Wednesday, April 3, 2024

४) उजाले की ओर

 ४) उजाले की ओर

४) उजाले की ओर


निर्मलाजी का जन्म एक मध्यमवर्ग स्तर के परिवार मे हुवा l जन्मतहा वह एक बुद्धिमान लडकी थी l दिमाग तेज होने के बावजुद भी उसे उसके योग्य शिक्षा नहीं मिली l वह चाहती तो एक डॉक्टर या इंजिनीयर बन सकती थी l स्कूल मे हमेशा सबसे उच्चतम गुण पाती थी l लेकीन घर की आर्थिक स्थीती अच्छी ना होणे के कारण उसके प्रतिभा योग्य शिक्षा न मिल सकी l उसने फिर कला शाखा मे शिक्षण लेते हुवे एक स्कुल टीचर का कोर्स किया l वहा भी वह टॉप पर थी l इस कारण उसे जल्द ही एक स्कूल मे अध्यापिका की नोकरी लग गई l पढाई करते वक्त ही उनकी शादी हो गई l उनका घरबार ठीक था l उनके पती एक मेकॅनिक थे l उनके साथ काम करने वाले लोग कहते की आप एक टीचर होकार एक मेकॅनिक से शादी कैसे की आप इतनी सुंदर है l कोई ना कोई अच्छा अध्यापक मिल ही जाता l तब उनका दिया हुवा जवाब बडाही मार्मिक था l वह काहती के मेरा पती मोटर मेकॅनिक है तो क्या हुवा l है तो एक डॉक्टर ही ना l जिस तरह एक डॉक्टर रुग्ण को ठीक करता है l उस प्रकार बिगडी गाडीया मेरा पती ठीक करता है l वह हर वक्त हसी खुशी रहती थी l हर दम चेहरे पर मुस्कुराहट रहणे के कारण उनसे बाते करने में कईयों को आनंद मिलता था l बडे बुजुर्गो से लेकरं छोटे बच्चे भी उन्हे मास्टर जी ही बुलाते थे l


स्कुल मे हमेशा कूछ तो मनमुटाव होता ही है l कई स्कुल संस्थापक के बगल बच्चों की साजीश के कारण उनकी बदली शहर के नजदीक वाले स्कूल के उप विद्यालय मे करवा दी l वह उप विद्यालय शहर के नजदीक बिखरी हुई मजदूरों की बस्ती के नजदीक था l वहा के मजदुर के लडके बहुत ही चलाख थे l उनमे बुध्दीमत्ता कुट कुटकर भरी थी l वह एसी मिट्टी के बने थे, की जो बहुत ही उपजाऊ या मुलायम हो l लेकीन आजतक उन्हे योग्य आकार देणेवाला कोई कुम्हार या किसान नहीं मिला था l निर्मलाजी की जब वहा नियुक्ती हो गई l तब उसने देखा l स्कूल की इमारत बहुत बेचिदा हालत में हैं l लेकीन उसे वहा ही पढाना होगा l पहली दफा जब वह दसवी कक्षा के वर्ग मे पढणे गई l जब कक्षा मे प्रवेश किया l तब टेबल के नीचे बच्चोने फटाके फोड दिये l जिस कारण उनकी साडी पर कई ठीकरे गये l और वह थोडी जल गई l जब हेडमास्तर जी को यह बात पता चल गई l तब वह छात्रो को शिक्षा करने हेतू पधारे l तब निर्मला जी ने उन्हे रोका l

और कहा कूछ नहीं सर, ये तो छोटे बच्चे है l तब हेडमास्तर जी बोले, “ मॅडम इन लोगो की कर्तुत को नजर अंदाज ना करो l इनका बरताव खुंकार बिगडे जानवरो के भाती है l उनके कारण इस स्कूल का नाम खराब हो गया है l इनके तेवर बहुत ही बुरे है l लकडी के बिना उनकी मकडी ठीक नहीं होगी l


निर्मलाजी हेडमास्तर की बातो से सहमत नहीं थी l उन्हे लगता बच्चे तो बच्चे होते है l खेल कुद् की उम्र मे अगर शैतानी नहीं करेंग तो क्या बुढापे में करेंगे l लेकिन वह चुप्पी साद के बैठ गई l कूछ ही दिनों मे निर्मलाजी ने अपने अध्यापन और स्कूल के इतर कामो में अपना कौशल्य दिवाकर बचौ पर छाप बनाई l उन्होंने मन में ठाण ली की वे इस स्कूल के बच्चो में ऐसा बदलाव करेंगी l और उन्हे उन्नती के कगारपर उच्चतम स्थान पर खडा करेंगी l के सभी ओर उनकी तरक्की के चर्चे ही चर्चे होंगे l


इसकी पहली मंजिल की सिडी का पहला पाव उसने स्कूल की मरम्मत से सुरु किया l अध्यापक, छात्र की एकजूट करके चंदा मांगकर उन्होंने स्कूल की हालत सुधार दी l स्कूल के मैदान में अलग अलग कुशलता बढाणे हेतू बदल किये l स्कूल के बच्चों का मानस टेस्ट किया l उनके अंदर छिपे गुणों को भाटकर उसके अनुसार शिक्षा देणी शुरू की l सुंदर हस्ताक्षर होणेवाले बच्चो की मदत से स्कूल की दिवारे पेंट करके उनपर अध्ययन के डिजिटल रूप दिये l


निर्मलाजी को मानसशास्त्र विषय में बहुत ही रुची थी l वह छात्र देखकर उसकी मानस स्थिती समजती थी l हर इतवार के दिन वह बच्चों के लिये महत्त्वपूर्ण तासिका लेती थी l बच्चों को व्यावहारिक कुशलता, तथा व्यवसाय प्रशिक्षण, व्यापार, अर्थ का नियोजन इस प्रकार का ज्ञान देती थी l इसके लिये संगणक का इस्तेमाल करके उन्हे दुनिया के बाजार मे हम कैसे आगे बढे उसके बारे मे ज्ञान देती थीl उनके इस तरीके के पढाई के कारण उनके स्कूल के बच्चों ने बहुत तरक्की की, स्कूल के बच्चे हर क्षेत्र मे चमकणे लगे l बच्चे उन्हे मास्टर जी के नाम से बुलाने लगे l


स्कूल के कूछ अध्यापक को निर्मलाजी के प्रति बच्चों का स्नेह देखकर जलन होती थी l

वो हर वक्त उनके उपक्रमो में कूछ गलतिया मिलती है क्या? हर वक्त धुंडते रहते थे l उनमें से एक थे महेंद्र सिंग वह एक रईस घराणे मे से थे l उनको नोकरी संस्था के कोटे से लग गई थी l वो स्कूल मे चमचमाती कार मे बैठकर आते थे l हर दिन नया कुर्ता, घडी, अलग स्टायल का गॉगल लगाके आते थे l स्कूल के बच्चों से दुरी बनाके ही रहते l पढाना तो नहीं आता था l लेकीन बडी बडी डींगे हाकता था l निर्मलाजी से हरवक्त झगडता रहता l एक दिन जोर की बहस हो गई l बात मुख्य हेडअध्यापक तक पहुंची l तब हेड अध्यापक ने निर्मलाजी के तरफ से बोलते हुवे कहा, “ सर जी पहले आप पढाना सिको l ए सुट बूट पहनकर शायनर मत बनो l निर्मलाजी नही होती तो आज इस स्कूल को ताला लग जाता l ये ध्यान में रखो l”

तब वह गुस्सा होके वहा से निकल गया l उसका बदला लेने की उसने ठाणी l और एक दिन रात के वक्त स्कूल मे डुपलिकेट चाविया बनाकर उसने निर्मलाजी के खाने से उनके उपक्रम की फाईल चुराकर ले गया l और उसे जला दिये l दुसरे दिन जब पता चला की निर्मलाजी के लोकर में चोरी हुई है l तब बच्चो ने भाप लिये की उसके पीछे किस लोमडी का दिमाग है l उनमे दसवी छात्र के बच्चे बहुत ही चिडे थे l उन्होंने महेंद्र सर को सबक सिखाने की ठाणी l और वह सवेरे टेहलणे जाते थे l उस वक्त कूछ बाहरी अपने दूर के मित्रों को बुलाकर उसे टेहलने गये वक्त आकेला पाकर उसकी पिटाई की उस दिन से उसका व्यवहार बदल ही गया l क्यो की वह अब जान चूका था l की उसके पीछे कोण होगा l


साल पर साल बितते गये l स्कूल मे निर्मलाजी ने अनेक उपक्रम चलाये थे l कूछ सालों बाद निर्मलाजी अब रिटायर हो गई थी l एक दिन वह अपने परिवार के साथ घुमने के लिये एक किल्ले पर गये थे l किल्ले की सैर करके वह जब लौट रहे थे l तब रास्ते में एक भेल का ठेला उन्होंने देखा l वहा पर बहुत भिड थी l वो भी भेलं खाने के लिये रुके l एक लडका आकार भेल् देकर चला गया l भेल खाकर वह उसके पैसे देने के लिये ठेले के पास गई l तब ठेले के पास रुपये लेनेवाले लडके ने उनसे भेल के पैसे लेने से इन्कार किया l और उनके पैर उसने छुये l और वह बोला , मॅडम आपने मुझे पेहचाना नहीं l”


निर्मलाजीने अपने आंखों का ऐनक ठीक किया l और गौर से देखा l एक सुंदर युवक उनके सामने खडा था l

वह बोला, मॅडम मे अशीश आपका छात्र, जिसे आपने जीने की कला शिकाई l आप जो इतवार के दिन जादा तासिका लेकरं हम बच्चो को व्यवहार कुशल उद्योग के बारे में पढाती थी l उस कारण मेरे जैसे कई छात्र आज अपने पैरो पर खडा होकर स्वावलंबन से कमाई कर रहे है l”

४) उजाले की ओर


निर्मलाजी ने उसे पहचाना l फिर भी वह अपने भेल के पैसे देने लगी l लेकीन उसने लेणे से मना किया l निर्मलाजीने उसे आशीर्वाद दिया l और वह चल पडी l निर्मला जी आज बहुत खुश थी l उन्होंने जो उपक्रम स्कूल के नाकरा कहे गये बच्चों के लिये चलाया l वह अब यशस्वी हो गया था l उन बच्चो के लिये निर्मलाजी एक सुरज देवता की तरह थी l जिस प्रकार सूरज अपने असंख्य अंशू से सारी वसुंधरा प्रकाशमय बनाता है l उस प्रकार अपने किय गये उपक्रम से अनेक बच्ची के जीवन मे उजाला निर्मलाजीने लाया था l अपने घर की तरफ जाते वक्त गाडी मे उन्हे एक सुकून सा लग रहा था l उन्होंने बच्चों को उजाले की ओर जाने की राह दिखाई थी l महात्मा गांधीजी का मुलोद्योगी शिक्षा का उपक्रम जो निर्मलाजी ने चलाया था l वह अब यशस्वी हो गया था l


उस प्रकार ही निर्मलाजी की सोच थी l वे कहती ती की जो शिक्षा आपमे विनम्रता, साहस, स्वावलंबन और दो वक्त की रोटी कमाने का ज्ञान दे lवह सही शिक्षा है l

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