५) अतिथ्य कोकण का?
महाराष्ट्र राज्य के पश्चिम सागर किनारे स्थीत घनी झाडीयों में सह्याद्री पर्बत के दरो में अनेक गाव बसे हुवे है l वहा के लोग बडे ही प्यारे नारीयल के पानी के भाती अपर से कडक अंदर से मुलायम है l वहा के प्रदेश के दो अंग है l एक का नाम वलाटी जो सह्य पर्वत से लगा हुवा पहाडी प्रदेश है l और दुसरा भाग है खलाटी , जो सागर के नजदीक है l वाहा के वलाटी नामक क्षेत्र मे बहुत जादा बारिश होती है l इस कारण जमीन की पानी के कारण धूप होती है l इस करणं वहा की जमीन बहुत कम सकस है l वहा पर आम, काजू के बगीचे पहाड के ढलान पर मिलेंगे l वहा पर चावल, नागली की फसल पकाई जाती है l घाट प्रदेश से आनेवाली सब्जी और समंदर के इलाके से आई मच्छी l और जो रुखा, सुखा मिल जाये l वह खाकर यहा के लोग गुजारा करते है l बहुत मेहनत करने के बाद ही यहा पर फसल मिलती है l यहा के घर जादा तो खेतो मे ही हैं l दो घरो के बीच पाव किलो मीटर का फासला होता है l घरो के आसपास खेंती और बाग होती है l ऐसे ही दरे मे बसा हुवा एक गाव वांजोली, वहा पर राजू नाम का लडका अपनी मां और बहन के साथ रहता था l उसके पिताजी पैसा कमाने के लिये मुंबई गये थे l यहा के लडके जादा तो सातवी – आठवी तक ही पढते l उसके बाद मुंबई चले जाते l कूछ दिन बाद गाव को लौट के आते l और हिंदी, अंग्रेजी मिक्स मराठी बोलते l तब उन्हे लगता की उन्होंने आसमान के तारे तोडे हो l
राजू के पिताजी भी मुंबई मे एक उपहारगृह मे काम करते थे l दो चार मास के बाद गाव लौट आते l लाई हुई कमाई कब खत्म् हो जाती पता ही नहीं चलता l फिर रुपया कमाने के लिये फिर शहर की तरफ दौड सुरु हो जाती l शहर मे रहणे की मारामार होणे के कारण अपने साथ परिवार ले जाना कठीण था l इसलिये घरवाले सभी गाव में रहते थे l राजू के घर का खर्च उसकी माँ किसी तरह से चला लेती थी l एक दिन राजू की मां हर दिन की तरह घर का काम करके दुसरे के खलिहान में काम के लिये चली गई थी l राजू आम् के बगीचे मे अपने मित्रों के साथ खेल रहा था l
तभी उसकी सुशीला बहण ने उसे आवाज लगाई, “ भैया ओ भैया इधर आवो l कोल्हापूर के काका आये है l”
राजू उसकी आवाज सुनकर उसकी तरफ खेलना छोडकर चला गया l वह बोला, “ थोडी देर खेलने दो ना, कूछ चायवाय पिलावो ना l”
तब वह बोली, “ अरे, चाय कैसे पिलाये l घर में चायपत्ती भी नहीं है l और तुम तो जाणते हो ना की पिछले दो महिनो से पिताजी ने एक रुपया भी नही भेजा l इसलिय तो मां दुसरे के खेत मे काम के लिये गई है l तुम तो अब बडे हो l
पिताजी के गैर हजरी में तुम्हे ही घर का ध्यान रखणा है l घर में अतिथी आये और उनकी खातिरदारी ना हो तो हमारी नाक कट जाएगी l और यह काका तो मामा के गावं मे जाकर डिंगे मारे बिना नहीं रहेगा l हमेशा ही हमारे पिताजी को बुरा भला कहने के लिये अवसर देखता है l
उतने में राजू और उसकी बहण सुशीला को पुकारने की आवाज सुनाई दी l वे लोग घर की तरफ भागते हुवे आये l
उन्हे देखकर काका बोला, “ अरे कितनी देर हो गई है l मुझे यहा पर आये हुये l और तुम लोग हो जो इधर उधर घूम रहे हो l तुम्हरी मां किधर है l
सुशीला बोली, “काकाजी मां तो काम करणे के लिये पडोस के साऊताई के खेत मे काम करणे के लिये गई है l”
काका बोले, “ क्या? काम करणे के लिये l कब आयेगी? मुझे तो वापस जाना है l”
राजू बोला, “ क्या वापस जाना है l लेकीन कैसे जाओगे l श्याम होणे आई है l और जादा तो गाडिया इधर नहीं होती l अब रात को ही आयेगी l”
“ चलो न काका , घर में, मै तुम्हारे पैर धोणे के लिये पानी लाती हुं l” सुशीला बोली और वह अंदर गई l और पानी लाके काका को दे दिया l
काका ने हात पैर धोये l राजू ने टॉवेल दिया l और काका ने हात पैर पोंछे और वह बाहर वाले कमरे में आ गया l उनके बैठणे के लिये पथारी बिछाई गई l काकाजी पथारी पर बैठ गये l उन्हे पिने के लिये पानी लाकर सुशीला ने दिया l और वह दोनो अंदर रसोई घर में चले गये l वहा के सभी डिब्बो में उसने झाककर देखा l एक डिब्बे में थोडासा गुड मिला l सुशीला राजू से बोली, “ भैया जाओ पडोस से कूछ चायपत्ती मांगकर ले आवो l तो राजू पीछे के रास्ते पडोस् के घर चायपत्ती मांगणे गया l पडोस में शिवाय बुढी नानी तारा के अलावा कोई नहीं था l उसने उससे चायपत्ती मांगी l तो उसने थोडी शी दे दी l राजू भागते हुवे घर आया l सुशीला ने चाय बनानी सुरू की l तब सुशीला बोली, “ अरे भैया काले रंग की चाय देना क्या अच्छी बात है l हमारी गौ अब पेट से है l इस कारण दूध नही दे सकती l अब जाकर कही से दूध ले आवो l अब राजू को लगा l की अब दूध की समस्या से कैसे उभारा जाये l
अगर फिर से तारा नानी के पास गये तो वो तो आगबबुला होगी l तो उसके ध्यान में उसका मित्र शंकर आया l वह छोटा कप लेकरं दौडते हुवे खेल की मैदान की तरफ भागा l वहा पर शंकर उसे मिल गया l उसने शंकर से थोडासा दूध लाने की बात चलाई l शंकर ने थोडी देर सोचा l और वह कप लेकर उसने खिसे मे डाल दिया l और घर की तरफ निकला l घर के अंगण मे उसकी दादी अनाज सुकाने के लिये डालकर अपने पडोसन के साथ गप्पे लडाते हुवे बैठी थी l जैसे ही शंकर घर के आंगण से गुजरते घर में जाणे लगा l तो दादी ने उसे देखा और वह बोली, “ आ गये लाड साहब, जरा तेवर तो देखो इनके, पढाई छोडकर हमेशा खेल कुद की तरफ ध्यान, आने दो श्याम को तुम्हारे पिताजी को घर, अगर मैने तुम्हारी शिकायत ना की तो मेरा भी नाम चंपा नहीं l मूर्ख कही का? खाने के लिये आगे, सोने के लिये बीच में, और कामकाज या पढाई हो तो लाडसाहब भाग खडे होते l जा मुझे मालुम है l तू खाना खाणे के लिये आया है l जा मैने पुरा खाना पेटी मे बंद करके रखा है l तुझे आज भुका ही रखूंगी l”
दादी की बातो की तरफ ध्यान ना देकर वह घर के भीतर चला गया l रसोई घर में जाकर उसने शींके की तरफ गया l शिंके के बर्तन को नीचे उतारकर उसने झाका l उसमे थोडासाही दूध था l उसने वह कप मे ले लिया l और कप रसोई घर के पीछे की खिडकी खोलकर उसे बाहर की तरफ रखा l और खिडकी बंद कर दी l और वह घर से बाहर निकलने लगा l
तो दादीने गुसैले नजर से उसकी तरफ देखा l और वह बोलणे लगी l क्या करने आया था l देखु तो खिसे मे क्या हैं l
तब शंकर को गुस्सा आया l शंकर बोला, “तेरे अम्मा का डबोला लेने आया था l हमेशा गुस्सा करती रहती है l तू तो घर मे एक द्वारपाल के भाती है l हमपर पेहरा गाड के बैठी है l” यह कहकर शंकर घर के पीछे चला गया l उसकी बाते सुनकर दादी देर तक चपड चपड करती रही l शंकर घर के पीछे रसोई घर की खिडकी के पास आया l उसने वह कप लिया l और राजू को जाकर दे दिया l आधा कप दूध देखकरं राजू बोला, “ बस इतनासा ही.”
तब शंकर बोला, “ चुपचाप ले जा l इसके लिये मैने बहुत पापड बेले है l वो जो घर में रखा है ना वाचमेन उससे छुपा के लाया हुं l शिंकाले के बर्तन मे इतना ही था l अगर दादी को पता चलता l तो भुखी बिल्ली की तरह नोच डालती मुझे l जा जल्दी से ले जा l उसकी बाते सुनकर राजू दूध का कप लेकरं घर की तरफ निकल गया l उसके मन में प्रश्न उमड रहे थे l
की यह दूध घर से बिना पूछे लाया है l शंकर उसके चेहरे को भाप गया l और बोला, “ज्यादा सोच मत कृष्ण लीला सर्व श्रेष्ठ है l”
राजू घर दूध लेकरं आया l और उन बहण- भाई ने चाय बनाकर अपने मेहमान काका को पीला दी l काका चाय पिते ही बोला, “ अरे कैसी चाय बनाई है l बहुत फिकी है l उसका रंग भी फिका है l यहा की गाय, भैस दूध देती है या नहीं l क्या सिर्फ गोबर देती है l”
काका की बाते सुनकर बच्चों को बुरा लगा l लेकीन वह समजदार थे l वह अंदर चले आये l अंदर आकर सुशीला ने चूले के बर्तन मे रही चाय एक प्याले मे निकाली l उसका एक घुट उसने दिया l तो दुसरा अपने भाई को दिया l चाय का घुट पिकर वह बोली, “ अच्छी खासी तो बनी है l लेकीन यह काका क्यो इस तरह बाते कर रहा है l”
“ भैया कूछ भी करो मां को जाकर बुलाके लाव l”
उसकी बाते सुनकर उसने काका को आराम करने हेतू चारपाई पर इंतजाम किया l और वह चला गया अपनी मां को बुलाने l खेत मे जब वह गया तो उसकी माँ वहा पर काम कर रही थी l राजू को देख मां बोली, “ तुम क्यो आये इधर l थोडी देर बाद मै आती ना घर l कूछ काम है क्या?”
राजू बोला, “ घर में काकाजी आये है l”
तो वह बोली, “ हाय रे दय्या, अब क्या करु? घर में चायपत्ती भी नहीं है l क्या करें अब “ वह खेत मालकीण के पास चली गई l और बोली , “ क्या करें कमला बहन घर मे बहन का पती आया है l और चायपत्ती भी नहीं है l कूछ रुपये दे दो न हाजरी ही सही “
कमला ने अपने कमर को भापा और वहा से बटवा निकालकर दो दिन के काम के पैसे दिये l राजू की मां ने वह रुपये राजू को दे दिये और कूछ राशन लाने को कहा l और वह कूछ देर बाद वो आयेगी ऐसा कहकर वह काम पर लग गई l राजू रुपये लेकरं घर में आया l उसने रसोई घर में लगनेवाले चीजो की यादी बनाई और वह बनिये के पास से वह सब ले आया l” उसके बाद अपने खेत से अटहल के पेड से अटहल और कूछ करवंदे, तोरणे, लिंबोलीया यह रान का मेवा लेके आया l काकाजी को रानमेवा खाणे को दिया l काकाजी खुश हो गये , और अटहल रसोई घर. में रख आया l सुशीलाने घर में तबतक सफाई करके पानी भरा l और वह खाना बनाने के काम मे लग गई l
उसके बाद राजू काका के पास आ गया l तबतक काका सोकर उठ चुके थे l उन्होंने राजू को एक थैली दे दी, और कहा की ए ले जाओ और खाली कर लावो l उसमे एक गुड की ढेली और थोडीशी ज्वार है l जो तुम्हारी मौसी ने दी है l उसे रख दो l काकाजी की बाते सुनकर राजू ने वह थैली अंदर ले जाकर उसमे से गुड और ज्वार निकाल के रख् आया l उसके बाद अपने मित्र को लेकरं उसने अपने बाग के नारियल के पेड के नारियल निकाल लिये l और उसका पानी निकालकर उसने काकाजी को दे दिया l नरियल का पानी पिकार काकाजी को बहोत अच्छा लगा l बच्चो ने नारीयल निकालने के लिये किया हुवा प्रयास काका जी ने देखा था l बच्चो की अतिथ्य की तडफ देखकर अच्छा लगा l
राजू ने नारियल का पानी निकालने के बाद नारीयल के अंदर का गर निकाला l और बहण सुशिला को मसाला बनाने को कहकर वह दुकान जाकर कूछ अंडे लेकरं आया l और घर में अपने बहण के हातो में थैली दे दी l शाम होने को आई थी l सुशीलाने मां के आने तक चावल पकाये और अटहल की सब्जी बनाई l
श्याम हो गई l राजू की मां काम से लौटी l जब वह घर आई l तब उसने देखा की बच्चोने घर का जादातर काम पुरा किया है l तो उसे वह देख बडा ही संतोष हुवा l घर मे आने के बाद अपने जिजाजी से देर से आने के लिये उसने माफी मांगी l फिर अंदर जाकर हात पैर धोकर चाय फिर से बनाकर जिजा को दे दी l उसके साथ कूछ बिस्कीट भी दिये l उसके बाद वह हालचाल पुंछकर घर के काम मे लग गई l देखते देखते आठ बज गये l राजू की मां ने खाना बनाया l और राजू को काकाजी को खाना खाने को बुलाने को कहा.
राजू ने पथरी बीछाई l पानी का लोटा काकाजी को हात धोणे को दिया l फिर उनके हात पैर पोंछने को टॉवेल दिया l और खाना खाणे को बुलाया l सुशीला ने मां ने बनाई नागली की रोटी, अटहल की सब्जी, और तरह के बनाये व्यंजन परोसे l सुशीला ने बनाई हुई नरियलं की सोलकडी भी परोसी l इतना ही नहीं बगीचे के आम् की बनाई मिठी सलाद भी परोसी l काकाजी को खाना मन को भाया l वह बडे चाव से खाने लगे l बच्चों को साथ बेठणें को उन्होंने कहा l लेकीन उन्होंने मना किया l बाद में वह खायेंगे ऐसा कहा l
खाना खाते वक्त काकाजी बोले, “क्या तुम्हारा पती तुम्हे रुपये नही भेजता क्या? जो तुम काम पे जाती हो l”
राजू की मां बोली, “ जी भेजते है की, पिछले महिने ही भेजे थे l घर की मरम्मत करवा ली बारिश के दिन आणे वाले हे ना l यहा पर तो मुसलाधार बारिश होती है l और घर पर बैठकर मेरा मन भी नही लगता तो क्या करें l घर में बिना काम के बैठकर मुफ्त की रोटीयां तोडना क्या अच्छी बात है क्या?”
काकाजी बोले, “ ए भी सई है l आदमी को हमेशा कोई ना कोई काम करना चाहिए l तभीं तरक्की होती है l”
इधर उधर की बतियां करते करते काकाजी ने खाना खाय l और वह बाद मे बाहर की तरफ चले गये l राजू ने उनके सोने के लिये इंतजाम किया l उनके सिरहाने पानी का लोटा भी रखा l और वह खाना खाने चला गया l काकाजी वाडी मे टेहलने लगे l तबतक बच्चों ने खाना खाया l बाद में वह काकाजी के पास गये l तबतक वाडी मे टेहलकर काकाजी आये थे l बच्चोने उनसे एक कहानी सूनाने को कहा l काकाजी ने एक अच्छी पंचतंत्र की कहानी सूनाई l कहानी सून ते वक्त राजुने काका की तेलमालिश की तो सुशीला ने पैर दबाये l कहानी सुनने के बाद काकाजी सो गये l और बच्चे भी भितर सोने गये l रात के रसोई के काम निपटाकर राजू की मां भी सोने को चली गई l
सवेरा होते ही काकाजीने स्नान किया l और राजू की मां ने किया हुवा नाष्टा करके वह अपने गावं की तरफ निकल पडे l जाणे से पहले काकाजी को बच्चोने प्रणाम किया l और पुरे संतोष पूर्ण होकर काकाजी निकल पडे l बच्चे बस स्टॉप तक पहुचाने गये l गाडी आ गई l काकाजी ने कूछ रुपये बच्चो के हात पर रखें l और वह गाडी में चड गये l गाडी निकल पडी l बच्चो ने टाटा किया l
गाडी मे बैठकार काकाजी के दिमाग मे खयाल आया l की हम इन्को तुच्छता पूर्ण नजरिये से देखते हुवे भी बच्चो ने मेरा ठेहराव अच्छी तरह किया l अगर में अपने बहण के घर गया l तो उसके बच्चे मुझे पानी तक ना पुछते l और ये बच्चे अपने घर मे मेहमान आये l तो जो भी रूखा सुखा हो वह देकर उनका आदरातिथ्य भली भाती करते है l गरीब हुवा तो क्या हैं l उनकी मेहमान का अतिथ्य करने की रीत तो अमिरो को भी ना आयेगी l ऐसा कहकर वह अपने गावं कोल्हापूर की तरफ चले गये l
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