२) यहा पर कुछ तो पवित्र गिरा है l
महाराष्ट्र राज्य में बहनेवाली कृष्णा सरिता के तटपर बहुत उपजाऊ मिट्टी है l जिसमे गन्ना, हरभरा, चावल, ज्वार की हरिभरी फसले खेती में लहराती है l कृष्णा के पानी से यहापर जीवन खिला है l वहा पर कई सारे गाव बसे हुवे है l उस हरेभरे गावो में बसा एक गाव था l वहा पर एक जमिनदार रहता था l उसका नाम था मधुसुदन पाटील l पुर्वजों के जायदाद का वह अकेला वारिस था l गाव की अधिकांश नब्बे प्रतिशत जमीन का वह अकएलआ मलिक था l उसके पुर्वजों ने राजा और राज्य की रक्षा हेतू बलिदान दिया था l इस सेवा के लिये राजा ने उन्हे इनाम में यह जमीन का तुकडा दिया हुवा था l अधिकांश जमीन में से गाव के लोग तथा नजदीक गाव में रहणेंवाले मजदुरोसे काम करके उपज निकाली जाती थी l उसके खेत में से निकलनेवाले अनाज पर ही गाववालों का गुजारा चलता था l उसके पूर्वज सक्त मिजाज के थे l वह गाववालों से तथा मजदुरो से बहुत ही सक्ती से पेश आते थे l
मधुसूदन का व्यवहार उसके पूर्वजो से बहुत ही विभिन्न था l उसका बचपन अधिकांश मजदूरो के बच्चो के बीच खेलते हुये गया था l उसका यह मजदूरों के बच्चों के साथ खेलना कुदना उसके दादाजी और दादिजी को को नहीं भाता था l वह हर वक्त उसे दाटते थे l गुस्सा होते थे l एक दिन यह मजदुर तेरा घात करेंगे l लेकीन वह उसपर ध्यान नहीं देता था l वह केहता की वह मेर भरोसा कभी तोडेंगे नहीं l
समय बितता गया l बच्चे बडे होते गये l मधुसूदन अब बडा जमीनदार बन गया l और उसके साथ खेलनेवाले मजदूरों के बच्चे उसके जमीन पर मजदूरी करते थे l वह अब बडा था l तो उसे खलीहान का काम देखने जाना पडता l तो उसे बहुत ही बुरा लगता l की उसके मित्र खेत मे मजदूरी करते l और गरिबी मे जिते थे l वह हर बार उनके बारे में सोचता रहता था एक दिन उसने सोचा, की मेरा कुटुंब तो बहुत ही छोटा है l और मेरी खेती बहुत बडी हैं l इसमे से आधी जमीन तो मैं करता ही नहीं, क्यो ना ईसे मैं बाट दूं l यह अच्छी बात है l इस योजना को उसके घरके लोगो ने विरोध किया l तब भी उसने उनकी एक ना सूनी l और नदी से लेकरं पहाडी तक होनेवाली उसकी जमीन मे से आधी जमीन उसने अपने खेत में काम करणेवाले मजदूरों में बाट दी l लेकीन उनसे एक वादा लिया की वह लोग उसकी खेतीं में काम करेंगे l ताकी उसका घरबार चलता रहे l
मजदुर भाईयो को आधी जमीन बाट दी गई थी l इस कारण वह अब उसके मालिक बन गये थे l
कुछ सालो में उनकी आर्थिक परिस्थिती सुदर गई l इस कारण उनके बाल बच्चे खुशहाल जीवन बसर करने लगे l समय गुजरता गया l अब जमीनदार बुढा हो गया l आधी जमीन से भी उसकी बहुत तरक्की थी l मजदूरों की अगली पिढी जो थी बहुत खुशहाल जीवन जी रही थी l तरक्की के कारण उनको बुरी आदते लग गई थी l उनको जमीनदार की जमीन पर मजदूरी करना गवारा लग् रहा था l वह अब पिछ पीछे जमीनदार को गाली गलोच करते थे l जमीनदार को जब यह बात पता चली तो उसने उन्हे काम पर बुलाना बंद किया l और आस पडोस के गाव से मजदुर लाने लगा l पुराणे मजदुरो के लडको को जादा काम न होने के कारण वह जादा देर बेकार रहते थे l उस कारण उन्हे बूरी आदते लग गई थी l वे दारु पिना, जुवा खेलना इन जेसी बुरी आदतों के कारण उनका आर्थिक स्तर नीचे जाणे लगा l उनको मिली हुई जमीन से उनक गुजारा न होणे पर वह चोर्य कर्म करणे पर उद्युक्त हूये l वह जामीनदार के खेत से रात के समय चोरी करणे लगे l रात को अनाज, घास, लकडिया वह चुराने लगे l चोरी हो रही है l यह बात जमीनदार के नोकरो के ध्यान में आई l तब उन्होंने गस्त लगाकर उन्हे पकडा और कडी सजा देनी चाही l लेकीन जामीनदार को उनके भविष्य को लेकर उनपर दया आई l और उसने उन्हे ताकीद देकर छोड दिया l नोकरो ने कहा यह गलत कर रहे हो साहब l हमारे घाट की कहावत है l चोर और घास के बींडे को कभी ढील न देणी चाहिए l वर्णा वह अधिक नुकसान देह होती है l
बुरी आदत लग् जाये तो वे छुडे ना छुटे l मजदूरों के लडके अब बहुत बिघड गये थे l कूछ तो नशा पानी भी करणे लगे l उसके लिये वह लोग और चोरी करणे लगे l जमिनदारने उन्हे अपने मित्रों के बच्चे अपने बच्चे समजकर छोडा था l लेकीन वह उसे कायर समजणे लगे l “ यह क्या हमे शिक्षा देगा l हमारा बस चले तो हम इसका नामोनिशाण मिटा देंगे l उनके दिमाग में कुविचार आने लगे l व सोचणे लगे की यह जमीनदार कितना अमीर होगा l इसका परिवार इतनासा इसे किसलिये इतनी जमीन जायदाद चाहिए l उनके दिमाग में कुविचार की नागिण अपने विषैले विचारों का जहर फैलाने लगी l उन्होंने जमीनदार और उसके कुटूंब को खत्म करणे का निश्चय किया l
उन्होंने जमीनदार और उसके परिवार को खत्म करने का निश्चय किया l वह अपनी योजना बनाने लगे l एक दिन अचानक रात को लुटेरो का भेस लेकरं उन लोगो ने जमिनदार की हवेली पर हमला बोल दिया l
हमले को विरोध करते हुवे बहुत से नोकर मारे गये l बाहर हवेली के गहजब देखकर जमिनदार ने जान लिया की अपना परिवार खतरे में है l उसने अपने घर के जेवर तथा कूछ संभालकर रखे हुवे रुपये अपने बच्चों के हात में देकर उन्हे हवेली के खुपिया रास्ते से निकाला l तब तक हवेली का बडा दरवाजा तोडकर वे लोग अंदर आ गये थे l तभी उनके पकड में जमिनदार की बीबी आई l उन्होंने उसे धर दबोचा l और घसिटते हुवे हवेली के मुख्य दालन में लेकर आये l और जमिनदार को भी पकड लिया l
वे लोग उससे रुपये, जेवरात, और उसके घर - जमीन के कागजाद के बारे में पूछताज करने लगे l तब वह चीड गया l उसने उन्हे पेहचान लिया था l वह चोरी नहीं तो उसकी ज्यायदाद छिनना चाहते है l वह बोला तुम चाहे आकाश पाताल एक कर दो l तुम्हे कूछ नहीं मिलेगा l तुम लोगो को मैने जमीन दे दी l तुम्हारे खाने की तजवीज की, और तुम इसका एहसान मानने के बजाय मेरे घर में डकेती करने आये हो l ये मेरे वंशजो के लिये मैने कमाया हैं l बो भी पुरी प्रामाणिकता से , यह मैं तुम्हे किसी भी हाल में देनेवाला नहीं l
तब एक बोला, “अगर जिंदा रहोगे तो ही उन रुपये, पैसो का इस्तेमाल कर पावोगे ना और तुम्हारे वंशजो को तो हम खत्म कर देंगे l तब यह जायदाद किसे मिलेगीl”
वह लोग गुस्सा होकर उसे मारणे लगे l तो वह बोला, “ तुम लोग यह गलत कर रहे हो l भगवान सब कुछ देख रहा है l उसकी लाठी जब पडेगी तब आवाज नहीं करती l लेकीन तुम्हे पता चलेगा l मैने तुम्हे रोटी के लिये जमीन दे दी l और तुम मुजसे ही दगाबाजी कर रहे हो l शरम आनी चाहिए l मै तुम लोगो से दुजे जमीनदारों की तरह व्यवहार करता और अनाज के लिये तरसाता, तुम्हाला शोषण करतात , तब तुम्हे पता चलता l तब तुम लोग रेंगते हुवे मेरे पाव मे गिडगिडाते l और मेरे सामने इस तरह खडे होणे का धैर्य नहीं जुडा पाते l” तब एक बोला, “ बोलणे में वक्त जाया मत करो l ले चलो घसिटत्ते हुवे l”
तब एक ने एक जोर का मुक्का मारा l जमिनदार फर्शपर गिर गया l उन्होंने उसे घसीटते हुवे हवेली से बाहर खिचते हुवे लाये l उसकी बीबी को भी वह खिचते हुवे ले आये l उन्होंने उसके सामने तेज धार वाली सुरी से जमिनदार की बिबी का गला काटा l वह खून से लतपत फर्श पर पडी l वह देखता रह गया l उसने उन से हतापाई करने की कोशिश की लेकीन उसकी एक न चली l उसके बाद उसे घोडे से बांधकर घसिटते हुवे खलीहान में लाये l उसके घर वालो के बारे में, बच्चो के बारे में पुंछा l लेकीन वह मार खाता रहा l पर कुछ नहीं बोला l उसने उन्हे खुपिया रास्ते कबका भेज दिया था l
वो अपने आप को बचाने के लिये चिल्लाता रहा l लेकीन कोई नहीं बचाने आया l फिर उसने भगवान से मदत की गुहार लगाई l वह बोला, “ हे भगवान बचावो l” अब उसके शरीर से खून निकलकर उसका बदन खून से भिग गया था l उसके बदन पर बहुत सारे जख्म हो गये थे l अब पुरा बदन दर्द कर रहा था l अंत समय उसे रहा न गया वह बोला,
“ देखा हैं फुल, पौधो और पेडो ने l देखा है इस उपजाऊ मिट्टी ने ना मैने किसी का शोषण किया, ना मैने किसी को लुटा l सत के राह पर चलने की सजा आज मुझे ये मिली l मेरी गुहार भगवान ने भी ना सुनी l में शाप देता हुं l जिस जमीन के लिये इन लोगो ने मेरी हत्या करनी चही l वह ही इन्साप करेगी l इन लोगो को इनके किये की सजा जरूर मिलेगी l
और मेरे बाल बच्चों को उनका हिस्सा मिलता रहेगा l इतने में एक ने उसके पीठ में छुरा मार दिया l बहुत सारा खून बह गया l और जमीनदार ने अंतिम सास् ली l उसके मृत शव को वही खलीहान में छोडकर वे चले गये l उसके बाद हवेली में सभी ओर उन्होंने धुंडा l तो उनके हाथ ना कोई धन मिला ना कोई रुपया l कुछ नहीं लगा l उन्होंने खूपिया रास्ते की भी खोज की लेकीन उनके हात असफलता लगी l जामीनदार के वंशजो को उन्होंने मारणे के लिये खूब धूंडा l लेकीन वह नहीं मिले l तबतक वह नदी पार करके जा चुके थे l
वहा से निकलकर वह दूर एक शहर मे जाकर बस गये l वहा पर उन्होंने अपने पास होणे वाले रुपयो से एक मकान और एक जमीन का तुकडा लिया l और जो भी काम मिले वह वो काम भी करने लगे l वह जिंदगी बसर करने लगे l
इधर उन मजदुरों के बच्चों ने उस जमिन के हिस्से किये और बाटकर उसमे खेती करने लगे l लेकीन वह कितनी भी मेहनत करे उनके परिश्रम के आधे हिस्से से भी कम उस जमीन से अनाज पैदा होता l आमदनी अठ्ठण्णी और खर्चा रुपया l इस तरह हालत मजदूरों के बच्चों की होणे लगी l उस खेत- जमीन से अगर घर के चूल्हे के लिये लकडी लाते l तो वह चुल्हे में डालते तो वह एक तिनके की तरह फुर्र होकर जल जाती l वह कितनी भी मेहनत करे l वह गरीब ही होते जा रहे थे l उन्हे सफलता नहीं मिलती थी l हर एक मजदुर के घर में झगडा हमेशा रहता था l उनका जीवन नर्क से बत्तर हो गया था l जिन लोगो ने उस जमिनदार को मारा l वह एक एक अपघात होकर मर गये l किसी को साप ने काटा l तो कोई बिमार होकार मरा l उनके बच्चे बडे होकर उस जमीन मे मेहनत करने लगे l लेकीन उनके मेहनत का भी आधी से कम अनाज मिलने लगा l
एक दिन वहा से एक साधू महात्मा जा रहे थे l थोडी देर के लिये वहापर रुक् गये l उनको देखकर कूछ मजदुर महीलाये उनके दर्शन को गई l उन्होंने साधू जी को फल, फुल अर्पण किए l साधू जी खुश हुवे l और वरदान मागणे को कहा l औरतो ने अपने खेत की इस समस्या के बारे में बताया l तब साधू ने सोचा अगर मेरे तपोबल के सहारे उनके खेत् का बुरा साया निकल गया तो अच्छा हैं l तो वे उस खलीहान में उन मजदूरों के साथ चले गये l उन्होंने अपने हात मे एक पानी का कमंडलू लिया l उसमें पवित्र जल था l वह वहा पर सिंचित किया l तब वहा की जमीन हिलने लगी l पेड, पौधे हिलने लगे l वहा की फसल खिलखिलाकर हसणे लगी l वह बोली, “ जाओ चले जाओ, तुम्हारा क्या यहा काम?”
तब साधू बोले, “ तुम कोण हो? इस खेत का अनाज खाकर इन गरीब मजदूरों पर जुलूम कर रहे हो l”
तब वहा की धरती बोली, “ कैसा अन्याय? कोणसा अन्याय? ये पापी, इन्के पुरखे पापी, यहापर अन्याय नहीं न्याय ही हो रहा हैं l में हुं यहा की न्यायदेवता l एक बीज कहे दुजे बीज को निपज हो आधे से अधुरी, इनकी मजदूरी ही इन्हे मिले l “
तब साधू बोले, “ लेकीन तुम कौन हो l यहा के मजदुर का इन्साफ करने वाले, मैं अपने हात के इस पवित्र जल से तूम्हे नष्ट कर दूंगा l
“ अरे ओ पुण्यपुरुष ना आव देखा न ताव लगे बडी चडी बाते करने l तुम्हारे तप से भी यहा कूछ पवित्र है l जो परमेश्वर के भाती समान है l यहा पर कूछ ऐसा गिरा है l जो की सत्य से भी महान है l सत्य ही ईश्वर है l क्या तुम ईश्वर से बडकर हो l”
साधू बोले, “नहीं मैं नहीं हुं l लेकीन क्या है पवित्र यहा l”
धरती बोली, “ यहा पर गिरा है खून जमिनदार का, जो दया और करुणा का सागर था l जिन पर उपकार करे वही अपकार करे l अन्नदाता को जो भूल जाये l वह कैसे इन्साफ के लायक l हम हमारा काम करेंग l आधे से जादा अनाज जायेगा उनके हिस्से जो इसके हक्कदार है l”
साधू पुरुष ने धरती मां की बाते सुनी l और आखें बंद कर ली l और अपने अंतरिक शक्ती से जाना की एक आदमी बाजार गया हैं l उसको अनाज उसके औसत मूल्य के आधे से भी आधी किंमत मे मिल गया हैं l तब उसने भूत काल मे झाका l तब उसके सामने सभी हकीकत आ गई l”
फिर आँखे खोलकर साधू ने मजदूरों से कहा की यहा पर बहुत ही बूरा हुवा है l आप के परिवार सदियों तक भी चाहे यहापर पुरा अनाज निकाल नहीं पायेंगे l तुम्हारी पिढीया दर पिढीया जाती रहेगी l फिर भी तुम्हारी उन्नती धिमी रहेगी l तुम लोग जिधर भी जाओगे यह शाप आपके साथ चलता जायेगा l जैसी करणी वैसी भरणी l तूमने एक बार मारा l वह तुम लोगो को तिल तिलकर मारेगा l
तब मजदूरों ने उनसे पूछा की इसका कोई उपाय नही क्या?
तब साधू जी बोले, “ नहीं इसका कोई उपाय नहीं l जब तक सृष्टी हैं l यह चलता रहेगा l जब तक जमिनदार के वंशज अपने पेट के लिये मेहनत करते रहेंगे l तबतक उन्हे उनका हिस्सा यह धरती मां देती रहेगी l जो नियत से अच्छा हो l उसकी राह में काटे बिछा ओगे , तब वो तूम्हारे पावं में ही चुबेंगे l अब हर बार आप लोग जब भी अनाज बोवोगे और काटोगे तब धरती से अपने हिस्से का आधा अनाज जो मेहनत का होगा वही देने के लिये पूजा करो l तो काश तुम्हारे व्यवहार हे खुश होकर यह धरती प्रसन्नता से आधा तो देगी l
साधू ने झुककर उस धरती को नमन किया l और अगली यात्रा के लिये प्रस्थान कर गयेl



