९) जीवन के दो छोर नर और नारी
दक्षिण भारत की जमीन प्राकृतिक सुंदरता से भरी है l वहा के दंडक अरण्य मे तरह तरह के पेड पाये जाते है l पुराणे काल से वहा पर आदिम जीवन बहरतख आ रहा है l वाहा पर सदियो से बहने वाली नदिया और उनके नाली ने राखाडी पहाडीयों को हरे रंग से सजाकर जीवन निर्माण किया है l बरसात के दिनो मे उपजने वाले फसल से मिलनेवाला अनाज तथा अलग अलग ऋतू मे पाये जाणे वाले फल खाकर यहा के लोगो ने जीवन का अस्तित्व अबाधित रखा है l पुराणे काल से यह पर आदिम लोग रहते आये है l जो यहा के प्राकृतिक देवतावो को पुजते आये है l कृष्ण रंग के होते हुवे भी इनके अन्दर एक अलग खुबसुरत दिखती है l उनके रहणे, के तरिको ने एक अलग ही अपनी पहचान बनाई है l ऐसी एक आदिम बस्ती का पाडा (गाव) था l उसका नाम लिंबोली पाडा था l उस पाडे का कामकाज देखने के लिये एक मूखिया चूना गया था l उसकी शादी पडोस वाले पाडे की एक लडकी से हुई थी l शादी के बाद उसको पांच बेटिया हो गई l इस कारण मुखिया बहुत ही उदास था l उसे अपने गद्दी के लिये वारीस चाहिए था l लेकीन हर बार लडकी के पैदा होणे के कारण वह उदास रहाता था l कूछ दिन बित गये l उसकी बिबी फिर गर्भ से रही l इस बार उसने धमकी दे दी l की अगली बार तुम्हे लडकी हो गई l तो याद रखणा तुम्हे और उसे जमीन मे गाड दुंगा l अपने पती के तेवर् देखकर वह डर गई l और सात मास बितने के बाद उसने अपने मां को बुलावा भेजा l उसकी अम्मा बहुत ही अच्छी सुईन थी l गावं की कोई भी औरत बच्चा देणे की कगार पर जब होती तो गावं के लोग उसे बुलाव भेजते l वह एक वैद्य के जैसा काम करती थी l आज तो उसकी बेटी ने बुलाया तो वह निंबोली आ गई l अपनी मां को देखकर मुखिया की बिबी को संतोष हुवा l अपने पती ने दी हुई धमकी के बारे मे अपने मां से कहा l तब उसकी मां बोली, “ लडका हो या लडकी वो तो भगवान के हाथ में है l वह चाहें वैसे प्रकृती नहीं चलेगी l हम प्रकृती के जीवनचक्र को नहीं रोक सकते l
मुखीया गाव तथा आस पडोस के पाडे की समस्याये छुडाने के लिये इधर उधर जाता था l इस कारण घर की तरफ उसका ध्यान नहीं था l जब उसकी बिबी के दिन भरने लगे l वह चिंता से ग्रस्त हुई l
उसकी मां बाईसा ने जब उसका पेट जाचा उसके अनुभव से वह समज गई की उसके पेट मे लडकी है l तब उसने अपने गावं को एक वहा के नोकर भेजा और अपने दो दासो को बुलाया l अगले ही दिन वह हाजीर हुवा l उन्हे गावं के बाहर ले जाकर बहुत समय तक वार्तालाप की और उन्हे गावं के पडोस के जंगल मे पडाव डालने को कहा l उसके कहने पर उन्होंने जंगल मे एक पेड पर मचान बनाया और वे लोग वाहा पर ठेहर गये l उनके खर्च के लिये उसने कूछ शिक्के भी दे दिये l
समय अपने कालचक्र के मुताबिक चल रहा था l नौ मास पुरा होणे के बाद एक दिन रात को मुखीया की बिवी को प्रसव वेदना सुरू हो गई l उसकी अम्मा बाईसाने अपने विश्वासार्ह दासी को ही वहा पर रखा था l रात के अंधेरे मे मुखीया की बीवीने एक सुंदर लडकी को जन्म दिया l बच्चे के जन्म देने के बाद थोडी देर के लिये मुखिया की बिली बेशुध्द हो गई l उस बच्चे को दासी के हातोमे देकर घर के पीछवाडे रस्ते से जंगल को भेज दिया l जाते समय उसको शिल युक्त आवाज करने वाला भोपू दिया l रात के अंधेरे मे उस नन्हे बच्ची को लेकरं वह चांद के प्रकाश के सहारे जंगल के पास चली गई l और भोपु से इशारा दिया l जंगल मे मचाण पर ठेहरे उन दासो ने आवाज पहचानी और वह उसके पास आ गये l तो उस दासी ने उनके पास मास के गोले की मांग की तो रात के समय झरने के पास प्यास बुझाने आये हुवे एक प्राणी का शिकार करके उसका मास निकालकर उस दासी को दे दिया l वह गोला कपडे मे लिपटकर वह रात के अंधेरे मे वापस आई l और अपने मालकीण बाईसा को दे दिया l बाईसाने वह अपने बेटी के पास रखाl थोडी देर नाटक करके फिर अन्य दासियो को बुलाया l और मास का गोला पैदा हुवा हैं l उसे घर में रखणा अशुभ है l उसे जल्द ही नष्ट करना चाहिए l इसकी जाणकारी मुखीया को दे दी l मुखीया ने उसे गावं के बाहर दफन करने को कहा l और इस प्रकरण पर पडदा पड गया l थोडे दिन रहकर अपना बेटी को समजा बुझाकर वो अपने गावं चली गई l
इधर उस बच्ची को लेकरं वे दास दुसरी सुरक्षित जगह चले गये l उन्होंने इधर उधर का दूध पिलाकर उस बच्चे को संभाल रहे थे l बाईसाने एक अपना निजी संदेश वाहक भेजा l और उन्हे उस लडकी को कही और देश ले जाणे के लिये कहा l उसको संभालणे के बदले उन दोनो दासो को दास्यत्व से मुक्त कर दिया l और उन्हे कूछ सुवर्ण शिक्के दे दिये l उस बच्ची को सांभालणे की जबाबदारी अब उन दोनो के ऊपर आ गई l वे दोनो अब खुश थे l कारण उस छोटीशी लडकी के कारण उनकी दास्यत्व से मुक्ति हो गई थी l उस बच्ची को लेकरं वे लोग पश्चिम पहाडी के पार वाले अपने देश निकल गये l आधे रस्ते मे जाणे के बाद उन दोनो ने चर्चा की के इस बच्ची को कोण संभालेगा? जो बच्ची को संभालेगा उसे जादा शिक्के मिलेंगे l तब उन दोनो मे से एक विवाहिता था l जिसका नाम अंगत था l उसने उस बच्ची को सांभालणे की जिम्मेदारी ली l इस के बदले दुसरे ने सिर्फ दो शिकके लेकरं बाकी के अंगत को दे दिये l ताकी उस लडकी का भरण पोषण अच्छि तरह से हो सके l उसके बाद वे दोनो अंगत के पाडे पर एकसाथ चले गये l उस बच्ची और अंगत को कुशलता पूर्ण उन्हे उसके पाडे पर छोडने के बाद वह अपने गावं उत्तर दिशा की तरफ चला गया l
बहुत साल बाद अपने पती के घर आणे के कारण अंगत की बिबी खुश थी l लढाई के दौरान अंगत को शत्रू के सैनिक पकडकर ले गये थे l उसकी याद मे सिसककर उसकी बिबी कांचना दिन धकेल रही थी l राज्य के दुर्गम इलाके मे रहणे के कारण उनकी बस्ती सुरक्षित थी l पती के आने के कारण उसके अधुरे जीवन मे खुशाली आई थी l अंगत ने उसे उस बच्ची के बारे मे सब कुछ बताया l कांचना ने अपने बच्चे की तरह उस बच्ची को सांभालणे की जिम्मेदारी ली l उनका संसार सुरु हो गया l
कालचक्र चल रहा था l मुखीया के राज्य पर परचक्र आ गया l राज्य पर आक्रमण होणे पर राज्य के सभी बस्ती , पाडे के युवक युद्ध मे उतर गये l युद्ध मे हार हो गई l जिते हुवे राजा ने राज्य के गावों को तहस नहस करने की आज्ञा दी l उस कारण सभी आदिम बस्तिया जलाई गई l
उसमे कई स्त्री पुरुष को बंदी बनाकर दास बना दिया गया l कई लोगो का कत्ले आम् हुवा l इस सभी आक्रमण में छोटे बच्चे और कूछ लोग जो जंगलं मे चले गये वह बच गये l इस आक्रमण मे मुखीया का पाडा भी नहीं बच सका l बाईसा उसवक्त जंगल मे अपने बेटी के साथ भाग गई l परचक्र चला जाने के बाद बाईसा कूछ दिन जंगल मे गुजारणे के बाद अपने बस्ती पर चली गई l तब उसने वाहा पर देखा की सभी विरान पडा था l फिर वह वाहा से लींबोली गाव अपने बेटी को लेकरं चली गई l वाहा पर सब कूछ विराण पडा था l वहा के बच्चे जो जंगल भाग गये थे l वे लोग जंगल के फल, फूल, पत्ते, पेड की छाले खाकर जीवन गुजार रहे थे l बाईसा और मुखिया की बिबी को देखकर वे उन दोनो के पास आ गये l उन्हे कोई तो अपना आया है l यह देखकर बहुत खुशी हुई l बाईसा ने उन बच्चो और बचे कुछ लोगो को लेकरं वाहा की बस्ती को इधर उधर का जंगली सामान जुटाकर उन लोगो ने फिर से बस्ती को बसाया l सब के रेहणे के लिये तो सुविधा बन गई l लेकीन अब बाईसा के सामने बहुत ही गेहरा प्रश्न निर्माण हुवा l क्यो की बस्ती मे सिर्फ लडके ही बच् गये थे l एक भी लडकी नहीं थी l उसके बेटी के पती याने गावं के मुखीया के धोरणों से वहा पर लडकिया होणा एक पाप माना जाता था l इस कारण उस पाडे पर लडकीया कम थी l और वो भी परचक्र मे पकड कर ले गये थे l यहा पर सभी लडके, अब वंश कैसे बढाया जाय l यह यक्ष प्रश्न उसके सामने निर्माण हुवा था l उसने इधर उधर के पाडे पर जाकर देखा वाहा पर भी यही प्रश्न था l वाहा पर जो बची हुई लडकिया थी l वह उसी पाडे पर ही ब्याही जाती थी l मुखीया के पाडे के कूछ युवक यौवन के कगार पर आये थे l उनका ब्याह होना जरुरी था l तब बाईसा सोचने लगी l उसके ध्यान मे मुखीया के बेटी के बारे मे आया l उसने अपने दो दासो के हवाले किया था l वह याद मे आया l उसने उस लडकी को वापस पाडे पर लाने के बारे मे सोचा l अब उन दासो को धुंडणा जरूरी था l अब वे कहा गये होंगे l उसके बारे मे वह सोचने लगी l और गावं के नवयुवकों को लेकरं वह उन दासों को धुंडने पश्चीम दिशा की ओर चली गई l मजल दरमजल करते वह सौमित्र दास के पाडे पर चले गये l उससे बातचीत करके उसने पूरी समस्या बता दीl
तब सौमित्र दास ने कहा, की हमारे ईलाके मे लडकीया है l लेकीन वह इधर ही ब्याही जाती है l और इधर के लोग दुजे राज्य लडकीया ब्याह के नहीं देती l तब बाईसा ने उन्हे सोपी हुई लडकी के बारे मे कहा l तब सौमित्र बोला, की वह लडकी तो अंगत के पास है l तब उसके बारे मे थोडी बातचीत की l सौमित्र ने थोडे दिन ठेहरणे के लिये कहा, तब वह भी चलकर थक चुकी थी l दो दिन का सौमित्र का अतिथ्य उसने स्वीकार किया l और दो दिन बाद वह अंगत की बस्ती की तरफ निकल पडी l पहाडी दर्रो के रास्ते वह चलते हुवे वह लोग अंगत के गावं आ पहुंची l हरी भरी जंगली पहाडीयों के बीच अंगत का पाडा बसा हूवा था l गावं के एक छोर पर अंगत का घर था l बाईसा के साथ सौमित्र को और उनके साथ आये उन पांच -छे लडकों को देखकर अंगत को अचरज हुवा l उन चार लडकों को साथ आये देखकर अंगत के मन मे बाईसा ने दी हुई लडकी के बारे मे खयाल आया l उसने उनका उचित आतिथ्य किया l थोडी देर बाद बाईसा ने उस लडकी के बारे मे पूछताज की l तो अंगत ने वह पानी भरणे झरणे पर गई है l ऐसा कहा l थोडी देर बाद सभी हकीकत बाईसाने केह डाली l उसकी बात सुनकर अंगत बोला l “बाईसा मालकीण आपका सुझाव मुझे गलत लगता है l आपने जब हमारे हात इस लडकी को सोपा था l और हमारी दास्यत्व से मुक्तता की थी l तबसे हम मुक्त है l आप के कहे अनुसार इतने लडकों के बीच एक अकेली लडकी को भेजना हमे गवारा लगता है l जब आप के पाडे का मुखीया लडकी के पैदा होने
को विरोध जताता था l तब आप के पाडे के लोग चूप चाप बैठे रहे l उन्होंने विरोध नहीं जताया l प्रकृती के खिलाप जो जायेंगे उसे यही सजा मिलेगी l अब आपके अगले वंश का प्रश्न आया, तो इस लडकी की याद आई l चले जाईये हम हमारी बेटी किसी भेडियो के हवाले नहीं सोपेंगे l जो भी रुखासुका खाकर हम अपना जीवन बसर करेंगे l”
अंगत की बाते सुनकर बाईसा को धक्का लगा l वह बोली, “ लडकी हमारी है l उसकी परवरिश का सब खर्चा मैने दिया था l इतना ही नहीं उसके बदले मैने आप दोनो को दास्यत्व से मुक्त किया है l और हक्क जताने के लिये, नाही तुम उसके पिता हो l”
उनकी बेहस चल रही थी l के इतने मे अंगत ने पाली हुई बेटी अरुंधती वाहा पर आ गईl उसने उन लोगो को पहली बार ही अपने घर में देखा था l वह अब घर के पीछे वाले रसोई घर में जाकर अपनी माता कांचन के पास बैठ गई l थोडी देर बातचीत करके अंगत के हातो मे कूछ शिक्के रख दिये l और लडकी को सोपने की बात की l तब उसने उसको संभालने की जादा किंमत मांगी l तब बाईसाने अपने गले का बचा हुवा आभूषण देकर मामला निपटा दिया l इतनी देर अपनी बेटी कहने वाला कूछ सिक्को के बदले तथा अलंकार के बदले अपने बेटी को सोपने के लिये तयार हो गया l उनकी बाते अरुंधती अंदर बैठकर सून रही थी l उनकी बाते सुनकर उसने जान लिया की उसका पालने वाला पिता उसका सौदा कर रहा है l वो भी उससे जीसने उसे इन के हाथ सोप दिया था l अंगत ने कभी भी उसके पालन पोषण का खर्चा नही किया था l वह गावं के लोगो के मदत से पली बडी थी l अंगत ने उसे मिले हुवे पैसो का इस्तेमाल अपने शौक पुरे करणे के लिये ही किया था l कांचन ने ही उसकी देखभाल की थी l जब भी अंगत दारु पीकर आता, तब उसे दास्यत्व मे हुये अत्याचार याद आते l तो वो उसका रोष उसपर निकालता था l उसके मार से बचने के लिये वह जंगल तथा अपनी सहेलियो के पास भागती थी l अब वह यौवन के कगार पर आई l तो उसके सामने यह समस्या आ गई l अब वह झट से उठी, और जंगल की तरफ भाग गई l तब बाईसाने उसे पकडणे हेतू अपने साथ आये लडको को भेजा l तब वह भागती पहाडी के झरने के जलप्रपात के पास पहुंची l वह कुदने वाली ही थी l तभी पीछे से आवाज आई l “ रुको सुनो तो l”
उसने पीछे मुडकर देखा l इतने मे उसके पीछे आया नव युवक बोला, “क्यो प्रकृती के दिये हूवे इस सुंदर जीवन को नष्ट कर रही हो?”
तब अरुंधती बोली, “ क्या करे जिंदा रहकर, जन्म देते ही मां – बाप ने छोडा l यहा पर दुःख भरी जिंदगी जी l और अब यौवन मे आप के हातो पिसने से अच्छा है l की अपना जीवन खत्म कर दूं l”
तब दुसरा युवक बोला, “ तुम्हे प्रकृती ने अनेक समस्याओ से बचाया , ताकी तुम पुरी मानव जाती को एक शीख दे सको, की नारी का सन्मान करना चाहिए l हमारा वंश चलाने के लिये सही हम तुम्हारे सामने भिक्षा मांगते है l”
तब वह बोली, “ यह समस्या तुम लोगो ने पैदा की है l तुम इक्कीस जनो से शादी करके मै अपना जीवन नर्क नहीं बनाना चाहती l इससे तो अच्छा है की इस झरने के जलप्रपात से कुदकर यह जीवन भगवान को समर्पित कर दूl”
तब वे युवक उसके सामने घुटनो पर बैठकर उससे आपने आदिम जीवन श्रृंखलि की भीक मागने लगे l तब उसने उनस अपने प्राकृतिक देवता की शपथ लेकर उनसे अपने मुताबिक इच्छा अनुसार वर चयन करने का हक्क मांगा l तब उन लोगो ने वो मान्य कर लिया l और समजा बुझाकर वे लोग उसे वापिस लेकरं आये l और बाईसा को लेकरं अपने राज्य की ओर चल पडे l जाते वक्त अरुंधती अंगत के पास जाकर बोली के तेरे जेसा बाप किसी को न मिलेl और वह उन यूवको के साथ चली गई l
उसके जाणे के कूछ महीनो बाद सागर की तरफ से दुसरे द्वीप समुह के लोगो ने हमला कर दिया l वहापर लुटमार मचाई l जो लोग जंगल मे भाग गये l वह सिर्फ बच गये l अंगत मदिरा पिकर धूत पडा था l इस कारण वे लोग उसे पकडकर ले गये l कांचन जंगल मे भाग जाने से बच गई l
इधर लिंबोली आने पर बाईसाने पाडे के लडकों को इकठ्ठा किया l और उनसे वह सौदे बाजी पर उतर आई l वह उन लोगो से बोली की जो उसे बहुत सारा अरुंधती के वजन जितना सोना लाकर देगा उससे ही अरुंधती की शादी होगी l अरुंधती को देखकर वे सभी चल बिचल हो गये l तभी वह पांच लडकोने खडे होकर उन्होंने बाईसा को पकडकर एक पेड से बांध दिया l और व आगे आ गये l उनमे से एक बोला, “ कोई सौदा नहीं होगा l ये लडकी चाहें उससे विवाह करेगी l उसपर जबरदस्ती नहीं होगी l और जो भी करेगा l उस को मृत्युदंड दिया जायेगा l हम पर यह मुसिबत इस बाईसा और उसके दामाद याने हमारे भूतपूर्व मुखिया के कारण आ गई है l आज के बाद यह लडकी जो कहेगी वही होगा l
तभी अरुंधती आगे आई और बोली, की वह कोई पशू नहीं है l जो भी आये और उसकी दुर्बलता का फायदा ले l आज मै इस पाडे के उन पाच नव युवको का चयन करती हुं l और उनसे गांधर्व विवाह करती हुं l और बाकी के अपने लिये दुसरी पत्नी धुंड ले l उसके कहे अनुसार उन पाच लडकोने उससे गांधर्व विवाह किया l और हर एक वर्ष के लिये उनमे से एक उसका पती होगा l और उस दौरान दुसरा उसके साथ रिस्ता नहीं रख सकता l येसा करार उन लोगो ने किया l उनकी योजना पाडे के सभी युवकोने मान ली l और वे अपने आप के लिये जीवनसंगीनी धूंडने के लिये निकल पडे l कुछ लोगो ने अपने आस पास के पाडो से तथा अन्य जगह से लडकीया खरिदकर, कुछ भगाकर अपने के लिये पत्नी लाये l
उस दिन बाईसाने जान लिया की प्रकृती के जीवनचक्र के विरुद्ध अपने मुताबिक कुछ नहीं होता l उस दिन से बाईसा अरुंधती के पास उसकी दादी के बजाय उसकी दासी बनकर रहणे लगी l अरुंधतीने उसके साथ विवाह किये उन लडकों को तीन तीन बच्चे दिये l तब से उस पाडे पर नारी जाती का सन्मान होणे लगा l और उस पाडे पर मातृसत्ताक कुटुंब प्रणाली अस्तित्व मे आ गई l कुछ ही सालो मे वाहा पर आदिम जीवन फुलणे लगा l और पाडे का जीवनचक्र प्रकृती के अनुसार चलने लगा l







