८) प्रकृती,पेड और मानव
जीवन मे पेड का बहुत ही जादा मतलब है l वसुंधरा पर होणेवाले पेड ही अपने जिंदा रहणे का महत्वपूर्ण अंग है l हमे जिंदा रखणे के लिये आवश्यक प्राणवायू यह पेड ही देते है l फल, फूल, अन्न, औषधी तथा निवारा इस जैसे महत्त्वपूर्ण प्राथमिक जरुरते पेड द्वारा पूरी की जाती है l हमारा गावं एक खुशहाल नैसर्गिक संसाधनो के बीच बसा हुवा है l गाव के आसपास के पहाडो से लेकरं दररो मे नदी के किनारे तक हरे भरे पेड पाये जाते है l शहर के दूषित माहोल से दूर सुंदर वन के नजदीक पंछियो की चीलकारी सुनकर एक अलग ही माहोल की अनुभूती होती है l हमारे गाव के आसपास पीपल, जामून, बरगद, आम्, अंजन जैसे कई तरह तरह के पेड पाये जाते है l
हमारे गावं के पास एक शिवजी का मंदीर है l उसके आस पास बडे बडे पेड थे l औदुंबर, वटवृक्ष, तथा पीपल की छाया मे मंदिर के आसपास का परिसर शांती पूर्ण भाता था l बारिश के दिनो मे मंदिर के आसपास छोटे छोटे खड्डे बन जाते थे l उनमे बुढ्ढी बारिश के समय पेड के पत्तो से गिरकर पानी भर जाता था l बारिश की बुंदे गिरकर उस पानी पर छोटे छोटे फुगे फुल कर तुटते थे l उस वक्त गावं मे पक्की सडक नहीं बनी थी l इतवार के छुटी के दिन मैं और मेरे दोस्त मिलकर गोटिया खेलते थे l उस समय पच्चास पैसो मे एक गोटी मिलती थी l जीन गरीब बच्चो को गोटीया खरिदना नहीं जमता वह पहाडी नालो के पथ्थर लाकर उन्हे बरगद के नीचे वाले कट्टे पर घिसकर गोटीया बनाते थे l खेलते समय बारिश का ध्यान नहीं रहता l जब कपडे गीले होकर थंड लगणे लगती तब घर का ध्यान होता l गीले कपडो से घर में आ जाते l और घर के अंधेरे वाले कोठी में कपडे बदल देते l लेकीन पाव के ओल के निशाण देखकर मां पेहचान लेती l और दाटती l
हमारे बडे काका की बडी बेटी तो सक्त थी l उसे हम बच्चो का समय के मुताबिक न चलना और पढाई से मूह फेर लेना पसंत नहीं था l शालेय सत्र परीक्षा नजदीक आई थी l परीक्षा के आदले दिन हमारे बडे भैया गोटीया खेलणे गये थे l बाहर गावं गये हुवे हमारे पिताजी आये l उसने उन दोनो की शिकायत की l पिताजी के कहने पर वह उन्हे बुलाने गई l
दीदी जहा भाई खेल रहे थे l वहा पर चली गई l उन लोगो को मिठाई के बहाने घर पर बुलाके लाई l हमने तब तक घर मे जो भी छडी दिखाई दे वह लेकर दूर छुपा दी l ताकी पिताजी को मारणे के लिये छडी न मिल पाये l वह जब उन्हे बुलाके लाई l तब हमे लगा की हमारी योजना सफल होगी l लेकीन उसने पहले ही एक बेत की छडी निकालकर धान के तट्टे मे छिपाई थी l वह लेकरं वह आज्ञाधारक शिष्य के भाती पिताजी को देती l उससे जो उन्हे मार पडती देख हमे नानी याद आती l और झूठी कसम खाते की अब फिर कभी नहीं खेलेंगे l और अपने दातो पर दात रगडकर दीदी को बुरा भला कहते l इतना ही नहीं घर के पीछवाडे होने वाले बांबू के बेट मे आये कोमल उगे हरे कोंब तोडते l ता की न रहे बास न बजेगी बासुरी l लेकीन जब बारिश सुरू हो जाती है l तो वही बेट बहुत हरा भरा होता और जादाही फुलता l
शिवजी के छोटे मंदीर के पीछे एक गौर वर्ण वाली दादी रहती थी l उसका घर घने आम् के पेडो के बीच था l उसके पेड के आम् बहुत ही रसपूर्ण और मिठे थे l उसका स्वाद आजकल मिलनेवाले बाजार के हापूस में भी ना है l स्कूल के बच्चे बरसात के पहले दिनो में उसके आम् के बगीचे मे गिरे आम् लाने जाते l
कभी तो चुरा के लाते l उसकी बडी आंखे देखकर मै डर जाता l और चोरी करना पाप है l और पकडा गया तो शिक्षा मिलेगी l यह सोचकर आम् चुराने न जाता l तब मेरे दोस्त बगीचे के बाहर निगराणी करने को कहते, और व आम् चूराने जाते l जब चुराये आम् खाने से जब मै हीचकिचाता तब वे कहते की चोरी हमने की है l पाप हमे लगेगा l तुम खावो l तब रसभरे आम् देखकर जी ललचाता l और आम् खाते समय आम् के केसर से गाल कब पिले होते समज ही नहीं आता l
जब बुढी दादी को जब यह बात पता चलती l तब वह गुस्सा करके बच्चो को गालिया तक देती l तब बच्चे कहते, की दादी तुम तो बुढी हो गई हो l तुम आम् का क्या करोगी l अब कितने दीन खावोगी l मरणे की उम्र हो गई है तुम्हारी इतना गुस्सा अच्छा नहीं l तब वह डर जाती l और डॉक्टर के पास जाकर एक सलाईन या इंजेक्शन रंगवा लेती l क्यो की उसे मौत से बहुत ही डर लगता था l बच्चे आम् चुराते l उस तरह उसका काम भी करते थे l उसका बाजार से सामान लाते l उसका बगीचा साफ करते l उसके घर की काम मे मदत करते l
शिवजी के मंदिर के पास होणे वाले वटवृक्ष की पूजा करणे के लिये गाव की सभी औरते ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन इकठ्ठा होती थी l वे जो पुजा करके फल छोड जाते l वे गावं के बच्चे और बंदर ले जाते l पूजा के बाद फल ओरतो और बच्चो मे बाटती थी l क्यू की वो बच्चो मे भगवान का रूप देखती थी l उस दिन वे पेड को धागा बांधकर बांध देती थी l दुसरे दिन वही धागे को तोडकर बच्चे उस पेड की पारंबियो से खेलते थे l उस पेड को श्रावण मास मे नागपंचमी के दिन झुला बांधकर खेला जाता था l एक प्रकार से वह स्पर्धा होती थी l
हमारे गाव मे होली का त्योहार एक अलग ही ढंग से मनाया जाता था l फागुन की पूनम के आदली रात को गाव के नव युवक रात को गाव के परिसर मे घुमकर एक अच्छा सावर का वृक्ष चूनते l उसे नारियल फोडकर काटकर शंखध्वनी करके गाव मे लाकर बीच चौराहे पर खडा करते l उसे आम् की पत्तियों से सुशोभित करके नारियल के तोरण पहनाते l उसके बाद रात को उसके अगल बगल गोवरियोंसे सजाके आग लगाकर शंखध्वनी करके गोल गोल बच्चे फेर धराते l शरीर मे होने वाली नकारात्मक ऊर्जा निकल के जाकर सकारात्मक उर्जा से शरीर जोशपूर्ण बन जाता l हमारे सभी त्योहार प्रकृती के साथ जुडे है l
हमारी संस्कृती की पुराणी लोकधारा की कथाये भी बहुत रोचक हैं l वे सभी पेडो से जुडी गई है l स्कूल से आने के बाद खेलकूद उसके बाद पढाई फिर खाना खाकर रात को सोने से पहले हमारे काका की लडकी हमे कहानीया सूनाती थी l उसकी सभी कहानियो मे हमारे आस पडोस मे पाये जाणे वाले सभी पेडो का उल्लेख होता था l बरगद के पेड की चुडैल की कहानी तो वह पुरे अभिनय के साथ सुनाती थी l उसके कथा मे तरह तरह के पेड और उन पर डाकीण, शाकिन, भूत, पिशाच्च आदी पात्र रहते थे l जब हम वह कहानी सुनकर डर जाते तो वह हमे राम नाम कहने को कहती l उससे भूत भाग जाता है l ऐसा कहती , अंत मे कहानी इतनी रोचक हो जाती की बुराई से दो हाथ करने की क्षमता आ जाती l
अब हम बडे हो गये है l अब वह किस्से यादे बनकर रह गए हैं l आजकाल अबादी इतनी बड गई है की बहुत सारे पेड काटे जा रहे है l बरगद ही नहीं रहा तो कैसी चूडैल, कैसा भूत l वटवृक्ष याने बरगद के पेड काटे जाणे से कैसे झुला झुलेंगे बच्चे l अब तो घर मे झुलते हैं वो भी छोटासा झोका देकर l क्या उसमे मजा है?
आजकाल दुकानो मे आमरस बेचा जा रहा है l तो आम् के पेड से आम् चुराने का मजा ही नहीं मिलता l टिव्ही तथा मोबाईल के इलेक्ट्रिकल भवरे मे फसे हुवे लोग प्रकृती से बहुत दूर जा रहे है l गाव भी बदलने लगे है l शिवजी का पुराना मंदिर तोडकर मार्बल का फर्स बसाया हुवा मंदिर बनाया गया है l पुराने मंदिर मे खेलने जितका मजा नये मंदिर मे खेलने मे नहीं है l बडे बडे पेड काटे जाणे के कारण खेल कुद भी व्यर्थ लगता है l विज्ञान और तंत्रज्ञान के पीछे भागने वाले लोग प्राकृतिक सुंदरता छोड काच के घरो के मोह मे पडे है l क्या इससे उन्हे आरोग्य और स्वास्थ्य मिल पायेगा l पेड काटने के कारण वायू प्रदूषण बड रहा है l तो कैसे ताजी हवा मिल पायेगी? पेड काटने के कारण हवा प्रदूषण बढ गया है l तो इन्सान की आयु कम होती जा रही है l
जलद ही प्रकृती का महत्व हमने जान के विज्ञान की राह पर चलते हुवे पर्यावरण का अगर रक्षण नहीं किया तो प्रकृती एक दिन हमे खिलोना बनकर छोडेगी l इस वसुंधरा से हमारा नामोनिशाण मिट जायेगा l क्या इन बातो को आप समज पाते है l क्या आप अपनी नैसर्गिक आपदा का रक्षण कर पायेंगे?क्या आप भी दुनिया के बाजार मे खो जायेंगे l आप को ही सोचना है l और योग्य रस्ते का चयन करना है l




No comments:
Post a Comment
यह एक प्रायव्हेट वेबसाईट हैं l इसमें लिखी हुई जाणकारी के बारे में आप को आशंका हो तो सरकारी साईट को देखकर आप तसल्ली कर सकते हैं l