभिन्न था l उसका बचपन अधिकांश मजदूरो के बच्चो के बीच खेलते हुये गया था l उसका यह मजदूरों के बच्चों के साथ खेलना कुदना उसके दादाजी और दादिजी को को नहीं भाता था l वह हर वक्त उसे दाटते थे l गुस्सा होते थे l एक दिन यह मजदुर तेरा घात करेंगे l लेकीन वह उसपर ध्यान नहीं देता था l वह केहता की वह मेर भरोसा कभी तोडेंगे नहीं l

समय बितता गया l बच्चे बडे होते गये l मधुसूदन अब बडा जमीनदार बन गया l और उसके साथ खेलनेवाले मजदूरों के बच्चे उसके जमीन पर मजदूरी करते थे l वह अब बडा था l तो उसे खलीहान का काम देखने जाना पडता l तो उसे बहुत ही बुरा लगता l की उसके मित्र खेत मे मजदूरी करते l और गरिबी मे जिते थे l वह हर बार उनके बारे में सोचता रहता था एक दिन उसने सोचा, की मेरा कुटुंब तो बहुत ही छोटा है l और मेरी खेती बहुत बडी हैं l इसमे से आधी जमीन तो मैं करता ही नहीं, क्यो ना ईसे मैं बाट दूं l यह अच्छी बात है l इस योजना को उसके घरके लोगो ने विरोध किया l तब भी उसने उनकी एक ना सूनी l और नदी से लेकरं पहाडी तक होनेवाली उसकी जमीन मे से आधी जमीन उसने अपने खेत में काम करणेवाले मजदूरों में बाट दी l लेकीन उनसे एक वादा लिया की वह लोग उसकी खेतीं में काम करेंगे l ताकी उसका घरबार चलता रहे l

मजदुर भाईयो को आधी जमीन बाट दी गई थी l इस कारण वह अब उसके मालिक बन गये थे l

कुछ सालो में उनकी आर्थिक परिस्थिती सुदर गई l इस कारण उनके बाल बच्चे खुशहाल जीवन बसर करने लगे l समय गुजरता गया l अब जमीनदार बुढा हो गया l आधी जमीन से भी उसकी बहुत तरक्की थी l मजदूरों की अगली पिढी जो थी बहुत खुशहाल जीवन जी रही थी l तरक्की के कारण उनको बुरी आदते लग गई थी l उनको जमीनदार की जमीन पर मजदूरी करना गवारा लग् रहा था l वह अब पिछ पीछे जमीनदार को गाली गलोच करते थे l जमीनदार को जब यह बात पता चली तो उसने उन्हे काम पर बुलाना बंद किया l और आस पडोस के गाव से मजदुर लाने लगा l पुराणे मजदुरो के लडको को जादा काम न होने के कारण वह जादा देर बेकार रहते थे l उस कारण उन्हे बूरी आदते लग गई थी l वे दारु पिना, जुवा खेलना इन जेसी बुरी आदतों के कारण उनका आर्थिक स्तर नीचे जाणे लगा l उनको मिली हुई जमीन से उनक गुजारा न होणे पर वह चोर्य कर्म करणे पर उद्युक्त हूये l वह जामीनदार के खेत से रात के समय चोरी करणे लगे l रात को अनाज, घास, लकडिया वह चुराने लगे l चोरी हो रही है l यह बात जमीनदार के नोकरो के ध्यान में आई l तब उन्होंने गस्त लगाकर उन्हे पकडा और कडी सजा देनी चाही l लेकीन जामीनदार को उनके भविष्य को लेकर उनपर दया आई l और उसने उन्हे ताकीद देकर छोड दिया l नोकरो ने कहा यह गलत कर रहे हो साहब l हमारे घाट की कहावत है l चोर और घास के बींडे को कभी ढील न देणी चाहिए l वर्णा वह अधिक नुकसान देह होती है l

बुरी आदत लग् जाये तो वे छुडे ना छुटे l मजदूरों के लडके अब बहुत बिघड गये थे l कूछ तो नशा पानी भी करणे लगे l उसके लिये वह लोग और चोरी करणे लगे l जमिनदारने उन्हे अपने मित्रों के बच्चे अपने बच्चे समजकर छोडा था l लेकीन वह उसे कायर समजणे लगे l “ यह क्या हमे शिक्षा देगा l हमारा बस चले तो हम इसका नामोनिशाण मिटा देंगे l उनके दिमाग में कुविचार आने लगे l व सोचणे लगे की यह जमीनदार कितना अमीर होगा l इसका परिवार इतनासा इसे किसलिये इतनी जमीन जायदाद चाहिए l उनके दिमाग में कुविचार की नागिण अपने विषैले विचारों का जहर फैलाने लगी l उन्होंने जमीनदार और उसके कुटूंब को खत्म करणे का निश्चय किया l

उन्होंने जमीनदार और उसके परिवार को खत्म करने का निश्चय किया l वह अपनी योजना बनाने लगे l एक दिन अचानक रात को लुटेरो का भेस लेकरं उन लोगो ने जमिनदार की हवेली पर हमला बोल दिया l 

२) यहा पर कुछ तो पवित्र गिरा है l



हमले को विरोध करते हुवे बहुत से नोकर मारे गये l बाहर हवेली के गहजब देखकर जमिनदार ने जान लिया की अपना परिवार खतरे में है l उसने अपने घर के जेवर तथा कूछ संभालकर रखे हुवे रुपये अपने बच्चों के हात में देकर उन्हे हवेली के खुपिया रास्ते से निकाला l तब तक हवेली का बडा दरवाजा तोडकर वे लोग अंदर आ गये थे l तभी उनके पकड में जमिनदार की बीबी आई l उन्होंने उसे धर दबोचा l और घसिटते हुवे हवेली के मुख्य दालन में लेकर आये l और जमिनदार को भी पकड लिया l

वे लोग उससे रुपये, जेवरात, और उसके घर - जमीन के कागजाद के बारे में पूछताज करने लगे l तब वह चीड गया l उसने उन्हे पेहचान लिया था l वह चोरी नहीं तो उसकी ज्यायदाद छिनना चाहते है l वह बोला तुम चाहे आकाश पाताल एक कर दो l तुम्हे कूछ नहीं मिलेगा l तुम लोगो को मैने जमीन दे दी l तुम्हारे खाने की तजवीज की, और तुम इसका एहसान मानने के बजाय मेरे घर में डकेती करने आये हो l ये मेरे वंशजो के लिये मैने कमाया हैं l बो भी पुरी प्रामाणिकता से , यह मैं तुम्हे किसी भी हाल में देनेवाला नहीं l

तब एक बोला, “अगर जिंदा रहोगे तो ही उन रुपये, पैसो का इस्तेमाल कर पावोगे ना और तुम्हारे वंशजो को तो हम खत्म कर देंगे l तब यह जायदाद किसे मिलेगीl”

वह लोग गुस्सा होकर उसे मारणे लगे l तो वह बोला, “ तुम लोग यह गलत कर रहे हो l भगवान सब कुछ देख रहा है l उसकी लाठी जब पडेगी तब आवाज नहीं करती l लेकीन तुम्हे पता चलेगा l मैने तुम्हे रोटी के लिये जमीन दे दी l और तुम मुजसे ही दगाबाजी कर रहे हो l शरम आनी चाहिए l मै तुम लोगो से दुजे जमीनदारों की तरह व्यवहार करता और अनाज के लिये तरसाता, तुम्हाला शोषण करतात , तब तुम्हे पता चलता l तब तुम लोग रेंगते हुवे मेरे पाव मे गिडगिडाते l और मेरे सामने इस तरह खडे होणे का धैर्य नहीं जुडा पाते l” तब एक बोला, “ बोलणे में वक्त जाया मत करो l ले चलो घसिटत्ते हुवे l”

 तब एक ने एक जोर का मुक्का मारा l जमिनदार फर्शपर गिर गया l उन्होंने उसे घसीटते हुवे हवेली से बाहर खिचते हुवे लाये l उसकी बीबी को भी वह खिचते हुवे ले आये l उन्होंने उसके सामने तेज धार वाली सुरी से जमिनदार की बिबी का गला काटा l वह खून से लतपत फर्श पर पडी l वह देखता रह गया l उसने उन से हतापाई करने की कोशिश की लेकीन उसकी एक न चली l उसके बाद उसे घोडे से बांधकर घसिटते हुवे खलीहान में लाये l उसके घर वालो के बारे में, बच्चो के बारे में पुंछा l लेकीन वह मार खाता रहा l पर कुछ नहीं बोला l उसने उन्हे खुपिया रास्ते कबका भेज दिया था l

वो अपने आप को बचाने के लिये चिल्लाता रहा l लेकीन कोई नहीं बचाने आया l फिर उसने भगवान से मदत की गुहार लगाई l वह बोला, “ हे भगवान बचावो l” अब उसके शरीर से खून निकलकर उसका बदन खून से भिग गया था l उसके बदन पर बहुत सारे जख्म हो गये थे l अब पुरा बदन दर्द कर रहा था l अंत समय उसे रहा न गया वह बोला,

“ देखा हैं फुल, पौधो और पेडो ने l देखा है इस उपजाऊ मिट्टी ने ना मैने किसी का शोषण किया, ना मैने किसी को लुटा l सत के राह पर चलने की सजा आज मुझे ये मिली l मेरी गुहार भगवान ने भी ना सुनी l में शाप देता हुं l जिस जमीन के लिये इन लोगो ने मेरी हत्या करनी चही l वह ही इन्साप करेगी l इन लोगो को इनके किये की सजा जरूर मिलेगी l

और मेरे बाल बच्चों को उनका हिस्सा मिलता रहेगा l इतने में एक ने उसके पीठ में छुरा मार दिया l बहुत सारा खून बह गया l और जमीनदार ने अंतिम सास् ली l उसके मृत शव को वही खलीहान में छोडकर वे चले गये l उसके बाद हवेली में सभी ओर उन्होंने धुंडा l तो उनके हाथ ना कोई धन मिला ना कोई रुपया l कुछ नहीं लगा l उन्होंने खूपिया रास्ते की भी खोज की लेकीन उनके हात असफलता लगी l जामीनदार के वंशजो को उन्होंने मारणे के लिये खूब धूंडा l लेकीन वह नहीं मिले l तबतक वह नदी पार करके जा चुके थे l

वहा से निकलकर वह दूर एक शहर मे जाकर बस गये l वहा पर उन्होंने अपने पास होणे वाले रुपयो से एक मकान और एक जमीन का तुकडा लिया l और जो भी काम मिले वह वो काम भी करने लगे l वह जिंदगी बसर करने लगे l

इधर उन मजदुरों के बच्चों ने उस जमिन के हिस्से किये और बाटकर उसमे खेती करने लगे l लेकीन वह कितनी भी मेहनत करे उनके परिश्रम के आधे हिस्से से भी कम उस जमीन से अनाज पैदा होता l आमदनी अठ्ठण्णी और खर्चा रुपया l इस तरह हालत मजदूरों के बच्चों की होणे लगी l उस खेत- जमीन से अगर घर के चूल्हे के लिये लकडी लाते l तो वह चुल्हे में डालते तो वह एक तिनके की तरह फुर्र होकर जल जाती l वह कितनी भी मेहनत करे l वह गरीब ही होते जा रहे थे l उन्हे सफलता नहीं मिलती थी l हर एक मजदुर के घर में झगडा हमेशा रहता था l उनका जीवन नर्क से बत्तर हो गया था l जिन लोगो ने उस जमिनदार को मारा l वह एक एक अपघात होकर मर गये l किसी को साप ने काटा l तो कोई बिमार होकार मरा l उनके बच्चे बडे होकर उस जमीन मे मेहनत करने लगे l लेकीन उनके मेहनत का भी आधी से कम अनाज मिलने लगा l

एक दिन वहा से एक साधू महात्मा जा रहे थे l थोडी देर के लिये वहापर रुक् गये l उनको देखकर कूछ मजदुर महीलाये उनके दर्शन को गई l उन्होंने साधू जी को फल, फुल अर्पण किए l साधू जी खुश हुवे l और वरदान मागणे को कहा l औरतो ने अपने खेत की इस समस्या के बारे में बताया l तब साधू ने सोचा अगर मेरे तपोबल के सहारे उनके खेत् का बुरा साया निकल गया तो अच्छा हैं l तो वे उस खलीहान में उन मजदूरों के साथ चले गये l उन्होंने अपने हात मे एक पानी का कमंडलू लिया l उसमें पवित्र जल था l वह वहा पर सिंचित किया l तब वहा की जमीन हिलने लगी l पेड, पौधे हिलने लगे l वहा की फसल खिलखिलाकर हसणे लगी l वह बोली, “ जाओ चले जाओ, तुम्हारा क्या यहा काम?”

२) यहा पर कुछ तो पवित्र गिरा है l


तब साधू बोले, “ तुम कोण हो? इस खेत का अनाज खाकर इन गरीब मजदूरों पर जुलूम कर रहे हो l”

तब वहा की धरती बोली, “ कैसा अन्याय? कोणसा अन्याय? ये पापी, इन्के पुरखे पापी, यहापर अन्याय नहीं न्याय ही हो रहा हैं l में हुं यहा की न्यायदेवता l एक बीज कहे दुजे बीज को निपज हो आधे से अधुरी, इनकी मजदूरी ही इन्हे मिले l “

२) यहा पर कुछ तो पवित्र गिरा है l


तब साधू बोले, “ लेकीन तुम कौन हो l यहा के मजदुर का इन्साफ करने वाले, मैं अपने हात के इस पवित्र जल से तूम्हे नष्ट कर दूंगा l

“ अरे ओ पुण्यपुरुष ना आव देखा न ताव लगे बडी चडी बाते करने l तुम्हारे तप से भी यहा कूछ पवित्र है l जो परमेश्वर के भाती समान है l यहा पर कूछ ऐसा गिरा है l जो की सत्य से भी महान है l सत्य ही ईश्वर है l क्या तुम ईश्वर से बडकर हो l”

साधू बोले, “नहीं मैं नहीं हुं l लेकीन क्या है पवित्र यहा l”

धरती बोली, “ यहा पर गिरा है खून जमिनदार का, जो दया और करुणा का सागर था l जिन पर उपकार करे वही अपकार करे l अन्नदाता को जो भूल जाये l वह कैसे इन्साफ के लायक l हम हमारा काम करेंग l आधे से जादा अनाज जायेगा उनके हिस्से जो इसके हक्कदार है l”

साधू पुरुष ने धरती मां की बाते सुनी l और आखें बंद कर ली l और अपने अंतरिक शक्ती से जाना की एक आदमी बाजार गया हैं l उसको अनाज उसके औसत मूल्य के आधे से भी आधी किंमत मे मिल गया हैं l तब उसने भूत काल मे झाका l तब उसके सामने सभी हकीकत आ गई l”

 फिर आँखे खोलकर साधू ने मजदूरों से कहा की यहा पर बहुत ही बूरा हुवा है l आप के परिवार सदियों तक भी चाहे यहापर पुरा अनाज निकाल नहीं पायेंगे l तुम्हारी पिढीया दर पिढीया जाती रहेगी l फिर भी तुम्हारी उन्नती धिमी रहेगी l तुम लोग जिधर भी जाओगे यह शाप आपके साथ चलता जायेगा l जैसी करणी वैसी भरणी l तूमने एक बार मारा l वह तुम लोगो को तिल तिलकर मारेगा l

तब मजदूरों ने उनसे पूछा की इसका कोई उपाय नही क्या?

तब साधू जी बोले, “ नहीं इसका कोई उपाय नहीं l जब तक सृष्टी हैं l यह चलता रहेगा l जब तक जमिनदार के वंशज अपने पेट के लिये मेहनत करते रहेंगे l तबतक उन्हे उनका हिस्सा यह धरती मां देती रहेगी l जो नियत से अच्छा हो l उसकी राह में काटे बिछा ओगे , तब वो तूम्हारे पावं में ही चुबेंगे l अब हर बार आप लोग जब भी अनाज बोवोगे और काटोगे तब धरती से अपने हिस्से का आधा अनाज जो मेहनत का होगा वही देने के लिये पूजा करो l तो काश तुम्हारे व्यवहार हे खुश होकर यह धरती प्रसन्नता से आधा तो देगी l

साधू ने झुककर उस धरती को नमन किया l और अगली यात्रा के लिये प्रस्थान कर गयेl


Sunday, March 17, 2024

१) पवित्र गाय

१) पवित्र गाय

१)  पवित्र गाय



महाराष्ट्र राज्य के पश्चिम प्राकृतिक संपदा मे स्थित सह्यगिरी नामक पर्वत के दरो मे बहुत सारे गाव नदियों के किनारे बसे हुवे है l यहा के प्रदेश मे बहनेवाली नदियों के कारण यह प्रदेश सुजलाम सुफलाम बन गया है l सह्य की शृंखला से निकलकर पुरब की तरफ बहनेवाली कृष्णा तथा उसकी उपनदीया बारिश के मास मे बहुत उफान पर होती है l इन नदियों के किनारे सहयगिरी की ओर घाट मुलुख मे छोटे छोटे गाव है l उसी घाटी में शिवापूर नामक एक गाव है l उसके एक तरफ से नदी बहती है l तो दुजी ओर घनी पहाडी और उसके दरे मे उतारो पर सिडी की तरह खेती है l उस गाव के लोग खेतीबाडी करके अपना गुजारा करते थे l उस गाव मे एक मुहल्ला है l मुहल्ले में कूछ मुसलमान भाई रहते थे l उस में से एक घर अब्दुल्ला का भी था l वह किसान था l उसके घर की आर्थिक परिस्थिती बहुत ही बेचीदा थी l दिन भर हिंदू भाईयो के साथ खेतीबाडी पर काम करके मिलनेवाली मजदूरी से किसी तरह गुजारा चल रहा था l पूर्वजों से मिला हुवा एक छोटासा जमीन का तुकडा और दो – चार बकरीयां तथा गाव मे एक छोटा सां मकान यही उसकी संपत्ती थी l उसकी शादी हुई थी l उसकी बीबी एक गरीब घर से थी l अलाह की कृपा से उसे दो गोरे चट्टे और खुबसुरत बच्चे थे l हर पल उसके सामने उनके भविष्य को लेकर चिंता रंगी रहती l

वह बारिश के दिन थे l एकाएक जोरसे मुसलाधार बारिश होने लगी l उस कारण वश घर से बाहर निकलना मुश्किल हो गया था l उसके कारण काम भी रुक गया था l मछली पकडणे जाये तो जाये कैसे? नदी का पानी उफान पर था l घर में होने वाले चावल का गाडा पानी पकाकर और नजदीक रहणे वाली हिंदू बहण पार्वती अम्माने दिये हूवे नाचणी के कडी से चार – एक दिन गुजारा करने लगे l पाच – छह दिन के बाद बारिश थम सी गई l उस दिन सबरे वह मछली पकडणे के लिये नदी की तरफ गया l नदी अभी भी जोर शोर से बह रही थी l उसने पानी में जाल फेका ; तभी उसे एक बछडे की आवाज सूनाई दी l उसने आवाज की तरफ ध्यान दिया l आवाज नदी किनारे होणे वाली घलई से आ रही थी l नदी के तट पर मछली पकडणे के जाल का एक छोर उसने पेड की टहनी से बांधा और

वह आवाज की तरफ जाणे लगा l तो नदी के किनारे एक पेड के निचे उसने देखा की वहा पर गाय का एक बछडा फसा हूवा है l पानी में भिगणे के कारण वह काप रहा था l जब बछडे ने देखा, कोई इन्सान है l तो वह उसकी तरफ दया की नजर से देखने लगा l अबू के मन में उस बछडे के प्रति स्नेह जागृत हुवा l उसने उस बछडे को निकालने का प्रयास सुरु किया l लेकीन बारिश के कारण बहुत फिसलन हो गई थी l इसलिये वह उस बछडे को निकाल नही पा रहा थाl इसलीये वह जाल की रस्सी लाने के लिये नदी के किनारे गया l उसने जाल को पानी से निकाला , और वह उसकी रस्सी छुडाकर ले आया l उसने उस रस्सी के एक छोर को पेड से बांध दिया l और पानी में उतरकर उसने उस बछडे को निकालने का प्रयास सुरू किया l नदी के पानी का बहाव बहुत तेज था l उसने रस्सी से उस बछडे को बांध दिया l और उस बछडे को पानी से निकाल दिया l किनारे आने के बाद अपने आपको सुरक्षित पाकर बछडा अबू को प्यार से चाटणे लगा l अबू को भी उससे बहुत प्यार आया l उसने उसे एक पेड को बांध दिया l और मछलीया पकडणे के लिये उसने जाल को पानी में फेक दिया l और कूछ मछलीया पकड ली l और वो गाय के बछडे को लेकर घर वापस आ गया l उस के बीबी ने तरह तरह के सवाल पूछे l लेकीन जादा बाते न करके उसने पकडी हुई मछलियों की थैली अपने बिबी के पास देकर गाय के बछडे को उसने गोठे में बकरीयों के साथ बांध दिया l उसके बाद उसने एक फटे हुवे कंबल से उस बछडे को अच्छी तरह से पोंछ दिया l उसके बाद रसोई घर से चुल्ले के अंगार लाकर उसने छोटे से लहू के टोकरे में आग जलाई l और उस बछडे को सेक दिया l

उसके बाद उसने उसे पानी पिलाया, और चारा डाल दिया l उसके छोटे से बच्चे दौडते हुवे आये l आपने घर में आये, इस नन्हे मेहमान का स्वागत करणे, तथा उसके साथ खेलने और उसका आतिथ्य करणे के लिये दौड कर आये l अपने हातो से उसे सेहलाने और खिलाने लगे l

कूछ दिन के बाद बारिश के कारण इधर उधर हरियाली छा गई ; और गाय का बछडा भी तंदुरुस्त हो गया l तब अबु अपनी बकरीयों के साथ उस बछडे को भी चराणे के लिये लेके जाणे लगा l थोडे ही दिनो में बछडे की कांती हरिभरी घास पूस खाकर सुधर गई l और वह बहुत ही सुंदर दिखने लगा l दिन गुजरने लगे l एक दिन हरदिन की तरह अबू अपने जानवरों को चरवा रहा था l हरियाली मे बछडा और बकरीयां उचलकुद करणे लगे l तभी वहा से एक हिंदू साधू दक्षिण भारत की यात्रा पर जा रहे थे l उनके साथ कुछ उनके शिष्य भी थे l जो कन्नड प्रांत के मठ जा रहे थे l वह हिंदू पाठशाला के छात्र थे l उन्होंने देखा की एक म्लेंच्छ अपनी बकरीयां चरवा रहा था l उसके पास एक बछडा भी है l जब साधू ने देखा तो वह उन्हे बहुत भा गया l वे गाय के बछडे को निहारणे लगे l उसका अप्रतिम सौंदर्य बहुत ही अचरज करणे वाला था l एक पवित्र गोमाता के लक्षण उस में थे l उन्होंने नजदीक जाकर पता किया की वह गोरा है , या गोरी l जब उन्हे वह एक मादा है, पता चला तब वह सोचने लग गये, की यह बछडा इतना अच्छा है l लेकीन यह मुसलमान जादा से जादा उसे दो- चार साल तक संभालेगा l और एक दिन किसी कसाई को बेच देगा l क्यो न अभी ही उसे इस का योग्य मूल्य देकर ये बछडा मै ले लू l वें अबू के पास गये l और उन्होंने पूछा की ये गाय का बच्चा किसका है ?

 अबू बोला, “ ए तो मेरा है l क्यो आपको क्या काम है l”

साधू बोले, “ मै एक मठ का अधिपती हूं l मुझे ये गाय का बच्चा मेरे मठ के लिये चाहिए l उसका योग्य जो भी मूल्य हो मैं चुकता करणे के लिये तयार हूं l”

“ ना बाबा, ना मै ना बेचू उसे.”

 साधू बोले, “ अरे, तू कितने साल तक उसे संभालेगा l उसे अच्छा हट्टा कट्टा बनाके कसाई को ही एक दिन बेचेगा ना, तभी तो में बोलू की यह मुझे बेच दे, में उसे वर्तमान गाय का मूल्य चूका दूंगा l”

अबु बोला, “ अरे भाई, तू गाय का मूल्य दे या बैल का, मैं ना बेचु मेरे बछडे को, और कसाई को बेचने के लिये, मैं इसे नही पाल रहा हुं l”

साधू बोले, “ अरे भाई, तुम सोचो की तुम एक मुसलमान हो l गाय को पालने का काम तुम कैसे करोगे l मुझे दे दो उसका दान.”

अबू बोला, “ अरे भाई तुम भी बहुत हटी हो l जाओ मै कोई दानवान देनेवाला नहीं l जीस तरह कोई मां अपने बेटे को नहीं बेच् सकती l उसी तरह मैं न बेचू और दान देणे के लिये तुम क्या गरीब हो l तुम तो संन्यासी तुमे क्या जरुरीl”

साधू बोले, “ठीक है l तुमने अगर ठान ही लिया हैl तो सूनो, यह बछडा अच्छी गाय की जाती का है l तुम इसे पालोगे तो तुम्हारे घर में लक्ष्मीजी की बरसात होगी l लेकीन इसे कभी भी बेचने का खयाला दिमाग में न लाना, और कभी भी इसे किसी कसाई को न बेचना l मुझे जबान दो l”

अबू बोला, “ठीक है l जब तक मेरे जान मे जान है l ईसे कभी नहीं बेचुंगा l न काटने के वास्ते दुंगा l अल्हाह की सौगंद खाता हुं l मैं इस की सदैव रक्षा करुंगा l”

इसके बाद साधूने उससे जाणे की अनुमती ली l और वे वहा से चले गये l जाते वक्त साधू से उनका एक शिष्य रास्ते में बोला की, क्या वह यवन अपना शब्द पालेगा l

साधू बोले, “ कयो नही पालेगा? उसने उसके मानने वाले परमेश्वर कि शपथ जो ली है l और उसका व्यवहार और बछडे से प्यार दिखाई नहीं दिया क्या तुम्हे l जब हम बाते कर रहे थेl तब उसने उसे बडे प्यार से अपने पैरो के बीच जकड लीया थाl”

शिष्य बोला, “ हम चाहते तो उससे वह बछडा छिन भी सकते थे l”

साधू, “ हम अगर उससे छिन् ने की कोशिश करते, तो यह अनुचित व्यवहार होता l वो अपनी जान पे खेल जाता l वह एक नेकदील इन्सान है l उसके चेहरे से सत्य का ओज दिख रहा था l”

शिष्य बोला, “ लेकीन वह तो मुसलमान उसकी जबान का क्या है भरोसा l कब मुकर जाये वह l उस बछडे को खिला - पिला के तयार करेगा, और ईद के दिन कुर्बान करेगा l और दावत देगा l

साधू बोले, “ ना ..ना… वह कभी नहीं बदलेगा l हिंदू क्या और मुसलमान क्या सभी परमपिता के बच्चे , परमपिता ने तो पुरुष और स्त्री बनाई l यह जातपात,धर्म , मजहब तो इन्सान ने बनाये है l चलो अभी सूरज चढ रहा हैं l अभी हमे बहुत दूर जाना है l”

और वे निकल पडे l

उस दिन से अबुको उस बछडे से कूछ जादाही लगाव हो गया l वो बडी खातिरदारी से उसकी देखभाल करणे लगा l दो चार सालो मे उस बछडे का गाय मे परिवर्तन हो गया l अबू ने उसका नाम लक्ष्मी ही रखा लक्ष्मी के कारण उसके घर मे खुशिया आ गई l साधू के कहे अनुसार वह दिखणे में भी बहुत ही सुंदर थी l उसका गेहुवा रंग और मुलायम से छोटे बाल दिन को सूरज की रोशनी मे तक तकाते थे l उसके शिंग रसोई घर में होणेवाली आरी की तरह वक्र और नुकिले थे l जिनको देखने के बाद यह अभास होता की मानो प्रतिपदा की चंद्र कोरे खिली हो l लचीले पैर, चिकणी पिठ, और सुडौल लंबी गर्दन के कारण लगता की वह कामधेनू की ही पुत्री हो l पूंछ तो धरतीपर टिकी हुई l उसके चलते वक्त वह हिलाती तो एक नव युवती साज श्रृंगार करके अपने बालो को सजाके आई हो ऐसे लगता l पहली उपज में उसने एक अच्छी नसलं वाले गोरे को जन्म दिया l उसका दूध पिकर अबू के बच्चे बडे होणे लगे l घर खर्च के लिये दूध माखन बेचकर कुछ रुपये जुडणे लगे l इस कारण घर के खर्च का काम आसान हूवा l

१)  पवित्र गाय


 आजू बाजू के किसान आपस में गाय को देखकर ललचाकर आपस् में बाते करते ‘ काश यह हमे मिली होती l कुछ ने तो रुपये देकर खरिदने की भी बात चलाई l लेकीन अबू न माना तो उसे अपने खलीहान से घास भी जुडाने से अटकाव करते l तब अबू केहता जीसने पैदा किया वही पेट का इंतजाम करेगा l और कही ना कही से उस समस्या का हल निकल आता l गाय ने लागतात दो गोरे दे दिये l व गाय के साथ बढणे लगे l अछी नसल के होणे के कारण बचपन से ही उनके लिये खरिददार आते थे l लेकीन अबू ने उन्हे बेचणे के बजाय पालना बेहतर समजा l उनको बडा करके उनके द्वारा खेती के काम अबू करणे लगा l उससे मिलन वाले मुनाफे से उसने बचत करके अपने मकान की मरम्मत उसने करवाई l उसकी बीबी भी खुश थी l गाय के कारण घर मे बरकत आ गई l गाय के गोबर की धूप तथा इंधन के लीय इस्तेमाल वह करणे लगी l इस कारण चुल्हा चौका अच्छी तरह चलने लगा l

घर में गाय के आणे से प्रसन्नता आ गई थी l घर में आरोग्य का वास होणे लगा l गाय का दूध पीकर अबू के बच्चे हट्टे कट्टे होणे लगे थे l

घी में अगर मक्खी गिर जाये, और वह अनुपयुक्त बन जाये l उशी तरह गाव में बुरे विचार वाले लोग थे l गाव में रहणेंवाला अस्लम कसाई तो अपनी करणी से बुरा था l अबू की गाय उसके नजरो में सलती थी l वह गाव वालो को तथा अन्य मुसलमानों को अबू के खिलाफ भडकाने का काम करता था l एक बार गाय ने एक बछडे को जन्म दिया l उसके कूछ दिन बाद वह मर गया l अबू ने उसे ले जाकर खलीहान में दफन दिया l तब अस्लमने हिंदू भाईयो के कान भर कर उन्हे भडका दिया l उसने उन से कहा की अबूने गाय का बछडा काटने के लिये बेच दिया l तब गाव के मुखिया के साथ गाव की समिती ने उसपर बहिष्कार डाल दिया l कोई भी उसे खेतं के काम पर नही बुलाता l इस कारण घर का खर्च और मवेशीयों को पालना कठीण हो गया l अबू ने पैर पकडकर सब से कहा की गोऱ्हा मर गया था l इस लिये मैने उसे दफन किया l फिर भी लोग न माने l गाव के बावडी का पानी तक भरणे से मना कर दिया l उस कारण वह नदिसे पानी लाने लगा l उसकी बीबी शबाना को जब यह बात नजदीक रहनेवाली कमला चाची से मिली की अस्लम कसाईने ही गाव वालो के कान भर दिये है l तब वह आग बाबुला हो गई l एक दिन जब वह पानी भरणे गई थी तब उसे अस्लम कसाई रास्ते में मिल गया l तब उसने बहुत गलिया दीं l

“ अरे, ओ कसाई के बच्चे तुझे लाज शरम है के नहीं l मेरा मिया इद के बकरे को हलाल करने से भी डरता है l और तू कमीने ऊसपर गंधा इलजाम लगाता है l माटी मिले तेरा जनाजा निकल जाये l”

कसाई घर गया l थोडीही देर में उसकी बिबी तणतणाते हुंई आयी l और शबाना से बहस् करणे लगी l

“ अरे ओ करमजली मेरे मीया का जनाजा निकालने वाली तू जहनम चली जाये l बेडा गर्क हो जाये तेरा तेरी गाय को और तुझे एक साथ काटके कसाई खाने में टांग दुंगी मैं हा.. l”

तब शबाना को गुस्सा आया l वह बोली, “ अबी वो कसाई की चुडैल तुम्हारा ये तेवर जाकर अपनी सास को दिखाणा मारे सामने नहीं l मेरी गाय को काटना तो दूर रहा l मै तेरी बोटी बोटी करके चील कवे को खिला दूंगी l”. उन दोनो का झगडा इतना बडा की वे दोनो हतापाई पर उतर आई l तब गाव की औरते बिच में आई , और झगडा छुडवा दिया l

जाते जाते शबाना बोली, “ अल्हा सब कुछ देख रहा है l कयामत के दिन ना मैं उसके सामने तेरी गरदन पकडू तो मेरा नाम भी शबाना नही l”

 इस झगडे मे फुटा हुंवा मटका वही छोड कर वह अपने घर को वापस रोते हुवे निकल गई l

अबुने गाव के मुखीया से बातचीत की, मुखियाने उसके बात को माना, लेकीन शर्त रख दी, की तुम बछडे को दफन किये जगह को खुदवा के दिखा दो l तभी मे और लोग मानेंगे l तब अबू ने अपना मन मारकर वह दिखाने की बात मानी l दुसरे दिन गाव वालो के सामने खेत में खुदाई करके उसने वह गडा बछडे का शव निकाल कर दिखाया l अधसडे शव की गंधी बास इधर उधर फेलने लगी l सब लोग नाक पकडकर दूर जाणे लगे l मुखीयां ने उस शव को दफनाने को कहा l सभी लोग अस्लम कसाई की छी थू करणे लगे l अबू ने उसे फिर से दफनाया l उसके बाद वह घर लोटा l उसने स्नान किया l उसकी बिबी नाराज थी l वह अल्हाह को बुरा भला कहने लगी , की उसने ऐसा पाप हमसे क्यो करवाया l तभी वहा पर पडोसी सलमा आई l और बोली, “ तेरा मिया कभी निमाज नहीं पडता l कभी भी मैने उसे मस्जिद जाते हुवे नहीं देखा l इस लिये अल्हाह खफा हो गया है l इतना ही नहीं उपर गाय पालकर उसका नाम भी काफर नाम से रखा है l”

तब अबू बोला, “ नमाज का मतलब जानती भी हो क्या? सलमा बहण, नमाज एक पवित्र रिवाज है l जो पुरे प्राण एक करके परम अलाह का शुक्रिया अदा करणे का रीवाज है l इस के लिये कही मश्चिद जाणे की जरुरत नहीं हैं l सच्चे मन से कही से भी खाते पिते काम करते हुवे सभी जगह पर एक मिनट के लिये सही आखे मुंदकर उसका नाम लो वह समज जायेगा की बंदा उसे याद कर रहा हैं l अगर वह मुजसे खफा होता तो मुझे इतनी प्यारी गाय न देता l यह तो मुझे अल्हाह ने दे दी हैंl मेरे जैसे बंदे पर उसका कृपाप्रसाद है यह तो l यह कोई साधारण गाय ना है l अल्हाह की गाय है l अल्हाह की l”

सलमा को यह बात पसंद न आई l वह अपना मुह फुलाकर बोली, “ चूप कर मारे सामने ये चिकणी चुपडी बाते ना करो l अल्हाह की गाय l केहता है करमजला l अरे, कूछ दिन बाद बुढी हो जाएगी l तो अपने आपही कसाई को बेच् दोगे l

काफरो के संग रहकर काफर की जबान बोलता हैं l हुं किसी को कूछ भला कहने जाये तो भला तुम्हारे दिमाग में भूसा भरा हैं l इसलीये ही गडा मुर्दा निकालने की सजा दे दी अलाह ने l”

तभी अंदर से शबाना बोली, “सलमा, चूप कर और निकल जा मेरे घर से l अगर हमने गलत किया है l तो वो अल्हाह जाणे और हम, तुम्हे खपा होणे की जरुरत नहीं l”

शबाना का तेवार देखकर सलमा उठ गई l और जाणे लगी l जाते हुवे वह बोली, “ भलाई का तो जमाना ही नहीं रहा l” और वह चली गई l उसके बाद शबानाने अल्हाह को बूरा भला कहा इसलीये ऊससे माफी मांग ली l और खाना खाणे के लिये अपने पती को आवाज दी l लेकीन उस दिन अबू का खाणे में मन नहीं लगा l वह अंदर के कमरे में जाकर चारपाई पर भुके पेट सो गया l

गाववालोने अब बहिष्कार उठा लिया था l लेकीन कुछ लोग उसे अभी भी काम नहीं देते थे l इसलीये वह नदी के पार जाकर काम करता और जानवरों का खाना जुटाता l

बारिश के दिन आये l नदी का बहाव कभी बडता तो कभी कम होता था l एक दिन पानी कम था l उस दिन जानवरों के खाणे की किल्लत थी l इसलीए उसने गाय और बैलो को छोडा l और उन्हे चराणे के लिये तथा घास का जुडाव करणे हेतू वह नदी के पार ले गया l उसने कूछ घंटे उन्हे चराके उनके रात के खाणे के लिये एक छोटासा बिंडा बांध दिया l और उन्हे लेकर अपनी गाव की और निकल पडा l जब वह नदी के किनारे आया l उसने देखा नदी का जलस्तर बड गया था l सांज हो गई थी l कुछ भी करके नदी पार जाना था l उसने पानी के बहाव का रुख देखा और अंदाज लगाया l उसने बैलों को पानी के बहावं में उतरणे की कोशिश की लेकीन पानी के बहावं को बैलों ने बाफा और वो डरकर पिछे हट गये l अबू को कुछ सूज न रहा था l तब लक्ष्मी गाय. किनारे होतें हुवे नदी की उपरी क्षेत्र गई l उसके जवान बैल भी उसके पीछे चल दिये l दुजे किनारे जिना कठीण था l लेकीन उपरी क्षेत्र जाकर लक्ष्मी ने नदी के पानी मे छलांग लगाई l और तिरछे पानी काटते हुवे वह चली l तब उसके बैल भी उसके पीछे चले l और असानी से उसने दुजा तीर पार किया l अबू ने गाय की चलाखी देख ली थी l वह भी अपने घास के बिंडे के साथ गाय जहा से उतरी थी l वहा से पानी मे उतर गया l उसने बींडा पानी में फेका और वह उसपे चढ गया l और पानी को तिरछे काटकर जाणे लगा l लेकीन दुजे किनारे जातेवक्त पानी के तेज बहाव के कारण वह दूर जाणे लगा l तब उसने पानी मे छलांग लगाई बींडा बस गया l और वह पानी को कापणे लगा लेकीन बहावं तेज था l उस कारण उसे अपने गाव के किनारे जाना कठीण हुवाl तो उसे एक पेड नजर आया l उसके तरफ तैरते जाकर उसने पेड का आसरा लिया l

वह डर गया था l अब क्या करे l उतने में उसकी गाय लक्ष्मी ने देखा l और वह फिर से पानी मे उतरकर उसके पास आई l और उसे रंभाकर पुकारणे लगी l तब अबू ने सोचा अब यही मेरा आसरा है l जो मेरी डुबती नैया पार करेगी l उसने अलाह का नाम लेकरं पानी में छलांग लगाई l और गाय की तरफ तैरते हुवे जाकर उसकी गर्दन को उसने पकडा l और वह लटकने लगा l और गाय उसे किनारे लेकर आयी l किनारे आते ही अबू की जान में जान आयी l उसके बाद वह अपने जानवरों को लेकरं वापस घर लोट आया l उसकी बीबी राह तक रही थी l अपने मिया को ठीक ठाक घर लौटते हुवे देख वह फुलो न समाई l अबूने गाय और बैलोंको अपने गोठे में बांध दिया l और चुल्हे के पास गरमी शेकने हेतू चला गया l

दिन गुजरणे लगे l लक्ष्मी के कारण अबू के घर में बरकत आने लगी l उसके बेटे भी बडे हो गये l घर का कामकाज संभालने लगे l अबू अपनी गाय के साथ जीवन की उतार को लग गया था l लक्ष्मी अब बुढी होणे लगी थी l अब उसके दात भी काम नहीं कर रहे थे l उसे चारा काटकर खाने में भी दिक्कत होती थी l लक्ष्मी के कारण उसके घर में दो तीन गाये भी निपज गई थी l बांधणे के लिये जगह भी नहीं थी l तब उसके बेटे कहने लगे की अब्बाजान लक्ष्मी अब बुढी हो गई है l क्यो ना हम उसे बेच दे l

अपने लडको की यह बात सुनकर अबू आगबबुला हो गया l और उसने इस बारे मे अपने बच्चोंसे झगडा भी किया l अबू बोला, “ मैने कसम खाई हैं l जबतक मेरी जिस्म मे जान है l तब तक मेरी गाय को बेचने का खयाला भी मत लाना l एहसान फरामोश हो तुम, तुम्हे पालपोसकर बडा करनेवाली वो गाय कोई साधारण पशू नहीं हैं l आज सबेरे रुबिना कह रही थी l वह बिलकुल सच है l की तुम उस अस्लम कसाई से बात कर रहे थे l वह पापी जिसने मुझे सारी गाव के सामने गढा मुर्दा जानवर निकालने के लिये कहा l वह कुछ रुपये देकर मेरी गाय को छिनना चाहता हैं l अरे, उसका बस चले तो अपनी अम्मा को तक काटकर बेच डाले l याद रखना मेरी गाय की तरफ बुरी नजर डालने वाले को समय आने पर मै अपना पराया भूल जाऊंगा l

अगर मेरी गाय पे जरा भी आच आई तो देख l तब उसका बेटा सलीम बोला, “ गाय अब बुढी हो गई है l और बिमार भी रहती है l अगर उसे घर में रखा तो दुसरी भी गाये बिमार हो सकती है l घर में छोटे छोटे बच्चे भी है l अगर गाय के कारण वह बिमार हो गये तो मै चूप नहीं रहुंगा l”

सलीम की बाते सुनकर अबू की आँखो से आसू आगये l उसने सोचा की जग कितना स्वार्थी है l जब कोई अपने काम का न रहता तो उसे दुत्खार देता है l फिर वह उठा उसने कुल्हाडी, फावडा और पार ली l और वह खेत की तरफ निकला l खेत मे जाकर उसने कुछ लकडिया और घास फूस इकट्ठा की और उससे उसने एक कुटिया बनाई l और लक्ष्मी को ले जाकर उसने वहा पर रख दिया l और अपने रहणे का इंतजाम भी उसने वहा किया l सिर्फ खाना खाणे के लिये ही वह घर जाता था l उसने दिन रात लक्ष्मी की सेवा में लगा दिये l

कुछ दिन बीत गये l सर्दी का मौसम आया l कुटीया में रहणे के कारण थंड बहुत लगती थी l अबू भी बुढा हो गया था l थंड के कारण वह जादा चल भी नहीं सकता था l सर्दी बड़ने लगी l गाय की हालत भी बत्तर होणे लगी थी l एक दिन बहुत थंड पडी थी l अबू का बेटा खाना देकर गया था l रात हो गई थी l चार्ज की गई टॉर्च भी धुंधली हो रही थी l उसकी रोशनी में अबूने खाने का डिब्बा खोला l खाणे से पहले एक निवाला गाय को खिलाया l लेकीन लक्ष्मी ने वह मुह में लिया लेकीन वह खा न पाई l उसे थोडा पानी पिलाया l और गाय को रात के सोते वक्त का चारा डाला l और उसने खाना खाया l थोडी देर बाद उसने देखा थंड के कारण गाय बहुत काप रही थी l थंड बहुत बढ गयी थी l अबू के भी हात पैर मे जकडण आ गई थी l अबुने रात में गाय के नजदीक जाकर देखा l गाय की हालत थंड के कारण बहुत ही बत्तर हो गई थी l घर से बाहर निकाले जाणे से उसे अकेलेपन का आभास हो रहा था l अबूने अपना कंबल गाय के उपर डाला l लेकीन वह आधुरा ही उसके शरीर पर बिखर गया l दुजा छोटा कंबल लेकरं वह चार पाई के पास पहुड गया l सर्दी बढने लगी l थोडी देर बाद टॉर्च की रोशनी भी बंद हो गई l

सबरे सबेरे अब्बा को चाय देणे के लिये चाय की छोटी सी किटली लेकरं सलीम आया l तब उसने अबू को चारपाई के पास कंबल लिपटकर पडे हुवे पाया l उसने किटली जमिन पर रखी l और अबू के पास वह गया l उसका शरीर थंडासा लगा l सासे भी चल नही रही थी l उसने इधर उधर देखा l तो गाय भी आकाश की तरफ मूह करके पडी हुईं थी l वह अबू का नाम लेकरं चिल्लाया l और रोने लगा l सुबह के वक्त खलीहान से दूर होनेवाली सडक पर जानेवाले साधू के जथ्थे ने वह आवाज सून ली l

उसमेंसे एक साधू बोला, देखो तो कोई रो रहा है l तभी वह आवाज की दिशा की और चले गये l वहा जानेपर पता चला की एक मुसलमान रो रहा था l और वहा पर एक गाय और एक बुढा मुसलमान मरे पडे हैं l एक साधू ने आगे जाकर उससे पूछताज की l उन मे से एक संन्याशी ने बारिकी से निहारकर देखा l और वह आगे बढा l उन्होंने एक नजदीक होणेवाले पेड का पत्ता तोडा l अपने हात के कमंडलू से थोडा पानी लेकरं उन मृत गाय और अबू पर सिंचा l और वह बोले, राम नाम सत्य है l जो आया वह चला जायेगा l और झुककर प्रणाम किया l और वह चले गये l

जाते वक्त उनके शिष्य ने उनसे पूछा, “ भगवन आप तो महान तपस्वी हो l आपने उस मृत मुसलमान के शव पर झुक् कर प्रणाम क्यो किया l वह निर्दोष प्राणिंयो को मारके खाते है l तो वह पापी ही हुवे ना l”

तब साधुजी बोले, “ बहुत साल पहले मै अपने गुरु के संग इस क्षेत्र से गुजर रहा था l तब यही मुसलमान अपने बकरीयों के साथ एक बछडे को चरा रहा था l तब मेरे गुरु ने उससे उस बछडे को देने के लिये बहुत प्रलोभन देकर उससे वह बछडा लेना चाहा l लेकीन वह मुसलमान टस से मस न हुवा l और उसने गुरुजी के सामने उस बछडे को आजीवन पालनेकी कसम ली l वह वही मुसलमान और वह बछडा वहा पे मरी हुई वही गाय थी l उसने अपनी कसम निभाई l बडे संत महंतो ने कहा हैं l की जो सच्चे मार्ग पर चलते हुवे अपनी सच्ची नियत के अनुसार आचरण करता है l वह संसारी होकर भी सत्वगुणी है l इसलीए मैने अपने कमंडलू का पवित्र गंगाजल उनपर चढाया l और प्रणाम किया l और उनके प्रती आदर जुटाया l”

ऐसे बातचीत करते हुवें वह अपने मार्ग पर चले गये l उधर सलीमने लोगो को बुलाकर अबू के जनाजे की तयारी की l और खेत के एक किनारे गाय और अबू को मिठी दे दी l इस तरह गाय के प्रती अपनी कृतज्ञता दिखाते हुवे अबू हमेशा के लिये अपना कर्म करके काल के पर्दे के पीछे हमेशा के लिये चला गया l

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