Sunday, March 24, 2024

२) यहा पर कुछ तो पवित्र गिरा है l

 २) यहा पर कुछ तो पवित्र गिरा है l



महाराष्ट्र राज्य में बहनेवाली कृष्णा सरिता के तटपर बहुत उपजाऊ मिट्टी है l जिसमे गन्ना, हरभरा, चावल, ज्वार की हरिभरी फसले खेती में लहराती है l कृष्णा के पानी से यहापर जीवन खिला है l वहा पर कई सारे गाव बसे हुवे है l उस हरेभरे गावो में बसा एक गाव था l वहा पर एक जमिनदार रहता था l उसका नाम था मधुसुदन पाटील l पुर्वजों के जायदाद का वह अकेला वारिस था l गाव की अधिकांश नब्बे प्रतिशत जमीन का वह अकएलआ मलिक था l उसके पुर्वजों ने राजा और राज्य की रक्षा हेतू बलिदान दिया था l इस सेवा के लिये राजा ने उन्हे इनाम में यह जमीन का तुकडा दिया हुवा था l अधिकांश जमीन में से गाव के लोग तथा नजदीक गाव में रहणेंवाले मजदुरोसे काम करके उपज निकाली जाती थी l उसके खेत में से निकलनेवाले अनाज पर ही गाववालों का गुजारा चलता था l उसके पूर्वज सक्त मिजाज के थे l वह गाववालों से तथा मजदुरो से बहुत ही सक्ती से पेश आते थे l

मधुसूदन का व्यवहार उसके पूर्वजो से बहुत ही विभिन्न था l उसका बचपन अधिकांश मजदूरो के बच्चो के बीच खेलते हुये गया था l उसका यह मजदूरों के बच्चों के साथ खेलना कुदना उसके दादाजी और दादिजी को को नहीं भाता था l वह हर वक्त उसे दाटते थे l गुस्सा होते थे l एक दिन यह मजदुर तेरा घात करेंगे l लेकीन वह उसपर ध्यान नहीं देता था l वह केहता की वह मेर भरोसा कभी तोडेंगे नहीं l

समय बितता गया l बच्चे बडे होते गये l मधुसूदन अब बडा जमीनदार बन गया l और उसके साथ खेलनेवाले मजदूरों के बच्चे उसके जमीन पर मजदूरी करते थे l वह अब बडा था l तो उसे खलीहान का काम देखने जाना पडता l तो उसे बहुत ही बुरा लगता l की उसके मित्र खेत मे मजदूरी करते l और गरिबी मे जिते थे l वह हर बार उनके बारे में सोचता रहता था एक दिन उसने सोचा, की मेरा कुटुंब तो बहुत ही छोटा है l और मेरी खेती बहुत बडी हैं l इसमे से आधी जमीन तो मैं करता ही नहीं, क्यो ना ईसे मैं बाट दूं l यह अच्छी बात है l इस योजना को उसके घरके लोगो ने विरोध किया l तब भी उसने उनकी एक ना सूनी l और नदी से लेकरं पहाडी तक होनेवाली उसकी जमीन मे से आधी जमीन उसने अपने खेत में काम करणेवाले मजदूरों में बाट दी l लेकीन उनसे एक वादा लिया की वह लोग उसकी खेतीं में काम करेंगे l ताकी उसका घरबार चलता रहे l

मजदुर भाईयो को आधी जमीन बाट दी गई थी l इस कारण वह अब उसके मालिक बन गये थे l

कुछ सालो में उनकी आर्थिक परिस्थिती सुदर गई l इस कारण उनके बाल बच्चे खुशहाल जीवन बसर करने लगे l समय गुजरता गया l अब जमीनदार बुढा हो गया l आधी जमीन से भी उसकी बहुत तरक्की थी l मजदूरों की अगली पिढी जो थी बहुत खुशहाल जीवन जी रही थी l तरक्की के कारण उनको बुरी आदते लग गई थी l उनको जमीनदार की जमीन पर मजदूरी करना गवारा लग् रहा था l वह अब पिछ पीछे जमीनदार को गाली गलोच करते थे l जमीनदार को जब यह बात पता चली तो उसने उन्हे काम पर बुलाना बंद किया l और आस पडोस के गाव से मजदुर लाने लगा l पुराणे मजदुरो के लडको को जादा काम न होने के कारण वह जादा देर बेकार रहते थे l उस कारण उन्हे बूरी आदते लग गई थी l वे दारु पिना, जुवा खेलना इन जेसी बुरी आदतों के कारण उनका आर्थिक स्तर नीचे जाणे लगा l उनको मिली हुई जमीन से उनक गुजारा न होणे पर वह चोर्य कर्म करणे पर उद्युक्त हूये l वह जामीनदार के खेत से रात के समय चोरी करणे लगे l रात को अनाज, घास, लकडिया वह चुराने लगे l चोरी हो रही है l यह बात जमीनदार के नोकरो के ध्यान में आई l तब उन्होंने गस्त लगाकर उन्हे पकडा और कडी सजा देनी चाही l लेकीन जामीनदार को उनके भविष्य को लेकर उनपर दया आई l और उसने उन्हे ताकीद देकर छोड दिया l नोकरो ने कहा यह गलत कर रहे हो साहब l हमारे घाट की कहावत है l चोर और घास के बींडे को कभी ढील न देणी चाहिए l वर्णा वह अधिक नुकसान देह होती है l

बुरी आदत लग् जाये तो वे छुडे ना छुटे l मजदूरों के लडके अब बहुत बिघड गये थे l कूछ तो नशा पानी भी करणे लगे l उसके लिये वह लोग और चोरी करणे लगे l जमिनदारने उन्हे अपने मित्रों के बच्चे अपने बच्चे समजकर छोडा था l लेकीन वह उसे कायर समजणे लगे l “ यह क्या हमे शिक्षा देगा l हमारा बस चले तो हम इसका नामोनिशाण मिटा देंगे l उनके दिमाग में कुविचार आने लगे l व सोचणे लगे की यह जमीनदार कितना अमीर होगा l इसका परिवार इतनासा इसे किसलिये इतनी जमीन जायदाद चाहिए l उनके दिमाग में कुविचार की नागिण अपने विषैले विचारों का जहर फैलाने लगी l उन्होंने जमीनदार और उसके कुटूंब को खत्म करणे का निश्चय किया l

उन्होंने जमीनदार और उसके परिवार को खत्म करने का निश्चय किया l वह अपनी योजना बनाने लगे l एक दिन अचानक रात को लुटेरो का भेस लेकरं उन लोगो ने जमिनदार की हवेली पर हमला बोल दिया l 

२) यहा पर कुछ तो पवित्र गिरा है l



हमले को विरोध करते हुवे बहुत से नोकर मारे गये l बाहर हवेली के गहजब देखकर जमिनदार ने जान लिया की अपना परिवार खतरे में है l उसने अपने घर के जेवर तथा कूछ संभालकर रखे हुवे रुपये अपने बच्चों के हात में देकर उन्हे हवेली के खुपिया रास्ते से निकाला l तब तक हवेली का बडा दरवाजा तोडकर वे लोग अंदर आ गये थे l तभी उनके पकड में जमिनदार की बीबी आई l उन्होंने उसे धर दबोचा l और घसिटते हुवे हवेली के मुख्य दालन में लेकर आये l और जमिनदार को भी पकड लिया l

वे लोग उससे रुपये, जेवरात, और उसके घर - जमीन के कागजाद के बारे में पूछताज करने लगे l तब वह चीड गया l उसने उन्हे पेहचान लिया था l वह चोरी नहीं तो उसकी ज्यायदाद छिनना चाहते है l वह बोला तुम चाहे आकाश पाताल एक कर दो l तुम्हे कूछ नहीं मिलेगा l तुम लोगो को मैने जमीन दे दी l तुम्हारे खाने की तजवीज की, और तुम इसका एहसान मानने के बजाय मेरे घर में डकेती करने आये हो l ये मेरे वंशजो के लिये मैने कमाया हैं l बो भी पुरी प्रामाणिकता से , यह मैं तुम्हे किसी भी हाल में देनेवाला नहीं l

तब एक बोला, “अगर जिंदा रहोगे तो ही उन रुपये, पैसो का इस्तेमाल कर पावोगे ना और तुम्हारे वंशजो को तो हम खत्म कर देंगे l तब यह जायदाद किसे मिलेगीl”

वह लोग गुस्सा होकर उसे मारणे लगे l तो वह बोला, “ तुम लोग यह गलत कर रहे हो l भगवान सब कुछ देख रहा है l उसकी लाठी जब पडेगी तब आवाज नहीं करती l लेकीन तुम्हे पता चलेगा l मैने तुम्हे रोटी के लिये जमीन दे दी l और तुम मुजसे ही दगाबाजी कर रहे हो l शरम आनी चाहिए l मै तुम लोगो से दुजे जमीनदारों की तरह व्यवहार करता और अनाज के लिये तरसाता, तुम्हाला शोषण करतात , तब तुम्हे पता चलता l तब तुम लोग रेंगते हुवे मेरे पाव मे गिडगिडाते l और मेरे सामने इस तरह खडे होणे का धैर्य नहीं जुडा पाते l” तब एक बोला, “ बोलणे में वक्त जाया मत करो l ले चलो घसिटत्ते हुवे l”

 तब एक ने एक जोर का मुक्का मारा l जमिनदार फर्शपर गिर गया l उन्होंने उसे घसीटते हुवे हवेली से बाहर खिचते हुवे लाये l उसकी बीबी को भी वह खिचते हुवे ले आये l उन्होंने उसके सामने तेज धार वाली सुरी से जमिनदार की बिबी का गला काटा l वह खून से लतपत फर्श पर पडी l वह देखता रह गया l उसने उन से हतापाई करने की कोशिश की लेकीन उसकी एक न चली l उसके बाद उसे घोडे से बांधकर घसिटते हुवे खलीहान में लाये l उसके घर वालो के बारे में, बच्चो के बारे में पुंछा l लेकीन वह मार खाता रहा l पर कुछ नहीं बोला l उसने उन्हे खुपिया रास्ते कबका भेज दिया था l

वो अपने आप को बचाने के लिये चिल्लाता रहा l लेकीन कोई नहीं बचाने आया l फिर उसने भगवान से मदत की गुहार लगाई l वह बोला, “ हे भगवान बचावो l” अब उसके शरीर से खून निकलकर उसका बदन खून से भिग गया था l उसके बदन पर बहुत सारे जख्म हो गये थे l अब पुरा बदन दर्द कर रहा था l अंत समय उसे रहा न गया वह बोला,

“ देखा हैं फुल, पौधो और पेडो ने l देखा है इस उपजाऊ मिट्टी ने ना मैने किसी का शोषण किया, ना मैने किसी को लुटा l सत के राह पर चलने की सजा आज मुझे ये मिली l मेरी गुहार भगवान ने भी ना सुनी l में शाप देता हुं l जिस जमीन के लिये इन लोगो ने मेरी हत्या करनी चही l वह ही इन्साप करेगी l इन लोगो को इनके किये की सजा जरूर मिलेगी l

और मेरे बाल बच्चों को उनका हिस्सा मिलता रहेगा l इतने में एक ने उसके पीठ में छुरा मार दिया l बहुत सारा खून बह गया l और जमीनदार ने अंतिम सास् ली l उसके मृत शव को वही खलीहान में छोडकर वे चले गये l उसके बाद हवेली में सभी ओर उन्होंने धुंडा l तो उनके हाथ ना कोई धन मिला ना कोई रुपया l कुछ नहीं लगा l उन्होंने खूपिया रास्ते की भी खोज की लेकीन उनके हात असफलता लगी l जामीनदार के वंशजो को उन्होंने मारणे के लिये खूब धूंडा l लेकीन वह नहीं मिले l तबतक वह नदी पार करके जा चुके थे l

वहा से निकलकर वह दूर एक शहर मे जाकर बस गये l वहा पर उन्होंने अपने पास होणे वाले रुपयो से एक मकान और एक जमीन का तुकडा लिया l और जो भी काम मिले वह वो काम भी करने लगे l वह जिंदगी बसर करने लगे l

इधर उन मजदुरों के बच्चों ने उस जमिन के हिस्से किये और बाटकर उसमे खेती करने लगे l लेकीन वह कितनी भी मेहनत करे उनके परिश्रम के आधे हिस्से से भी कम उस जमीन से अनाज पैदा होता l आमदनी अठ्ठण्णी और खर्चा रुपया l इस तरह हालत मजदूरों के बच्चों की होणे लगी l उस खेत- जमीन से अगर घर के चूल्हे के लिये लकडी लाते l तो वह चुल्हे में डालते तो वह एक तिनके की तरह फुर्र होकर जल जाती l वह कितनी भी मेहनत करे l वह गरीब ही होते जा रहे थे l उन्हे सफलता नहीं मिलती थी l हर एक मजदुर के घर में झगडा हमेशा रहता था l उनका जीवन नर्क से बत्तर हो गया था l जिन लोगो ने उस जमिनदार को मारा l वह एक एक अपघात होकर मर गये l किसी को साप ने काटा l तो कोई बिमार होकार मरा l उनके बच्चे बडे होकर उस जमीन मे मेहनत करने लगे l लेकीन उनके मेहनत का भी आधी से कम अनाज मिलने लगा l

एक दिन वहा से एक साधू महात्मा जा रहे थे l थोडी देर के लिये वहापर रुक् गये l उनको देखकर कूछ मजदुर महीलाये उनके दर्शन को गई l उन्होंने साधू जी को फल, फुल अर्पण किए l साधू जी खुश हुवे l और वरदान मागणे को कहा l औरतो ने अपने खेत की इस समस्या के बारे में बताया l तब साधू ने सोचा अगर मेरे तपोबल के सहारे उनके खेत् का बुरा साया निकल गया तो अच्छा हैं l तो वे उस खलीहान में उन मजदूरों के साथ चले गये l उन्होंने अपने हात मे एक पानी का कमंडलू लिया l उसमें पवित्र जल था l वह वहा पर सिंचित किया l तब वहा की जमीन हिलने लगी l पेड, पौधे हिलने लगे l वहा की फसल खिलखिलाकर हसणे लगी l वह बोली, “ जाओ चले जाओ, तुम्हारा क्या यहा काम?”

२) यहा पर कुछ तो पवित्र गिरा है l


तब साधू बोले, “ तुम कोण हो? इस खेत का अनाज खाकर इन गरीब मजदूरों पर जुलूम कर रहे हो l”

तब वहा की धरती बोली, “ कैसा अन्याय? कोणसा अन्याय? ये पापी, इन्के पुरखे पापी, यहापर अन्याय नहीं न्याय ही हो रहा हैं l में हुं यहा की न्यायदेवता l एक बीज कहे दुजे बीज को निपज हो आधे से अधुरी, इनकी मजदूरी ही इन्हे मिले l “

२) यहा पर कुछ तो पवित्र गिरा है l


तब साधू बोले, “ लेकीन तुम कौन हो l यहा के मजदुर का इन्साफ करने वाले, मैं अपने हात के इस पवित्र जल से तूम्हे नष्ट कर दूंगा l

“ अरे ओ पुण्यपुरुष ना आव देखा न ताव लगे बडी चडी बाते करने l तुम्हारे तप से भी यहा कूछ पवित्र है l जो परमेश्वर के भाती समान है l यहा पर कूछ ऐसा गिरा है l जो की सत्य से भी महान है l सत्य ही ईश्वर है l क्या तुम ईश्वर से बडकर हो l”

साधू बोले, “नहीं मैं नहीं हुं l लेकीन क्या है पवित्र यहा l”

धरती बोली, “ यहा पर गिरा है खून जमिनदार का, जो दया और करुणा का सागर था l जिन पर उपकार करे वही अपकार करे l अन्नदाता को जो भूल जाये l वह कैसे इन्साफ के लायक l हम हमारा काम करेंग l आधे से जादा अनाज जायेगा उनके हिस्से जो इसके हक्कदार है l”

साधू पुरुष ने धरती मां की बाते सुनी l और आखें बंद कर ली l और अपने अंतरिक शक्ती से जाना की एक आदमी बाजार गया हैं l उसको अनाज उसके औसत मूल्य के आधे से भी आधी किंमत मे मिल गया हैं l तब उसने भूत काल मे झाका l तब उसके सामने सभी हकीकत आ गई l”

 फिर आँखे खोलकर साधू ने मजदूरों से कहा की यहा पर बहुत ही बूरा हुवा है l आप के परिवार सदियों तक भी चाहे यहापर पुरा अनाज निकाल नहीं पायेंगे l तुम्हारी पिढीया दर पिढीया जाती रहेगी l फिर भी तुम्हारी उन्नती धिमी रहेगी l तुम लोग जिधर भी जाओगे यह शाप आपके साथ चलता जायेगा l जैसी करणी वैसी भरणी l तूमने एक बार मारा l वह तुम लोगो को तिल तिलकर मारेगा l

तब मजदूरों ने उनसे पूछा की इसका कोई उपाय नही क्या?

तब साधू जी बोले, “ नहीं इसका कोई उपाय नहीं l जब तक सृष्टी हैं l यह चलता रहेगा l जब तक जमिनदार के वंशज अपने पेट के लिये मेहनत करते रहेंगे l तबतक उन्हे उनका हिस्सा यह धरती मां देती रहेगी l जो नियत से अच्छा हो l उसकी राह में काटे बिछा ओगे , तब वो तूम्हारे पावं में ही चुबेंगे l अब हर बार आप लोग जब भी अनाज बोवोगे और काटोगे तब धरती से अपने हिस्से का आधा अनाज जो मेहनत का होगा वही देने के लिये पूजा करो l तो काश तुम्हारे व्यवहार हे खुश होकर यह धरती प्रसन्नता से आधा तो देगी l

साधू ने झुककर उस धरती को नमन किया l और अगली यात्रा के लिये प्रस्थान कर गयेl


Sunday, March 17, 2024

१) पवित्र गाय

१) पवित्र गाय

१)  पवित्र गाय



महाराष्ट्र राज्य के पश्चिम प्राकृतिक संपदा मे स्थित सह्यगिरी नामक पर्वत के दरो मे बहुत सारे गाव नदियों के किनारे बसे हुवे है l यहा के प्रदेश मे बहनेवाली नदियों के कारण यह प्रदेश सुजलाम सुफलाम बन गया है l सह्य की शृंखला से निकलकर पुरब की तरफ बहनेवाली कृष्णा तथा उसकी उपनदीया बारिश के मास मे बहुत उफान पर होती है l इन नदियों के किनारे सहयगिरी की ओर घाट मुलुख मे छोटे छोटे गाव है l उसी घाटी में शिवापूर नामक एक गाव है l उसके एक तरफ से नदी बहती है l तो दुजी ओर घनी पहाडी और उसके दरे मे उतारो पर सिडी की तरह खेती है l उस गाव के लोग खेतीबाडी करके अपना गुजारा करते थे l उस गाव मे एक मुहल्ला है l मुहल्ले में कूछ मुसलमान भाई रहते थे l उस में से एक घर अब्दुल्ला का भी था l वह किसान था l उसके घर की आर्थिक परिस्थिती बहुत ही बेचीदा थी l दिन भर हिंदू भाईयो के साथ खेतीबाडी पर काम करके मिलनेवाली मजदूरी से किसी तरह गुजारा चल रहा था l पूर्वजों से मिला हुवा एक छोटासा जमीन का तुकडा और दो – चार बकरीयां तथा गाव मे एक छोटा सां मकान यही उसकी संपत्ती थी l उसकी शादी हुई थी l उसकी बीबी एक गरीब घर से थी l अलाह की कृपा से उसे दो गोरे चट्टे और खुबसुरत बच्चे थे l हर पल उसके सामने उनके भविष्य को लेकर चिंता रंगी रहती l

वह बारिश के दिन थे l एकाएक जोरसे मुसलाधार बारिश होने लगी l उस कारण वश घर से बाहर निकलना मुश्किल हो गया था l उसके कारण काम भी रुक गया था l मछली पकडणे जाये तो जाये कैसे? नदी का पानी उफान पर था l घर में होने वाले चावल का गाडा पानी पकाकर और नजदीक रहणे वाली हिंदू बहण पार्वती अम्माने दिये हूवे नाचणी के कडी से चार – एक दिन गुजारा करने लगे l पाच – छह दिन के बाद बारिश थम सी गई l उस दिन सबरे वह मछली पकडणे के लिये नदी की तरफ गया l नदी अभी भी जोर शोर से बह रही थी l उसने पानी में जाल फेका ; तभी उसे एक बछडे की आवाज सूनाई दी l उसने आवाज की तरफ ध्यान दिया l आवाज नदी किनारे होणे वाली घलई से आ रही थी l नदी के तट पर मछली पकडणे के जाल का एक छोर उसने पेड की टहनी से बांधा और

वह आवाज की तरफ जाणे लगा l तो नदी के किनारे एक पेड के निचे उसने देखा की वहा पर गाय का एक बछडा फसा हूवा है l पानी में भिगणे के कारण वह काप रहा था l जब बछडे ने देखा, कोई इन्सान है l तो वह उसकी तरफ दया की नजर से देखने लगा l अबू के मन में उस बछडे के प्रति स्नेह जागृत हुवा l उसने उस बछडे को निकालने का प्रयास सुरु किया l लेकीन बारिश के कारण बहुत फिसलन हो गई थी l इसलिये वह उस बछडे को निकाल नही पा रहा थाl इसलीये वह जाल की रस्सी लाने के लिये नदी के किनारे गया l उसने जाल को पानी से निकाला , और वह उसकी रस्सी छुडाकर ले आया l उसने उस रस्सी के एक छोर को पेड से बांध दिया l और पानी में उतरकर उसने उस बछडे को निकालने का प्रयास सुरू किया l नदी के पानी का बहाव बहुत तेज था l उसने रस्सी से उस बछडे को बांध दिया l और उस बछडे को पानी से निकाल दिया l किनारे आने के बाद अपने आपको सुरक्षित पाकर बछडा अबू को प्यार से चाटणे लगा l अबू को भी उससे बहुत प्यार आया l उसने उसे एक पेड को बांध दिया l और मछलीया पकडणे के लिये उसने जाल को पानी में फेक दिया l और कूछ मछलीया पकड ली l और वो गाय के बछडे को लेकर घर वापस आ गया l उस के बीबी ने तरह तरह के सवाल पूछे l लेकीन जादा बाते न करके उसने पकडी हुई मछलियों की थैली अपने बिबी के पास देकर गाय के बछडे को उसने गोठे में बकरीयों के साथ बांध दिया l उसके बाद उसने एक फटे हुवे कंबल से उस बछडे को अच्छी तरह से पोंछ दिया l उसके बाद रसोई घर से चुल्ले के अंगार लाकर उसने छोटे से लहू के टोकरे में आग जलाई l और उस बछडे को सेक दिया l

उसके बाद उसने उसे पानी पिलाया, और चारा डाल दिया l उसके छोटे से बच्चे दौडते हुवे आये l आपने घर में आये, इस नन्हे मेहमान का स्वागत करणे, तथा उसके साथ खेलने और उसका आतिथ्य करणे के लिये दौड कर आये l अपने हातो से उसे सेहलाने और खिलाने लगे l

कूछ दिन के बाद बारिश के कारण इधर उधर हरियाली छा गई ; और गाय का बछडा भी तंदुरुस्त हो गया l तब अबु अपनी बकरीयों के साथ उस बछडे को भी चराणे के लिये लेके जाणे लगा l थोडे ही दिनो में बछडे की कांती हरिभरी घास पूस खाकर सुधर गई l और वह बहुत ही सुंदर दिखने लगा l दिन गुजरने लगे l एक दिन हरदिन की तरह अबू अपने जानवरों को चरवा रहा था l हरियाली मे बछडा और बकरीयां उचलकुद करणे लगे l तभी वहा से एक हिंदू साधू दक्षिण भारत की यात्रा पर जा रहे थे l उनके साथ कुछ उनके शिष्य भी थे l जो कन्नड प्रांत के मठ जा रहे थे l वह हिंदू पाठशाला के छात्र थे l उन्होंने देखा की एक म्लेंच्छ अपनी बकरीयां चरवा रहा था l उसके पास एक बछडा भी है l जब साधू ने देखा तो वह उन्हे बहुत भा गया l वे गाय के बछडे को निहारणे लगे l उसका अप्रतिम सौंदर्य बहुत ही अचरज करणे वाला था l एक पवित्र गोमाता के लक्षण उस में थे l उन्होंने नजदीक जाकर पता किया की वह गोरा है , या गोरी l जब उन्हे वह एक मादा है, पता चला तब वह सोचने लग गये, की यह बछडा इतना अच्छा है l लेकीन यह मुसलमान जादा से जादा उसे दो- चार साल तक संभालेगा l और एक दिन किसी कसाई को बेच देगा l क्यो न अभी ही उसे इस का योग्य मूल्य देकर ये बछडा मै ले लू l वें अबू के पास गये l और उन्होंने पूछा की ये गाय का बच्चा किसका है ?

 अबू बोला, “ ए तो मेरा है l क्यो आपको क्या काम है l”

साधू बोले, “ मै एक मठ का अधिपती हूं l मुझे ये गाय का बच्चा मेरे मठ के लिये चाहिए l उसका योग्य जो भी मूल्य हो मैं चुकता करणे के लिये तयार हूं l”

“ ना बाबा, ना मै ना बेचू उसे.”

 साधू बोले, “ अरे, तू कितने साल तक उसे संभालेगा l उसे अच्छा हट्टा कट्टा बनाके कसाई को ही एक दिन बेचेगा ना, तभी तो में बोलू की यह मुझे बेच दे, में उसे वर्तमान गाय का मूल्य चूका दूंगा l”

अबु बोला, “ अरे भाई, तू गाय का मूल्य दे या बैल का, मैं ना बेचु मेरे बछडे को, और कसाई को बेचने के लिये, मैं इसे नही पाल रहा हुं l”

साधू बोले, “ अरे भाई, तुम सोचो की तुम एक मुसलमान हो l गाय को पालने का काम तुम कैसे करोगे l मुझे दे दो उसका दान.”

अबू बोला, “ अरे भाई तुम भी बहुत हटी हो l जाओ मै कोई दानवान देनेवाला नहीं l जीस तरह कोई मां अपने बेटे को नहीं बेच् सकती l उसी तरह मैं न बेचू और दान देणे के लिये तुम क्या गरीब हो l तुम तो संन्यासी तुमे क्या जरुरीl”

साधू बोले, “ठीक है l तुमने अगर ठान ही लिया हैl तो सूनो, यह बछडा अच्छी गाय की जाती का है l तुम इसे पालोगे तो तुम्हारे घर में लक्ष्मीजी की बरसात होगी l लेकीन इसे कभी भी बेचने का खयाला दिमाग में न लाना, और कभी भी इसे किसी कसाई को न बेचना l मुझे जबान दो l”

अबू बोला, “ठीक है l जब तक मेरे जान मे जान है l ईसे कभी नहीं बेचुंगा l न काटने के वास्ते दुंगा l अल्हाह की सौगंद खाता हुं l मैं इस की सदैव रक्षा करुंगा l”

इसके बाद साधूने उससे जाणे की अनुमती ली l और वे वहा से चले गये l जाते वक्त साधू से उनका एक शिष्य रास्ते में बोला की, क्या वह यवन अपना शब्द पालेगा l

साधू बोले, “ कयो नही पालेगा? उसने उसके मानने वाले परमेश्वर कि शपथ जो ली है l और उसका व्यवहार और बछडे से प्यार दिखाई नहीं दिया क्या तुम्हे l जब हम बाते कर रहे थेl तब उसने उसे बडे प्यार से अपने पैरो के बीच जकड लीया थाl”

शिष्य बोला, “ हम चाहते तो उससे वह बछडा छिन भी सकते थे l”

साधू, “ हम अगर उससे छिन् ने की कोशिश करते, तो यह अनुचित व्यवहार होता l वो अपनी जान पे खेल जाता l वह एक नेकदील इन्सान है l उसके चेहरे से सत्य का ओज दिख रहा था l”

शिष्य बोला, “ लेकीन वह तो मुसलमान उसकी जबान का क्या है भरोसा l कब मुकर जाये वह l उस बछडे को खिला - पिला के तयार करेगा, और ईद के दिन कुर्बान करेगा l और दावत देगा l

साधू बोले, “ ना ..ना… वह कभी नहीं बदलेगा l हिंदू क्या और मुसलमान क्या सभी परमपिता के बच्चे , परमपिता ने तो पुरुष और स्त्री बनाई l यह जातपात,धर्म , मजहब तो इन्सान ने बनाये है l चलो अभी सूरज चढ रहा हैं l अभी हमे बहुत दूर जाना है l”

और वे निकल पडे l

उस दिन से अबुको उस बछडे से कूछ जादाही लगाव हो गया l वो बडी खातिरदारी से उसकी देखभाल करणे लगा l दो चार सालो मे उस बछडे का गाय मे परिवर्तन हो गया l अबू ने उसका नाम लक्ष्मी ही रखा लक्ष्मी के कारण उसके घर मे खुशिया आ गई l साधू के कहे अनुसार वह दिखणे में भी बहुत ही सुंदर थी l उसका गेहुवा रंग और मुलायम से छोटे बाल दिन को सूरज की रोशनी मे तक तकाते थे l उसके शिंग रसोई घर में होणेवाली आरी की तरह वक्र और नुकिले थे l जिनको देखने के बाद यह अभास होता की मानो प्रतिपदा की चंद्र कोरे खिली हो l लचीले पैर, चिकणी पिठ, और सुडौल लंबी गर्दन के कारण लगता की वह कामधेनू की ही पुत्री हो l पूंछ तो धरतीपर टिकी हुई l उसके चलते वक्त वह हिलाती तो एक नव युवती साज श्रृंगार करके अपने बालो को सजाके आई हो ऐसे लगता l पहली उपज में उसने एक अच्छी नसलं वाले गोरे को जन्म दिया l उसका दूध पिकर अबू के बच्चे बडे होणे लगे l घर खर्च के लिये दूध माखन बेचकर कुछ रुपये जुडणे लगे l इस कारण घर के खर्च का काम आसान हूवा l

१)  पवित्र गाय


 आजू बाजू के किसान आपस में गाय को देखकर ललचाकर आपस् में बाते करते ‘ काश यह हमे मिली होती l कुछ ने तो रुपये देकर खरिदने की भी बात चलाई l लेकीन अबू न माना तो उसे अपने खलीहान से घास भी जुडाने से अटकाव करते l तब अबू केहता जीसने पैदा किया वही पेट का इंतजाम करेगा l और कही ना कही से उस समस्या का हल निकल आता l गाय ने लागतात दो गोरे दे दिये l व गाय के साथ बढणे लगे l अछी नसल के होणे के कारण बचपन से ही उनके लिये खरिददार आते थे l लेकीन अबू ने उन्हे बेचणे के बजाय पालना बेहतर समजा l उनको बडा करके उनके द्वारा खेती के काम अबू करणे लगा l उससे मिलन वाले मुनाफे से उसने बचत करके अपने मकान की मरम्मत उसने करवाई l उसकी बीबी भी खुश थी l गाय के कारण घर मे बरकत आ गई l गाय के गोबर की धूप तथा इंधन के लीय इस्तेमाल वह करणे लगी l इस कारण चुल्हा चौका अच्छी तरह चलने लगा l

घर में गाय के आणे से प्रसन्नता आ गई थी l घर में आरोग्य का वास होणे लगा l गाय का दूध पीकर अबू के बच्चे हट्टे कट्टे होणे लगे थे l

घी में अगर मक्खी गिर जाये, और वह अनुपयुक्त बन जाये l उशी तरह गाव में बुरे विचार वाले लोग थे l गाव में रहणेंवाला अस्लम कसाई तो अपनी करणी से बुरा था l अबू की गाय उसके नजरो में सलती थी l वह गाव वालो को तथा अन्य मुसलमानों को अबू के खिलाफ भडकाने का काम करता था l एक बार गाय ने एक बछडे को जन्म दिया l उसके कूछ दिन बाद वह मर गया l अबू ने उसे ले जाकर खलीहान में दफन दिया l तब अस्लमने हिंदू भाईयो के कान भर कर उन्हे भडका दिया l उसने उन से कहा की अबूने गाय का बछडा काटने के लिये बेच दिया l तब गाव के मुखिया के साथ गाव की समिती ने उसपर बहिष्कार डाल दिया l कोई भी उसे खेतं के काम पर नही बुलाता l इस कारण घर का खर्च और मवेशीयों को पालना कठीण हो गया l अबू ने पैर पकडकर सब से कहा की गोऱ्हा मर गया था l इस लिये मैने उसे दफन किया l फिर भी लोग न माने l गाव के बावडी का पानी तक भरणे से मना कर दिया l उस कारण वह नदिसे पानी लाने लगा l उसकी बीबी शबाना को जब यह बात नजदीक रहनेवाली कमला चाची से मिली की अस्लम कसाईने ही गाव वालो के कान भर दिये है l तब वह आग बाबुला हो गई l एक दिन जब वह पानी भरणे गई थी तब उसे अस्लम कसाई रास्ते में मिल गया l तब उसने बहुत गलिया दीं l

“ अरे, ओ कसाई के बच्चे तुझे लाज शरम है के नहीं l मेरा मिया इद के बकरे को हलाल करने से भी डरता है l और तू कमीने ऊसपर गंधा इलजाम लगाता है l माटी मिले तेरा जनाजा निकल जाये l”

कसाई घर गया l थोडीही देर में उसकी बिबी तणतणाते हुंई आयी l और शबाना से बहस् करणे लगी l

“ अरे ओ करमजली मेरे मीया का जनाजा निकालने वाली तू जहनम चली जाये l बेडा गर्क हो जाये तेरा तेरी गाय को और तुझे एक साथ काटके कसाई खाने में टांग दुंगी मैं हा.. l”

तब शबाना को गुस्सा आया l वह बोली, “ अबी वो कसाई की चुडैल तुम्हारा ये तेवर जाकर अपनी सास को दिखाणा मारे सामने नहीं l मेरी गाय को काटना तो दूर रहा l मै तेरी बोटी बोटी करके चील कवे को खिला दूंगी l”. उन दोनो का झगडा इतना बडा की वे दोनो हतापाई पर उतर आई l तब गाव की औरते बिच में आई , और झगडा छुडवा दिया l

जाते जाते शबाना बोली, “ अल्हा सब कुछ देख रहा है l कयामत के दिन ना मैं उसके सामने तेरी गरदन पकडू तो मेरा नाम भी शबाना नही l”

 इस झगडे मे फुटा हुंवा मटका वही छोड कर वह अपने घर को वापस रोते हुवे निकल गई l

अबुने गाव के मुखीया से बातचीत की, मुखियाने उसके बात को माना, लेकीन शर्त रख दी, की तुम बछडे को दफन किये जगह को खुदवा के दिखा दो l तभी मे और लोग मानेंगे l तब अबू ने अपना मन मारकर वह दिखाने की बात मानी l दुसरे दिन गाव वालो के सामने खेत में खुदाई करके उसने वह गडा बछडे का शव निकाल कर दिखाया l अधसडे शव की गंधी बास इधर उधर फेलने लगी l सब लोग नाक पकडकर दूर जाणे लगे l मुखीयां ने उस शव को दफनाने को कहा l सभी लोग अस्लम कसाई की छी थू करणे लगे l अबू ने उसे फिर से दफनाया l उसके बाद वह घर लोटा l उसने स्नान किया l उसकी बिबी नाराज थी l वह अल्हाह को बुरा भला कहने लगी , की उसने ऐसा पाप हमसे क्यो करवाया l तभी वहा पर पडोसी सलमा आई l और बोली, “ तेरा मिया कभी निमाज नहीं पडता l कभी भी मैने उसे मस्जिद जाते हुवे नहीं देखा l इस लिये अल्हाह खफा हो गया है l इतना ही नहीं उपर गाय पालकर उसका नाम भी काफर नाम से रखा है l”

तब अबू बोला, “ नमाज का मतलब जानती भी हो क्या? सलमा बहण, नमाज एक पवित्र रिवाज है l जो पुरे प्राण एक करके परम अलाह का शुक्रिया अदा करणे का रीवाज है l इस के लिये कही मश्चिद जाणे की जरुरत नहीं हैं l सच्चे मन से कही से भी खाते पिते काम करते हुवे सभी जगह पर एक मिनट के लिये सही आखे मुंदकर उसका नाम लो वह समज जायेगा की बंदा उसे याद कर रहा हैं l अगर वह मुजसे खफा होता तो मुझे इतनी प्यारी गाय न देता l यह तो मुझे अल्हाह ने दे दी हैंl मेरे जैसे बंदे पर उसका कृपाप्रसाद है यह तो l यह कोई साधारण गाय ना है l अल्हाह की गाय है l अल्हाह की l”

सलमा को यह बात पसंद न आई l वह अपना मुह फुलाकर बोली, “ चूप कर मारे सामने ये चिकणी चुपडी बाते ना करो l अल्हाह की गाय l केहता है करमजला l अरे, कूछ दिन बाद बुढी हो जाएगी l तो अपने आपही कसाई को बेच् दोगे l

काफरो के संग रहकर काफर की जबान बोलता हैं l हुं किसी को कूछ भला कहने जाये तो भला तुम्हारे दिमाग में भूसा भरा हैं l इसलीये ही गडा मुर्दा निकालने की सजा दे दी अलाह ने l”

तभी अंदर से शबाना बोली, “सलमा, चूप कर और निकल जा मेरे घर से l अगर हमने गलत किया है l तो वो अल्हाह जाणे और हम, तुम्हे खपा होणे की जरुरत नहीं l”

शबाना का तेवार देखकर सलमा उठ गई l और जाणे लगी l जाते हुवे वह बोली, “ भलाई का तो जमाना ही नहीं रहा l” और वह चली गई l उसके बाद शबानाने अल्हाह को बूरा भला कहा इसलीये ऊससे माफी मांग ली l और खाना खाणे के लिये अपने पती को आवाज दी l लेकीन उस दिन अबू का खाणे में मन नहीं लगा l वह अंदर के कमरे में जाकर चारपाई पर भुके पेट सो गया l

गाववालोने अब बहिष्कार उठा लिया था l लेकीन कुछ लोग उसे अभी भी काम नहीं देते थे l इसलीये वह नदी के पार जाकर काम करता और जानवरों का खाना जुटाता l

बारिश के दिन आये l नदी का बहाव कभी बडता तो कभी कम होता था l एक दिन पानी कम था l उस दिन जानवरों के खाणे की किल्लत थी l इसलीए उसने गाय और बैलो को छोडा l और उन्हे चराणे के लिये तथा घास का जुडाव करणे हेतू वह नदी के पार ले गया l उसने कूछ घंटे उन्हे चराके उनके रात के खाणे के लिये एक छोटासा बिंडा बांध दिया l और उन्हे लेकर अपनी गाव की और निकल पडा l जब वह नदी के किनारे आया l उसने देखा नदी का जलस्तर बड गया था l सांज हो गई थी l कुछ भी करके नदी पार जाना था l उसने पानी के बहाव का रुख देखा और अंदाज लगाया l उसने बैलों को पानी के बहावं में उतरणे की कोशिश की लेकीन पानी के बहावं को बैलों ने बाफा और वो डरकर पिछे हट गये l अबू को कुछ सूज न रहा था l तब लक्ष्मी गाय. किनारे होतें हुवे नदी की उपरी क्षेत्र गई l उसके जवान बैल भी उसके पीछे चल दिये l दुजे किनारे जिना कठीण था l लेकीन उपरी क्षेत्र जाकर लक्ष्मी ने नदी के पानी मे छलांग लगाई l और तिरछे पानी काटते हुवे वह चली l तब उसके बैल भी उसके पीछे चले l और असानी से उसने दुजा तीर पार किया l अबू ने गाय की चलाखी देख ली थी l वह भी अपने घास के बिंडे के साथ गाय जहा से उतरी थी l वहा से पानी मे उतर गया l उसने बींडा पानी में फेका और वह उसपे चढ गया l और पानी को तिरछे काटकर जाणे लगा l लेकीन दुजे किनारे जातेवक्त पानी के तेज बहाव के कारण वह दूर जाणे लगा l तब उसने पानी मे छलांग लगाई बींडा बस गया l और वह पानी को कापणे लगा लेकीन बहावं तेज था l उस कारण उसे अपने गाव के किनारे जाना कठीण हुवाl तो उसे एक पेड नजर आया l उसके तरफ तैरते जाकर उसने पेड का आसरा लिया l

वह डर गया था l अब क्या करे l उतने में उसकी गाय लक्ष्मी ने देखा l और वह फिर से पानी मे उतरकर उसके पास आई l और उसे रंभाकर पुकारणे लगी l तब अबू ने सोचा अब यही मेरा आसरा है l जो मेरी डुबती नैया पार करेगी l उसने अलाह का नाम लेकरं पानी में छलांग लगाई l और गाय की तरफ तैरते हुवे जाकर उसकी गर्दन को उसने पकडा l और वह लटकने लगा l और गाय उसे किनारे लेकर आयी l किनारे आते ही अबू की जान में जान आयी l उसके बाद वह अपने जानवरों को लेकरं वापस घर लोट आया l उसकी बीबी राह तक रही थी l अपने मिया को ठीक ठाक घर लौटते हुवे देख वह फुलो न समाई l अबूने गाय और बैलोंको अपने गोठे में बांध दिया l और चुल्हे के पास गरमी शेकने हेतू चला गया l

दिन गुजरणे लगे l लक्ष्मी के कारण अबू के घर में बरकत आने लगी l उसके बेटे भी बडे हो गये l घर का कामकाज संभालने लगे l अबू अपनी गाय के साथ जीवन की उतार को लग गया था l लक्ष्मी अब बुढी होणे लगी थी l अब उसके दात भी काम नहीं कर रहे थे l उसे चारा काटकर खाने में भी दिक्कत होती थी l लक्ष्मी के कारण उसके घर में दो तीन गाये भी निपज गई थी l बांधणे के लिये जगह भी नहीं थी l तब उसके बेटे कहने लगे की अब्बाजान लक्ष्मी अब बुढी हो गई है l क्यो ना हम उसे बेच दे l

अपने लडको की यह बात सुनकर अबू आगबबुला हो गया l और उसने इस बारे मे अपने बच्चोंसे झगडा भी किया l अबू बोला, “ मैने कसम खाई हैं l जबतक मेरी जिस्म मे जान है l तब तक मेरी गाय को बेचने का खयाला भी मत लाना l एहसान फरामोश हो तुम, तुम्हे पालपोसकर बडा करनेवाली वो गाय कोई साधारण पशू नहीं हैं l आज सबेरे रुबिना कह रही थी l वह बिलकुल सच है l की तुम उस अस्लम कसाई से बात कर रहे थे l वह पापी जिसने मुझे सारी गाव के सामने गढा मुर्दा जानवर निकालने के लिये कहा l वह कुछ रुपये देकर मेरी गाय को छिनना चाहता हैं l अरे, उसका बस चले तो अपनी अम्मा को तक काटकर बेच डाले l याद रखना मेरी गाय की तरफ बुरी नजर डालने वाले को समय आने पर मै अपना पराया भूल जाऊंगा l

अगर मेरी गाय पे जरा भी आच आई तो देख l तब उसका बेटा सलीम बोला, “ गाय अब बुढी हो गई है l और बिमार भी रहती है l अगर उसे घर में रखा तो दुसरी भी गाये बिमार हो सकती है l घर में छोटे छोटे बच्चे भी है l अगर गाय के कारण वह बिमार हो गये तो मै चूप नहीं रहुंगा l”

सलीम की बाते सुनकर अबू की आँखो से आसू आगये l उसने सोचा की जग कितना स्वार्थी है l जब कोई अपने काम का न रहता तो उसे दुत्खार देता है l फिर वह उठा उसने कुल्हाडी, फावडा और पार ली l और वह खेत की तरफ निकला l खेत मे जाकर उसने कुछ लकडिया और घास फूस इकट्ठा की और उससे उसने एक कुटिया बनाई l और लक्ष्मी को ले जाकर उसने वहा पर रख दिया l और अपने रहणे का इंतजाम भी उसने वहा किया l सिर्फ खाना खाणे के लिये ही वह घर जाता था l उसने दिन रात लक्ष्मी की सेवा में लगा दिये l

कुछ दिन बीत गये l सर्दी का मौसम आया l कुटीया में रहणे के कारण थंड बहुत लगती थी l अबू भी बुढा हो गया था l थंड के कारण वह जादा चल भी नहीं सकता था l सर्दी बड़ने लगी l गाय की हालत भी बत्तर होणे लगी थी l एक दिन बहुत थंड पडी थी l अबू का बेटा खाना देकर गया था l रात हो गई थी l चार्ज की गई टॉर्च भी धुंधली हो रही थी l उसकी रोशनी में अबूने खाने का डिब्बा खोला l खाणे से पहले एक निवाला गाय को खिलाया l लेकीन लक्ष्मी ने वह मुह में लिया लेकीन वह खा न पाई l उसे थोडा पानी पिलाया l और गाय को रात के सोते वक्त का चारा डाला l और उसने खाना खाया l थोडी देर बाद उसने देखा थंड के कारण गाय बहुत काप रही थी l थंड बहुत बढ गयी थी l अबू के भी हात पैर मे जकडण आ गई थी l अबुने रात में गाय के नजदीक जाकर देखा l गाय की हालत थंड के कारण बहुत ही बत्तर हो गई थी l घर से बाहर निकाले जाणे से उसे अकेलेपन का आभास हो रहा था l अबूने अपना कंबल गाय के उपर डाला l लेकीन वह आधुरा ही उसके शरीर पर बिखर गया l दुजा छोटा कंबल लेकरं वह चार पाई के पास पहुड गया l सर्दी बढने लगी l थोडी देर बाद टॉर्च की रोशनी भी बंद हो गई l

सबरे सबेरे अब्बा को चाय देणे के लिये चाय की छोटी सी किटली लेकरं सलीम आया l तब उसने अबू को चारपाई के पास कंबल लिपटकर पडे हुवे पाया l उसने किटली जमिन पर रखी l और अबू के पास वह गया l उसका शरीर थंडासा लगा l सासे भी चल नही रही थी l उसने इधर उधर देखा l तो गाय भी आकाश की तरफ मूह करके पडी हुईं थी l वह अबू का नाम लेकरं चिल्लाया l और रोने लगा l सुबह के वक्त खलीहान से दूर होनेवाली सडक पर जानेवाले साधू के जथ्थे ने वह आवाज सून ली l

उसमेंसे एक साधू बोला, देखो तो कोई रो रहा है l तभी वह आवाज की दिशा की और चले गये l वहा जानेपर पता चला की एक मुसलमान रो रहा था l और वहा पर एक गाय और एक बुढा मुसलमान मरे पडे हैं l एक साधू ने आगे जाकर उससे पूछताज की l उन मे से एक संन्याशी ने बारिकी से निहारकर देखा l और वह आगे बढा l उन्होंने एक नजदीक होणेवाले पेड का पत्ता तोडा l अपने हात के कमंडलू से थोडा पानी लेकरं उन मृत गाय और अबू पर सिंचा l और वह बोले, राम नाम सत्य है l जो आया वह चला जायेगा l और झुककर प्रणाम किया l और वह चले गये l

जाते वक्त उनके शिष्य ने उनसे पूछा, “ भगवन आप तो महान तपस्वी हो l आपने उस मृत मुसलमान के शव पर झुक् कर प्रणाम क्यो किया l वह निर्दोष प्राणिंयो को मारके खाते है l तो वह पापी ही हुवे ना l”

तब साधुजी बोले, “ बहुत साल पहले मै अपने गुरु के संग इस क्षेत्र से गुजर रहा था l तब यही मुसलमान अपने बकरीयों के साथ एक बछडे को चरा रहा था l तब मेरे गुरु ने उससे उस बछडे को देने के लिये बहुत प्रलोभन देकर उससे वह बछडा लेना चाहा l लेकीन वह मुसलमान टस से मस न हुवा l और उसने गुरुजी के सामने उस बछडे को आजीवन पालनेकी कसम ली l वह वही मुसलमान और वह बछडा वहा पे मरी हुई वही गाय थी l उसने अपनी कसम निभाई l बडे संत महंतो ने कहा हैं l की जो सच्चे मार्ग पर चलते हुवे अपनी सच्ची नियत के अनुसार आचरण करता है l वह संसारी होकर भी सत्वगुणी है l इसलीए मैने अपने कमंडलू का पवित्र गंगाजल उनपर चढाया l और प्रणाम किया l और उनके प्रती आदर जुटाया l”

ऐसे बातचीत करते हुवें वह अपने मार्ग पर चले गये l उधर सलीमने लोगो को बुलाकर अबू के जनाजे की तयारी की l और खेत के एक किनारे गाय और अबू को मिठी दे दी l इस तरह गाय के प्रती अपनी कृतज्ञता दिखाते हुवे अबू हमेशा के लिये अपना कर्म करके काल के पर्दे के पीछे हमेशा के लिये चला गया l

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