Sunday, April 28, 2024

७)पानी

 ७)पानी

लेखक: निशिकांत हारुगले.


पानी


महाराष्ट्र राज्य में पश्चीम घाट में अनेक गाव बसे हुवे है l यहा पर हरे भरे वादियों मे इतिहास की गाथा सुनाने वाले किल्ले पाये जाते हैl यहा पर पहाडी किल्ले के अआस पास बहुत सारे छोटे छोटे गावं पाये जाते है l महाराष्ट्र के दक्षिण मे स्थित एक जिल्हे मे एक किल्ला है l उसके आस पास छोटे छोटे से गावं बसे हुवे है l उन मे तीन गाव है l एक वनगाव, सोनगाव और तिसरा कडेगांव l वनगाव जो था वह किल्ले के नीचे बसा हुवा था l उसके नीच थोडी दूर पूरब की तरफ कडेगाव था l तो दुसरी तरफ पश्चिम की तरफ नीचे सोनगाव था l वनगाव के नीचे से एक नाला निकलकर सोनगाव और कडेगाव के बीच से होकर नदी की तरफ जाता था l बरसात के दिनो मे यह नाला इतना उफान पर होता की एक नदी के माफीक भाता l

 लेकिन शिशिर तथा वसंत ऋतू तक वह पुरी तरह सुख जाता l और यहा के गाव में पानी की दिक्कत हो जाती l यहा के लोगो को काम जो मिलता जो भी बरसात के चार महिने मे, वह भी खेत से, उसके बाद यहा के लोग नजदीक वाले शहर, या पूना, मुंबई को जाते l जो भी काम मिले वह करते l और अपना गुजारा करते l और गावं मे रहते सिर्फ बुढे बुजुर्ग तथा स्कूल मे पढने वाले बच्चे और औरतें l शिशीर ऋतू के दौरान गाव के देवता की यात्रा आ जाती l और शहर गये रोजी रोटी कमाने के लिये लोग गावं की तरफ आते l

हर साल की तरह इस साल भी वनगाव की यात्रा थी l शहर गये जवान लडके गावं की तरफ आने लगे थे l जब यात्रा का दिन आया, गाव मे पानी की किल्लत होणे लगी थी l गाव के लोग यात्रा के दिन ही पानी के लिये इधर उधर भटकणे लगे l यात्रा के दिन आये बाहर से मेहमान यह सब देखकर छि थू करने लगे l एक मेहमान ने जवान लडको के सामने दो बाते सुनाई की कैसे लोग है यहाँ के l यहा पर पानी की किल्लत है l कैसे इस गावं मे लडकी ब्याह के देगा कौन? यह बाते जवान लडको को बहुत ही चुभ गई l यात्रा के दुसरे ही दिन गाव की पंचायत की सभा बुलाई गई l गाव के सरपंच को उन्होंने भली बुरी सुनाई l इस समस्या के बारे मे गाव सभा मे बहुत ही कही - सूनी हुई l सभा में सरपंच की बॉडी मे नियुक्त हुवा एक माधव नाई था l उसका नाम माधव नाई था l अपना पुरखों से चला आया हजामत का काम वह करता था l वह सभा मे उठ खडा हुवा l

“ क्यो की जो न जाणे कोई वह जाणे नाई l” ऐसी कहावत है l माधव नाई हजामत के कारण इधर उधर के गावं जाता था l उसका आना जना सोनगाव से लेकरं कडेगांव तक था l इस कारण बहुत से लोगो मे उसकी जान पेहचान होती थी l उसने उनके गावं के झरणे का पानी सोनगाव तथा कडेगांव के लोगो ने किस तरह चुराया वह सब कहाणी उसने बताई इतना ही नहीं उसका हल भी बताय l

उसने पहले सोनगाव के लोगो ने पानी कैसे चुराया वह बताया, उसने कहा “सोनगाव का एक शिक्षक किल्ले के नीचे वाले पहाडी पर बसे हुवे शिवपेठ नामक गावं मे पढाने के लिये जाता था l उसकी वहा पर सरकार ने नियुक्ती की थी l वह अपने गावं के पश्चिम छोर वाले रस्ते से जाता था l सोनगाव मे पानी की समस्या दूर करने के लिये उसने हमारे गावं की पश्चिमी छोर के झरणे का पानी पाईप डालकर ले जाणे का सुजाव दिया l सोनगाव के लोग जब नल डालने आये l तो उस पानी से खेती करने वाले गाववालोने उन्हे रोका l तब यह मामला सरकारी न्यायालय जा पहुंचा l तब यह मामला सुलजाने के हेतू तहसीलदार सोनगाव की तरफ से आया l तब तहसील दार ने कहा की झरणे के पास छोटा तालाब बनाया जाय l जिसमे से मिलने वाले पानी का एक हिस्सा सोनगाव को दिया जाय l और तीन हिस्सा पानी वनगाव के खेत वाले किसानों को दिया जाय l तब कूछ वनगाव के अडेलतट्टू किसनो ने अपने मुछोपर ताव मारते हुवे तहसील दार को कहा की पानी हमारे गाव की हद्द मे है l एक हिस्सा क्या मूछ का बाल उगाने जितना भी ना दे हम l तब सरकारी कोर्ट ने खेत से बढकर प्यास को महत्त्व देते हुवे सोनगाव को तीन हिस्सा पानी देने को कहा l और एक हिस्सा पानी खेत के लिये छोडने को कहा l लेकीन सोनगाव के चलाख लोगो ने नल डालते वक्त गेहरा खड्डा खुदवा दिया l ताकी किसान पानी न ले पाये l और उनका गावं नीचे होने के कारण उन्हे आसानी से पानी जा सका l

पानी


अब भी हमे पानी मिल सकता है l लेकीन वह पूरब की हद्द से , हमारे गाव से पुरब की तरफ एक नाला है उसके ऊपर एक झरणा है l उसका पानी कडेगांव के लोग सिमेंट का पाईप डालकर ले गये है l वहा पर पाईप भर के जाकर भी थोडासा पानी बेहता रहता है l वही सही हम पानी पा सकते है l लेकीन कडेगाव के लोगो से टकरायेगा कोण?”

तब सरपंच जी बोले, “ पहले हम गाव का नक्षा देखेंगे l की वह पानी किस गाव की हद्द मे है l कल फिर से सभा भरेगी l” ऐसा कहकर सभा बरखास्त हो गई l दुसरे दिन श्याम को फिर से सभा का आयोजन किया गया l

दुसरे दिन सरपंच और दो होशियार पढे लिखे गाववाले तहसील कार्यालय गये l वहा जाकर उन्होंने गाव का नक्षा देखा l नक्षे की प्रत मिल गई l तो उन्होंने गाव के ईलाके की जाणकारी इकठ्ठा कर ली l और गावं की सभा मे सब खुलासा किया l दोनो पानी के प्रवाह गाव के इलाकें मे थे l तो उस पानी पर गावं का हक था l भिड मे से एक लडका उठा l और बोला , “ हमारे गावं का पानी है l हमे चूप नहीं बैठणा है l गाव मे पानी लाकर ही रहेंगे l”

तब मधू नाई बोला, “ चूप कर लडके, गरम जोशीले खून का उबाल मत दिखा l पहला पानी गावं के नादान किसानो की वजह से सोनगाव को देना पडा l अब अकल से दिमाग थंडा करके काम चलाना है l जो की साप भी मरे और लाटी भी ना तुटे l”

फिर माधव नाई बोला, “ अब मै केहता हु l उस तरह तिन अर्जिया लिखी l एक सोनगाव के सरपंच को, दुजी कडेगांव के सरपंच को और तिसरी तहसील को l”

माधव नाई के कहे अनुसार अर्जीया लीखी गई l अर्जी मे लीखा गया था l की वनगाव मे पानी की किल्लत सुरु हो गई है l और पुरब तथा पश्चिम के झरने से हमे पानी दिया जाय l आर्जी पहुंच गई l अर्जी देणे वाले ने सोनगाव और कडेगांव के सरपंच को कहा की कल आप लोग वनगाव आकर इस समस्या का निवारण किजीये गा l अगर नहीं आये तो इसका अंजाम बुरा होगा l

पानी


दुसरे ही दिन दोन सरपंच वनगाव आ गये l काफी देर तक यह चर्चा चलती रही l दोनो ने हात खडे कर दिये l और पानी देणे के लिये एक दुसरे को कहने लगे l असल में समस्या यह थी की उनके गाव वालो ने उन को धमकी दी थी l की अगर पानी के बारे में हमें नुकसान हुवा l तो अगले चूनाव मे तुम्हे दिखा देंगे l इस कारण वह एक दुसरे से अपने स्कीम से पानी देने को कह रहे थे l वनगावं के लोग एक घंटे से यह तमाशा देख रहे थे l वनगाव के सरपंच ने कहा की ये चुहे बिल्ली का खेल बंद कर दो l पानी हमारा है l हम चाहें तो दोनो गाव का पानी बंद कर सकते है l हम सिर्फ पांच दिन की सहुलियत देते है l अगर पाच दिन मे यह निपटारा न हुवा तो तुम्हारे गाव की प्यास् कैसे बुझाते हो वो हम देखेंग l

नाही तुम लोगो को छटी का दूध याद दिलाया तो हम भी वनगाव के नहीं l तुकोबाजी का अभंग हमे भी याद है l चाहें दान मे पुरे कपडे भी देंगे l लेकीन बुरे लोगो पर हमारे दंडे बरसेंगे l अब चले जाव यहा से सिर्फ पाच दिन है तुम्हारे पास l” ऐसा कहने पर वे लोग चूप होकर चले गये l तिनो गाव मे एक ही चर्चा थी l की पानी का बटवारा कैसे होगा?

देखते ही देखते पाच दिन हो गये l छटे दिन एक गाववाले को कडेगांव और सोनगाव को भेजा गया l वह हात हिलाते आया l उसने कहा की दोनो गावं वाले मान नही रहे है l तब वन गावं का सरपंच आग बबुल हो गया l उसने अपने गाव की सरपंच बॉडी तथा गावं के जिम्मेदार लोगो से सलाह मशवरा किया l गाव के पंद्रह सोलह नौजवान इकट्ठा कीये l उन्हे रात को चावडी में बुलाया l दो गुट बना दिये गये l एक पुरब की तरफ तो दुसरा पश्चिम की तरफ भेज दिया l उनके हात मे कुदल ,फावडा , हातोडा ये अवजार दिये l वे गुट दो तरफ चले गये l पूरब की नाले की तरफ कडेगाव की सिमेंट की पाईप थी l उस गुट ने दो दनको मे ही उसका काम तमाम किया l और सभी पानी की लाईन उखाड फेकी l पानी के फवारे उडने लगे l पानी झरणें से बहकर नाले की तरफ जाणे लगा l

इधर पश्चीम दिशा की तरफ गया हुवा गुट पानी के नल के पास पहुंचा l उन्होंने पाईप तोडने की कोशिश सुरू की लेकीन वह बीड के धातू का बना था l कितने घाव डाले पर तुटणे का नाम हि नहीं ले रहा था l लडके तोडणे के लिये हिचकिचाने लगे l तब उनके साथ गया हुवा माधव नाई बोला, “ अरे कैसे मरगठ्ठे के लडके हो l देखो ए हमारी गावं की इज्जत का सवाल है l अगर ए नल नहीं तुटा तो हमारे गावं के लोग और गाय भैस् पानी पानी करके मरेंगे l देख क्या रहे हो ये लो गणू लुहार का हातोडा और तोड दो ये नल,”

बहुत प्रयास से भी वह नल टस से मस नहीं हो रहा था l तब माधव नाई बोला, “ अगर ये नल जो तोडेगा उसकी एक मास की हजामत मै बिना रुपये लिये करूंगा l और न तोडा तो एक एक की आधी मूछ मुंडवाके रहुंगा l ”

तब उन मे से एक युवक आगे आया l दिखने मे दुबला पतला लग रहा था l उसने हातोडा लिया l और नल के पास गया l और नल पर हातोडा चलाने लगा l

उस हतोडे की आवाज से आस पास का माहोल कंपित हो रहा था l रात के अंधेरे मे उन युवको को भारी जोश आया था l उन्होंने बारी बारी जाकर उस नल पर घाव डाले l देखते ही देखते नल तूट गया l पानी झरणे मे जाने लगा l उसके बाद वे लोग गाव आ गये l नल तुटणे के कारण उन दोनो गावों का जलपुरवठा खंडित हुवा l जब देखने गये तो नल तुटे पाये l दोनो गावों ने वनगाव के लोगो के खिलाफ शिकायत दर्ज की l दुसरे दिन देखने के लिये पुलिस आने वाले थे l तब वनावनात के लोगो को जब यह खबर मिली तो सरपंच बोले, “पुलिस लेकरं आणेवाले है क्या? अब देखते है क्या करती है पुलिस?, कोई आदमी नही जायेगा उधर सभी औरतो को बाहर निकालो l आज चुला बंद पानी की लढाई होगी l गाव की महिला को चावडी पर इकट्ठा किया गया l उनके दो गुट बना दिये गये l और दोनो तरफ भेजां l उनमे कूछ झगडालू थी l पुलिस और उन गाव के लोगो के आने से पहले वनगाव की औरते नल के पास जाकर बैठ गई l जब पुलिस को लेकरं कडेगांव के लोग आये l तब औरतों को देखकर वे लोग आगे आने से कचरणे लगे l तब कडेगांव का एक आदमी बोला, “ अरे, वो वनगाव की चुडेलो तुम्हारे आदमी चूहे के माफीक घर में दुबक कर बैठे हुवे है क्या? जो तुम आई हो पानी चूराने l”

तब वन गावं की सरपंच की बिवी बोली, “ अरे, वो मेंढक किसे पानी चोर केह रहा है l चांद, सूरज और धरती मां जाणे पानी किसका है l हमारी गावं की सरहद मे है, यह पानी, चुराके ले गये तुम और हमे चोर केहते हो l ये तो उलटा चोर कोतवाल को डाटे l”

दुसरा आदमी बोला, “ तोहरी जबान तो कैची की तरह चलती है l काट के फेक देंगे l चूप चाप यहा से चली जावो l वरना पत्थर मारके भगा देंगे l

तब वनगाव की सभी औरते बोली देखते है l कोण भगाता है किसे l उन मे से एक बोली, “चौथी कक्षा मे हमने भी पढाई की है l की मावलो ने किस तरह पावनखिंड लढी थी l और हम तो पहाडी शेरनी है l चलो उठवो पत्थर धावा बोल दो l”

उन्होंने जोर से पथ्थर फेकणे सुरु किये l जैसे पथ्थर लगणे लगे l कडेगांव के लोग और वे पुलिस इधर उधर भागणे लगे l चढण उतरण के रास्ते भागते हुवे वो हाफने लगे l उनकी सास फुलणे लगी l उनकी हालत देखकर वनगाव की औरते हसणे लगी l तब एक पुलिस दुसरे से बोला, “ अबे खा बिर्याणी , वडा पाव, देख कैसी हालत हुई हमारी”

दुसरा पुलिस वाला, “ छोडुंगा नहीं इनको, ठाणेन में बंद कर दूंगा l”

पहला पुलिसवाला, “ किस किस को ठाणे मे बंद करवायेगा l पुरे गावं की औरते थी l और हमे सिर्फ देखने का नाटक करना था l असल में यह पानी वनगावं का ही है l"

दुसरा पुलिसवाला, “ अरे, वो ठीक है l लेकीन पुलिस पर हात उठाना जुरुम है l कायदा कानुन कूछ है क्या नहीं l”

पहला पुलिस वाला, “ कैसा कायदा कानुन पहले तो हमने ही गलत किया है l इन कडेगाव और सोनगाव की बातों मे आकर l इनकी शिकायत न सुनकर दी हुई बिर्याणी खाकर आग ये रोक झाडणे, तो क्या दुसरे चूप बेठेंगे l देख में तो कोई शिकायत न करूंगा l और तुम भी मत करना l वरना l”

दुसरा पुलिस वाला, “ वरना क्या होगा l”

 पहला पुलिस वाला, “ मेरा घर में हुक्का पानी बंद होगा l क्यो की मेरी बिबी वनगाव की है l उसने मुझे धमकी दि है l की अगर वनगाव वालो के साथ कूछ गलत सलत किया तो घर मे आना बंद करवा देगी l”

 दुसरा पुलिस वाला बोला, “ अरे, बापरे यह बात है l इसलीय तुम इधर आने से मना कर रहे थे l चलो तो फिर सुलाह करते है l”

 दोनो ठाणे चले गयेl जाकर सब बाते ठाणेदार से की, तब ठाणेदार उलटा गुस्सा होकर एक पुलिस की तुकडी लेकरं वनगावं चला गया l लेकीन तब पुरा गावं पुलिस के साथ लढणे झगडणे के लिये तयार था l तंग वातावरण देखकार ठाणेदार ने शांती से पुरा जायजा लिया l और शांती से बातचीत करने हेतू पूरी घटना जाकर तहसीलदार को दे दी l

दुसरे दिन तहसीलदार ने तीनो गावं की सरपंच तथा अन्य सदस्य को बातचीत करने के लिये बुलाया l कडेगांव तथा सोनगाव के सरपंच पानी देने को राजी हुवे l तब तहसीलदार बोले की वन गाव को थोडा पानी देना चाहिए l वे चाहें तो छोटासा नल डालकर भी ले जा सकते है l तब वनगाव का सरपंच बोला की साहेब आप भी बिर्याणी खाकर बोल रहे है क्या? पानी का बटवारा हम करेंगे l हमारा पानी है l आप कोण होते है l इस झरनों के मालिक l

तब उसने कहा की सोनगाव की तरफ के पानी के तीन हिस्से होंगे l पहला वनगावं दुसरा सोनगाव और तिसरा जंगली जानवरो के लिये l और उसी तरह कडेगांव की तरफ के पानी का भी होगा l उसके लिये वहा पर एक छोटीशी टंकी बनाकर यह बटवारा होगा l कल से हम नल खुदाई का काम चालु करेंगे l

पानी


दुसरे दिन से ही गाववालो को लेकर वनगावं के लोग काम करणे लगे l कूछ दिनो में उन्होंने नल का काम पुरा किया l और गावं मे पानी आया l तहसीलदार ने भी इस योजना को मान्यता दे दी l और इस तरह पानी का बटवारा हो गया l और इस प्रकरण पर पडदा पड गया l


Thursday, April 18, 2024

६)साहस

 ६) साहस


६)साहस
सौमीत्र


सौमीत्र एक होनहार लडका था l उसके पीताजी एक उद्योजक थे l उनकी शहर के बाजार मे बडी कपडो की दुकान थी l कारोबार मे अच्छा जम बैठने के कारण उनकी आर्थिक स्थिती अच्छी थी l सौमित्र के दादाजी फौज में थे l वह फौजी होणे के कारण उनका ब्याह नहीं जम रहा था l बहुत प्रयास के कारण उस जमाने मे उनकी शादी हुई थी l उसके दादा और दादी जब साथ में खडे रहते l तो ऐसा लगता की नारीयल के पेड के पास छोटा आम् का पेड खडा हो l इस कारण उनके बच्चो में यह अनुवंशिकता दिखती थी l सौमित्र के पिताजी अपने मां के जैसे खुजे हो गये थे l और उसके पिताजी की बहने अपने पिता की तरह लंबी बनी थी l सौमित्र के पिताजीं नाटे होणे के कारण वह फौज मे भरती हो ना सकते थे l इस कारण दादाजी की इच्छा पुरी ना हो सकी l लेकीन दिमाग में तेज होणे के कारण एक अच्छे व्यावसायिक हो गये थे l दादीजी के खुजे होणे के कारण दादीजी की सास् हमेशा ताने मारती थी l लेकीन दादाजी उसवक्त हमेशा दादीजी की तरफदारी करते l क्यो की दादीजी एक अच्छी जीवन संगिनी है l दादाजी बाहर दहाडते शेर की तरह थे l उनकी मुच्छे देखकर आस पास के छोटे बच्चे भी डर जाते l औरते तो सर पर पल्लू का घुंगट ओढ के सामने आती थी l लेकीन दादीजी नाटी होणे के बावजुद उनका आवाज बाळासाहेब ठाकरे के मफिक करार था l उनके आवाज से घर के सभी भयकंपित होते थे l क्यो की वह सक्त मिजाज की थी l सौमित्र की अम्मा और पापा भी उनसे डरती थी l दादी के बिना घर का पत्ता भी नहीं हिलता था l

दादाजी की जो इच्छा जो अपने बेटे से थी l वो जो पूरी ना हो पाई थी l वह अब पोते से पूरी होणे की आशा थी l सौमित्र को अपने जैसा फौजी बनाने की उन्होंने ठाणी थी l वह बचपन से ही उसके पीछे हात धोकर पडे थे l वह हर दिन उसे सवेरे उठते l उससे कसरत करवाते l दौड लगवाते l उसे तैराणे के लिये ले जाते l उन्होंने उसे फटाफट बनाने की ठाणी l सौमित्र को दादाजी पर गुस्सा आता था l उसके आसपास के बच्चे हमेशा देर से उठते l टिव्ही देखते l खेल कुद अपने मन के माफीक करते l लेकीन दादाजी तो उसे फौजी बनाने के लिये कसरत करवाने के पीछे पडे थे l वह सोचता की उसके पिताजी का बंगला है l गाडी है l कारोबार है l लेकीन दादाजी के सीर में क्यो ए फौजी बनवाने की ख्वाईश है l

दादाजी के इस रवये से वह तंग आ गया था l अब वो बडा हो रहा था l और आठवी कक्षा मे भी गया था l स्कूल के लडके उसकी तबीयत देखकर उसे फौजी कहकर चिडाते थे l

सौमित्र के पिताजी ने अब अपना कपडों का व्यवसाय बढाया था l अलग अलग जगह पर उन्होंने अपने दुकान खोले थे l उस कारण उनके तरक्की के चर्चे सभी ओर गुंजने लगे l सौमित्र अब बडा हो रहा था l आठवी कक्षा मे जाणे के कारण वह अब अकेला स्कूल जाणे लगा था l रोज की तरह सौमित्र स्कूल गया था l दोपहर हो गई l लघु छुट्टि हो गई l बच्चे बाहर मेदान में उछल कुद करने के लिये चले गये l सौमित्र भी चला गया l मैदान के एक छोर पर होनेवाले खाद्य पदार्थ के ठेले के पास वह चला गया l उसने वहापर चन रुपयों की शेकी हुई मुंगफलीयां ली l और पास होनेवाले कट्टे पर जाकर बैठ गया l और मुंगफलीयां खाने लगा l इतने में एक इसम वहा पर आया l उसने अपने आँखो पर गॉगल लगाया था l सौमित्र को अकेला पाकर वह नजदीक आया l

वह बोला, “ अरे, सौमित तुम्हारे पिताजी का अक्सीडेंट हो गया है l चलो जलदी तुम्हे बुलाया है l देखो वह कार उनके मित्र ने भेजी है l सौमित्र को यह सुनकर धक्का सा लगा l क्रोध की वह अपने पिताजी से बहुत प्यार करता था l उसके हातों से मुंगफलीया गिर पडी l सौमित्र कूछ सोचे बिना उस आदमी के साथ गाडी में बैठ गया l उस गाडी मे और दो लोग थे l वह सौमित्र को देखकर् मुस्कुराये l गाडी चल पडी l सौमित्र ने उस इसम को पुंछा की उन्हे कहा ले गये है l

वह बोला, “अरे, सौमित्र उन्हे जिल्हा सिटी हॉस्पीटल मे रखा है l”

 सौमित्र अब रोने लगा l गाडी चलती रही l थोडी दैर बाद सौमित्र के ध्यान में आया, की वह गलत रास्ते जा रहे है l क्यो की दादाजी ने उसे सारा शहर घुमाया था l वह भी पैदल चलकर l इस कारण सौमित्र को सब शहर की ठिकाणे याद थी l

सौमित्र बोला, “ अरे भाई तुम गलत रास्ते जा रहे हो l यह रास्ता तो शहर के बाहर जाता है l”

तब उसमें से एक ने पीछे मुडकर करारी नजर से देखा l तो सौमित्र के मन में शंका आ गई l वह बोला, “ यह गलत रास्ता है l मुझे यहापर उतार दो l में अपने आप चला जाऊंगा l”

६)साहस
अपहरण


तब आगे की सिटवाला आदमी पीछे मुडा l और उसने एक रामपुरी सुरा निकाला l उसे देख कर सौमित्र डर गया l तभी उसके पास वाले ने उसके हात पकडे और सौमित्र चिल्लाणे से पहले उसके मुंह मे एक कपडा ठुसा दिया l और उसे नीचे की तरफ ढकेला l और एक रुमाल उसके नाक पर रखी l सौमित्र बेहोश होने लगा l उस मे से एक बोला की यह लडका तो सब रास्ते जानता है l उसे सुला दो l” सौमित्र समज गया l की यह लोग उसका अपहरण कर रहे है l और उसके पिताजी को कूछ नही हुवा है l

इधर स्कूल की घंटी हो गई l और सभी बच्चे अपने अपने कक्षा मे जा चुके थे l सौमित्र को उनके साथ जाते हुवे किसिने भी नहीं देखा था l सब बच्चों को लगा की तासिका चुकाने हेतू वह कही छिपा होगा l इधर गाडी ने तेज रफ्तार पकड ली l वह अब छोटा रोड छोडकर महामार्ग पर आ गई l गाडी के हादरे से और नशा जादा न चढणे के कारण सौमित्र को होश आ गया l लेकीन सर बहुत दर्द कर रहा था l लेकीन उसने चुपचाप से लेटा रहणा ही ठीक समजा l अब उन अपहरण कर्तावों की भाषा बदल चुकी थी l वे अब भोजपुरी में बाते करने लगे l थोडी देर बाद वह गाडी सूनसान झाडी की तरफ जाणे लगी l थोडी ही देर में वह गाडी जंगली एरिया मे घुस गई l वहा पर जंगल से नजदीक एक फार्म हाऊस था l वहा पर वह गाडी घरी गई l वाहा पहुंचने के बाद उन्होंने सौमित्र को उठाकर फॉर्म हाऊस के पीछे के रास्ते से उसे ले जाकर एक कमरे मे पटक दिया l अब सौमित्र को लगा की अब यहा से बचना मुश्किल होगा l वाहा पर और दो आदमी थे l वह राह ही देख रहे थे l सौमित्र को एक कमरे मे बंद करके वह कामयाबी का जश्न मनाने दुसरे कमरे मे चले गये l वाहा पर जाकर वे शराब पिणे लगे l सौमित्र को उनकी सभी बाते सुनाई दे रही थी l उनकी बाते सुनकर सौमित्र ने जाना की यह लोग उसका अपहरण करके उसके पिताजी से पच्चास लाख रुपये की वे फिरोती मांगणे वाले है l उन मे से एक ने किसी को फोन किया और सभी जाणकारी दे दी l बाद में कूछ देर बाद उनमें से दो वहा पर रह गये l और तिन बाहर चले गये l गाडी जाणे की आवाज सनाई दी l वह थोडा डर गया l उसके मन मे अनेक प्रश्न उमटणे लगे l उसने कई बार अखबारों मे पढा था l और टिव्ही पर भी समाचार मे देखा था l की अगर इन अपहरण कर्तावों की मांग पूरी नहीं की तो जिसका अपहरण किया है l उसे मारकर कही एकांत जगह पर फेक देते हैं l यह सोचकर वह डर गया l डर के मारे उसको पासिना आने लगा l इतने मे कमरे का दरवाजा धाड से खुला और एक आदमी अंदर आया l उसने सौमित्र के मुह की पट्टी खोली और एक पकोडा सौमित्र के मूंह मे ठूस दिया l उसने किसी तरह से वह खाया l उसे हीचकिया आणे लगी l तब उसने थोडे पाणी की मांग की,तब उस आदमी ने थोडा पानी पिलाया l और अंदर धकेलकर वह दरवाजा बंद करके चला गया l उस आदमी के मुह से शराब और बिडी की बास आ रही थी l

इधर सौमित्र स्कूल से नहीं आने पर उसके घरवाल चिंतित हो उठे l उन्होंने आस पडोस और स्कूल तथा उसके दोस्तों से पूछताज की, लेकीन कूछ पता नहीं चला l तब वह पुलिस स्टेशन जाणे के लिये तयार हुवे l तभी घर में मोबाइल की रिंग बजने लगी l तब सौमित्र की मां ने कॉल रिसिव्ह किया l तब उस ओर से किडन्यापर बोला, “ देखो तुम्हारा बच्चा हमारे कब्जे मे है l अगर उसकी खैरियत चाहते हो तो पचास लाख रुपये तयार रखणा l अगर थाने मे रपट लिखाई या किसी से कूछ कहा l तो याद रखणा l बच्चा नहीं उसका सिर् मिलेगा l”

फोन बंद हो गया l सौमित्र की मां उसकी बाते सुनकर फूट फुटकर रोने लगी l उसने वह बाते अपने पती और ससुर को बताई l सभी को चिंता होणे लगी l तब दादाजी ने उन्हे भरोसा दिलाया l

दुसरे दिन फिर उसका फोन आया l तब दादाजी ने फोन उठाया l उससे वह बाते करने लगे l और बोले हम अपने बच्चे की आवाज सूने बिना कैसे जान ले की वह हमारा बच्चा है l तब उसने कमरे से घसिटते हुवे फोन के पास ले आया l उसके हात में फोन देकर बोलणे को कहा l, जब दादाजी ने सौमित्र की आवाज सुनी l तब वह बोले, “मेरे शिकाये गये पर गौर करो l डरो मत तुम, साहस जुटावो, मै कूछ करता हुं l”

तभ् उस अपहरण कर्ता ने फोन छिन् लिया और वह बोला की बच्चे की सलामती के लिये कल श्याम तक हनुमान टेकडी के घने जंगल मे लाल रंग का धागा बांधे हुवे बरगद के पेड के नीचे रुपये की बॅग रख आणा l अगर होशियारी की तो बच्चे के तुकडे दुसरी बॅग मे मिलेंगे l उसने फोन रखा l

सौमित्र के पापा रुपये का इंतजाम करने में लगे थे l लेकीन रक्कम बहुत बडी थी l इतना रुपये का इन्तजाम करना कोई साधारण बात नही थी l

इधर जब से दादाजी से बाते हुई l तब से दादाजी ने कहे लब्ज सौमित्र के कान मे गुंजने लगे l जब वह कमरा बंद करके बाहर गये l तब सौमित्र ने थोडी देर ध्यान किया l उसने दादाजी जो शिकाते थे वह याद किया l उस कारण उसके दिमाग से वह डर निकल गया l और उसकी मती स्थिर और शांत हो गई l उसके बाद उसका दिमाग गाडी के पहियों जैसा घुमणे लगा l उसके दिमाग में विधायक विचारों की श्रृंखला खडी होने लगी l उसने अपहरण की बाद की घटनाओं को याद किया l तब उसके दिमाग में भाग जाने का खयाल आने लगा l उसे अपने चौथी कक्षा का छत्रपती शिवाजी महाराज का पाठ याद आया l की छत्रपती शिवाजी महाराज औरंगजेब की कैद से कैसे छुटे थे l उसे प्रेरणा मिली l थंडे दिमाग से वह योजना बनाने लगा l

उसने उनकी हरकत देखी थी l रात के वक्त यह लोग शराब मे तर्र होते है l और कमरे की तरफ नही आते l तो रात को ही वह यहा से भागेगा l उसने पुरे कमरे का जायजा लिया तब उसे ध्यान में आया की बाथरूम की व्यवस्था में एक काच की खिडकी है l वहा से आसानी से वह जा सकता है l

रात का खाना देने के बाद वह लोग कमरा बंद करके चले गये l थोडी देर मे वह शराब पिकर् तर्र हुए l सौमित्र ने अपने आप को रस्सी से किसी तरह छुडा लिया l और अपने मुह से वह कपडा निकाला l और जोर की सास ली l उसके बाद अपने पैर के शूज के लेस अच्छी तरह से बांधे l और उसने दादाजी ने पढाये हुवे उपक्रम को याद किया l दादाजी ने बिना पैर की आवाज किये कैसे चलना है वह सिखाया था l वह बाथरूम की तरफ गया l बाथरूम का दरवाजा धीरे से खोला l बाथरूम मे जाणे के बाद उसने दरवाजा बंद किया l और बाथरूम के खिडकी के नये बनाये उपर नीचे करने वाले काच निकाल कर राख दिये l उसने बाहर झाका तो उसे बाथरूम का पाईप दिखाई दिया l उसने पूरी पाईप का जायजा लिया l उपर से नीचे तक कैसे जा सकता है यह जाच लिया l चांद के प्रकाश में उसने वहा से उतरणे का सोचा l और वह खिडकी से बाहर निकला और पाईप को पकडकर बंदर जैसा चढना और उतरना जो दादाजी ने सिखाया था उस प्रकार से वह पाईप से नीचे उतरा l और पैर का आवाज किये बिना वह कूछ दूर गया l और वाहा से फिर भागकर कूछ अंतर चला गया l अंधेरे के कारण कूछ दिखाई नहीं दे रहा था l थोडी देर चलने के बाद उसे दादाजी की बाते याद आई l उन्होंने कहा था, की जब हम अकेले होते है l तब हमे आस पास के वस्तूवों का इस्तेमाल करना चाहिए l और हमारा रास्ता हमे ही बनाना चाहिए l अंधेरे मे चलना बडा ही कठीण हो रहा था l तब उसके हात मे घडी थी l जो रोशनी दे सकती थी l जिसमे लाईट थी l उसने उसका प्रकाश ऑन किया l और वह चल पडा l जाते वक्त उसके दिमाग में विचार आया l की जब इन लोगो को मै भागा हुं l यह पता चलेगा l तब वे मेरी तलाश करेंगे तब वह मुझे सिधे रास्ते धुंडेगे l अब क्या करें? इतने में उसे अपने चौथी कक्षा का पाठ याद आया l की छत्रपती शिवाजी महाराज औरंगजेब बादशहा के चंगुल से कैसे छुटे l तब उसने सोचा की सिधे रस्ते नही तेढे रस्ते जाना होगा l तब वह जंगल की तरफ मुडा और जंगल मे घुस गया l अब उसने ध्यान से चलना शुरू किया l बारीकी से देखकर वह अंधेरे मे सतर्कतता से वह चलने लगा था l थोडी थोडी चांद की रोशनी से अब दिखाई देणे लगा l

तो उसने अब आकाश की तरफ देखा l तब दादाजी ने ग्रह, तारो के बारे में जो पढाया था l वह उसे याद आया l उसने उस से दिशाओ के बारे मे जाचा l और उसे वह अपहरण कर्ता किस दिशासे लेकरं आये l यह अंदाज लगाया l और अपना मार्ग तय किया l अब वह नौ बजे से लेकरं लगातार पांच घंटे चल रहा था l उसे थोडी थकान लग रही थी l इसलिये उसने आराम करने की सोची l और उसने एक पेड को अच्छी तरह से जांचा l और उसपर वह चढ गया l और उसके बडे खोड पर बैठ गया l अपने हात की घडी में अलार्म एक घंटे का लगाया l और वह सो गया l एक घंटे बाद उसकी जब घडी अलार्म करने लगी l तब उसकी निंद खुली l घडी मे रात के तीन बजे थे l अब वह थोडा फ्रेश हो गया था l अब फिर से उतरकर उसने चलना सुरू किया l जंगल के उपरी क्षेत्र में वह पहाडी पर चला गया l तब तक सवेरा होने का समय हो चला था l पुराब की ओर प्रभा होने लगी थी lवहा पर जातेवक्त उसे लगातार चलने से बहुत भूक लगी थी l इसलिए उसने इधर उधर देखा l की शिशिर ऋत के कारण बहुत सारे पेडो के पत्ते गिर गये थे l कूछ पेडो पर नये पत्ते और बहर आने लगे थे l उसके ध्यान में आया l की दादाजी उसे हर दिन रात के समय कूछ ना कूछ पढने को जबरन बिठाते थे l एक दिन जंगली पेडो के बारे मे लिखी किताब उन्होंने पढणे को दी थी l उसमे हर एक पेड की जाणकारी और उसके बारे मे लिखा था l वह उसने पढा था l तो उसने निरीक्षण किया l और कूछ पेड के पत्ते निकाले और वह खा गया l उसके बाद उसने जंगली नाले का पानी पिया l और आगे निकल वह पहाडी पर आया l भगवान की दया से अब तक का सफर अच्छा हुवा था l पहाडी पर खडे होकर, उसने वहा से सभी ओर देखा , तो दूर एक जगह उसे धुवां उठता दिखाई दिया l उसने स्कूल मे पढा था l की जहाँ पर धुवां होता है, वही विस्तव याने आग होती है l और आग जहा वहा पर मनुष्य यह सोचकर उसने फिर बारिकी से देखा, और वहा पर बस्ती होने का अंदाज लगाया और वह उस दिशा की ओर चलता गया l

६)साहस


 थोडी देर बाद वह उस धुवे की जगह तक पहुंचा l जो घने जंगली इलाके मे बसा हुवा था l उस इलाके मे एक आदमी गावं के नजदीक दिखाई दिया l तब सौमित्र ने वहा के बारे मे उससे पूछताज की तब उसे यह पता चला की वह रहणेवाला शहर यहा से पच्चास किलो मिटर दूर है l तब सौमित्र ने पूछा यहा पर नजदीक का शहर कोणसा है l तब उस आदमी ने नजदीक वाले बडे गाव के बारे मे बताया l उसने सौमित्र के बारे मे पूछताज करने की कोशिश की लेकीन सावधानी के लिये सौमित्र ने वह कॅम्प के लिये आया था l और रास्ता चूक गया है l येसा कहकर वह आगे गावं के नजदीक गया l तब उसे गावं से नीचें बडे रास्ते की तरफ जाणेवाला रास्ता मिल गया l वह उस रस्ते से चल पडा l आगे एक नुकड पर एक मंदिर दिखाई दिया l वह वहा पर चला गया l वहा एक शिव मंदीर था l वाहा पर जाकर उसने शिवलिंग को प्रणाम किया l शिवलिंग को देखकर उसे दिशा का ज्ञान हुवा l वह आगे बड गया l इधर उधर के निशाण देखते हुवे वह आगे बढता रहा l

इधर उन अपहरण कर्तावो की नशा उतर गई थी l सवेरा होकर बहुत देर हो गई थी l सूरज की रोशनी से वह जाग गये l उसमे से एक सौमित्र को देखने आया l उसने देखा की सौमित्र वाहा पर नहीं है l उसने फिर बाथरूम मे जाकर देखा l फिर वह जोर से चिल्लाया l उसने अपने साथियों को हाक दी l आवाज सुनकर उसके साथी अंदर रूम मे चले आये l जब सौमित्र भाग गया है l यह जब पता चला तब वह इधर उधर धुंडणे लगे l पुरा फार्म हाऊस धुंद l उसके बाद वह गाडी लेकरं रास्ते पर धूंडणे लगे l उन्होंने सोचा की शहरी लडका है l जायेगा कहा कही रस्ते मे मिल जायेगा l और वह इधर उधर धुंडते रहे l

इधर सौमित्र जंगली ईलाके से जंगली प्राणीयो से बचते हुवे वह एक नदी के तट पर पहुंच गया l उसे बहुत प्यास लगी थी l उसने नदी के पानी को निहारा l फिर थोडासा पानी पिया l और उसने नदी के प्रवाह को जाच नदी मे पानी कम था l तो उसने नदी के रास्ते जाणे का सोचा, ताकी वह लोग ढुंड न पाये l और एक नदी मे बहकर आई हुई एक लकडी ली l और नदीके रस्ते वह चल पडा l रास्ते मे नदी के किनारे मिलने वाले पेडों को निहारकर उसके पत्ते , मोहर खाकर वह आगे चलता गया l थोडी देर में उसे आगे चलते हुवे एक पूल लगा l वह एक बडे राहते का पूल था l वह उस राहते के किनारे से आगे की गावं तक पहुंचा गया l इतना चलकर भी उसे थकान नही लगी थी l क्यो की उसके दादाजी उसे हर दिन दौड लगवाते थे l

थोडीही देर में वहा से एक बस गुजर रही थी l वह बस के पीछे भागकर पीछे की सिडी पकडकर उसके ऊपर चढ गया l

सिडी से ऊपर जाकर लगेज रखने वाले रॅकेट मे जाकर जगह बनाकर सो गया l वह बस मजल दरमजल करते हुवे नजदीक वाले शहर राजापूर चली गई l राजापूर स्थानक पहुंचते ही सौमित्र बस स्टॉप पर उतर गया l और उसने शहर के थाने के बारे मे पूछताज की, और वह थाने की तरफ चला गया l वहा पर जाकर उसने पुलिस को सारी हकिकत बयान की l उसके बाद थाने के आफिसर ने सौमित्र के शहर वाले थाने से संपर्क किया l सौमित्र के पिताजी रुपयों का इंतजाम कर रहे थे l इतने मे एक हवालदार उनके घर आया l और सौमित्र के बारे मे जाणकारी दे दी l सौमित्र के कहे अनुसार राजापूर पोलीस हरकत मे आये l जाच पडताल करके उन्होंने उन अपहरण कर्तावो को पकड लिया l पहले तो उन्होंने गुनाह कबुलने से इनकार किया l लेकीन जब पुलिसने खाकी रवय्या दिखाया l तो उन्होंने सब कबूल किया l पूछताज के बाद पता चला की यह सब कुछ उनके दुकान के कर्मचारी रजत शर्मा का किया धरा है l पुलिस ने रजत शर्मा को पकडकर उस पर कार्यवाही की l उसे जेल में डाल दिया l अपने नाती का साहस देखकर दादाजी को बडा संतोष हुवा l अनेक सेवा मंडल तथा संस्थांवोंने सौमित्र का सत्कार किया l तबसे सौमित्र किसी के भी ऊपर बिना परखे आंख मुंद कर भरोसा नहीं करता था l दादाजी के प्रती उसका आदर अब कूछ जादा ही बढ गया था l उस दिन के बाद वह कसरत, खेल कुद तथा अन्य उपकर्मो मे खुद ही शौक से सहभागी होणे लगा l और पढाई मे भी अव्वल आने लगा l अब दादाजी को यह लगता की सौमित्र भले ही फौज मे भरती हो या ना हो उसने अपने भविष्य के लिये अपना जीवन बिताने के लिये आवश्यक उपयुक्त शिक्षा ली है l वह अपने राह का एक कुशल, सशक्त ज्ञान से संपृक्त फौजी बना हुवा हैं l

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Thursday, April 11, 2024

५) अतिथ्य कोकण का?

 ५) अतिथ्य कोकण का?



महाराष्ट्र राज्य के पश्चिम सागर किनारे स्थीत घनी झाडीयों में सह्याद्री पर्बत के दरो में अनेक गाव बसे हुवे है l वहा के लोग बडे ही प्यारे नारीयल के पानी के भाती अपर से कडक अंदर से मुलायम है l वहा के प्रदेश के दो अंग है l एक का नाम वलाटी जो सह्य पर्वत से लगा हुवा पहाडी प्रदेश है l और दुसरा भाग है खलाटी , जो सागर के नजदीक है l वाहा के वलाटी नामक क्षेत्र मे बहुत जादा बारिश होती है l इस कारण जमीन की पानी के कारण धूप होती है l इस करणं वहा की जमीन बहुत कम सकस है l वहा पर आम, काजू के बगीचे पहाड के ढलान पर मिलेंगे l वहा पर चावल, नागली की फसल पकाई जाती है l घाट प्रदेश से आनेवाली सब्जी और समंदर के इलाके से आई मच्छी l और जो रुखा, सुखा मिल जाये l वह खाकर यहा के लोग गुजारा करते है l बहुत मेहनत करने के बाद ही यहा पर फसल मिलती है l यहा के घर जादा तो खेतो मे ही हैं l दो घरो के बीच पाव किलो मीटर का फासला होता है l घरो के आसपास खेंती और बाग होती है l ऐसे ही दरे मे बसा हुवा एक गाव वांजोली, वहा पर राजू नाम का लडका अपनी मां और बहन के साथ रहता था l उसके पिताजी पैसा कमाने के लिये मुंबई गये थे l यहा के लडके जादा तो सातवी – आठवी तक ही पढते l उसके बाद मुंबई चले जाते l कूछ दिन बाद गाव को लौट के आते l और हिंदी, अंग्रेजी मिक्स मराठी बोलते l तब उन्हे लगता की उन्होंने आसमान के तारे तोडे हो l

राजू के पिताजी भी मुंबई मे एक उपहारगृह मे काम करते थे l दो चार मास के बाद गाव लौट आते l लाई हुई कमाई कब खत्म् हो जाती पता ही नहीं चलता l फिर रुपया कमाने के लिये फिर शहर की तरफ दौड सुरु हो जाती l शहर मे रहणे की मारामार होणे के कारण अपने साथ परिवार ले जाना कठीण था l इसलिये घरवाले सभी गाव में रहते थे l राजू के घर का खर्च उसकी माँ किसी तरह से चला लेती थी l एक दिन राजू की मां हर दिन की तरह घर का काम करके दुसरे के खलिहान में काम के लिये चली गई थी l राजू आम् के बगीचे मे अपने मित्रों के साथ खेल रहा था l

५) अतिथ्य कोकण का?


तभी उसकी सुशीला  बहण ने उसे आवाज लगाई, “ भैया ओ भैया इधर आवो l कोल्हापूर के काका आये है l”

राजू उसकी आवाज सुनकर उसकी तरफ खेलना छोडकर चला गया l वह बोला, “ थोडी देर खेलने दो ना, कूछ चायवाय पिलावो ना l”

तब वह बोली, “ अरे, चाय कैसे पिलाये l घर में चायपत्ती भी नहीं है l और तुम तो जाणते हो ना की पिछले दो महिनो से पिताजी ने एक रुपया भी नही भेजा l इसलिय तो मां दुसरे के खेत मे काम के लिये गई है l तुम तो अब बडे हो l

पिताजी के गैर हजरी में तुम्हे ही घर का ध्यान रखणा है l घर में अतिथी आये और उनकी खातिरदारी ना हो तो हमारी नाक कट जाएगी l और यह काका तो मामा के गावं मे जाकर डिंगे मारे बिना नहीं रहेगा l हमेशा ही हमारे पिताजी को बुरा भला कहने के लिये अवसर देखता है l

उतने में राजू और उसकी बहण सुशीला को पुकारने की आवाज सुनाई दी l वे लोग घर की तरफ भागते हुवे आये l

उन्हे देखकर काका बोला, “ अरे कितनी देर हो गई है l मुझे यहा पर आये हुये l और तुम लोग हो जो इधर उधर घूम रहे हो l तुम्हरी मां किधर है l

सुशीला बोली, “काकाजी मां तो काम करणे के लिये पडोस के साऊताई के खेत मे काम करणे के लिये गई है l”

काका बोले, “ क्या? काम करणे के लिये l कब आयेगी? मुझे तो वापस जाना है l”

 राजू बोला, “ क्या वापस जाना है l लेकीन कैसे जाओगे l श्याम होणे आई है l और जादा तो गाडिया इधर नहीं होती l अब रात को ही आयेगी l”

“ चलो न काका , घर में, मै तुम्हारे पैर धोणे के लिये पानी लाती हुं l” सुशीला बोली और वह अंदर गई l और पानी लाके काका को दे दिया l

काका ने हात पैर धोये l राजू ने टॉवेल दिया l और काका ने हात पैर पोंछे और वह बाहर वाले कमरे में आ गया l उनके बैठणे के लिये पथारी बिछाई गई l काकाजी पथारी पर बैठ गये l उन्हे पिने के लिये पानी लाकर सुशीला ने दिया l और वह दोनो अंदर रसोई घर में चले गये l वहा के सभी डिब्बो में उसने झाककर देखा l एक डिब्बे में थोडासा गुड मिला l सुशीला राजू से बोली, “ भैया जाओ पडोस से कूछ चायपत्ती मांगकर ले आवो l तो राजू पीछे के रास्ते पडोस् के घर चायपत्ती मांगणे गया l पडोस में शिवाय बुढी नानी तारा के अलावा कोई नहीं था l उसने उससे चायपत्ती मांगी l तो उसने थोडी शी दे दी l राजू भागते हुवे घर आया l सुशीला ने चाय बनानी सुरू की l तब सुशीला बोली, “ अरे भैया काले रंग की चाय देना क्या अच्छी बात है l हमारी गौ अब पेट से है l इस कारण दूध नही दे सकती l अब जाकर कही से दूध ले आवो l अब राजू को लगा l की अब दूध की समस्या से कैसे उभारा जाये l

अगर फिर से तारा नानी के पास गये तो वो तो आगबबुला होगी l तो उसके ध्यान में उसका मित्र शंकर आया l वह छोटा कप लेकरं दौडते हुवे खेल की मैदान की तरफ भागा l वहा पर शंकर उसे मिल गया l उसने शंकर से थोडासा दूध लाने की बात चलाई l शंकर ने थोडी देर सोचा l और वह कप लेकर उसने खिसे मे डाल दिया l और घर की तरफ निकला l घर के अंगण मे उसकी दादी अनाज सुकाने के लिये डालकर अपने पडोसन के साथ गप्पे लडाते हुवे बैठी थी l जैसे ही शंकर घर के आंगण से गुजरते घर में जाणे लगा l तो दादी ने उसे देखा और वह बोली, “ आ गये लाड साहब, जरा तेवर तो देखो इनके, पढाई छोडकर हमेशा खेल कुद की तरफ ध्यान, आने दो श्याम को तुम्हारे पिताजी को घर, अगर मैने तुम्हारी शिकायत ना की तो मेरा भी नाम चंपा नहीं l मूर्ख कही का? खाने के लिये आगे, सोने के लिये बीच में, और कामकाज या पढाई हो तो लाडसाहब भाग खडे होते l जा मुझे मालुम है l तू खाना खाणे के लिये आया है l जा मैने पुरा खाना पेटी मे बंद करके रखा है l तुझे आज भुका ही रखूंगी l”


 दादी की बातो की तरफ ध्यान ना देकर वह घर के भीतर चला गया l रसोई घर में जाकर उसने शींके की तरफ गया l शिंके के बर्तन को नीचे उतारकर उसने झाका l उसमे थोडासाही दूध था l उसने वह कप मे ले लिया l और कप रसोई घर के पीछे की खिडकी खोलकर उसे बाहर की तरफ रखा l और खिडकी बंद कर दी l और वह घर से बाहर निकलने लगा l

तो दादीने गुसैले नजर से उसकी तरफ देखा l और वह बोलणे लगी l क्या करने आया था l देखु तो खिसे मे क्या हैं l

तब शंकर को गुस्सा आया l शंकर बोला, “तेरे अम्मा का डबोला लेने आया था l हमेशा गुस्सा करती रहती है l तू तो घर मे एक द्वारपाल के भाती है l हमपर पेहरा गाड के बैठी है l” यह कहकर शंकर घर के पीछे चला गया l उसकी बाते सुनकर दादी देर तक चपड चपड करती रही l शंकर घर के पीछे रसोई घर की खिडकी के पास आया l उसने वह कप लिया l और राजू को जाकर दे दिया l आधा कप दूध देखकरं राजू बोला, “ बस इतनासा ही.”

तब शंकर बोला, “ चुपचाप ले जा l इसके लिये मैने बहुत पापड बेले है l वो जो घर में रखा है ना वाचमेन उससे छुपा के लाया हुं l शिंकाले के बर्तन मे इतना ही था l अगर दादी को पता चलता l तो भुखी बिल्ली की तरह नोच डालती मुझे l जा जल्दी से ले जा l उसकी बाते सुनकर राजू दूध का कप लेकरं घर की तरफ निकल गया l उसके मन में प्रश्न उमड रहे थे l

की यह दूध घर से बिना पूछे लाया है l शंकर उसके चेहरे को भाप गया l और बोला, “ज्यादा सोच मत कृष्ण लीला सर्व श्रेष्ठ है l”

राजू घर दूध लेकरं आया l और उन बहण- भाई ने चाय बनाकर अपने मेहमान काका को पीला दी l काका चाय पिते ही बोला, “ अरे कैसी चाय बनाई है l बहुत फिकी है l उसका रंग भी फिका है l यहा की गाय, भैस दूध देती है या नहीं l क्या सिर्फ गोबर देती है l”

काका की बाते सुनकर बच्चों को बुरा लगा l लेकीन वह समजदार थे l वह अंदर चले आये l अंदर आकर सुशीला ने चूले के बर्तन मे रही चाय एक प्याले मे निकाली l उसका एक घुट उसने दिया l तो दुसरा अपने भाई को दिया l चाय का घुट पिकर वह बोली, “ अच्छी खासी तो बनी है l लेकीन यह काका क्यो इस तरह बाते कर रहा है l”

“ भैया कूछ भी करो मां को जाकर बुलाके लाव l”

उसकी बाते सुनकर उसने काका को आराम करने हेतू चारपाई पर इंतजाम किया l और वह चला गया अपनी मां को बुलाने l खेत मे जब वह गया तो उसकी माँ वहा पर काम कर रही थी l राजू को देख मां बोली, “ तुम क्यो आये इधर l थोडी देर बाद मै आती ना घर l कूछ काम है क्या?”

राजू बोला, “ घर में काकाजी आये है l”

तो वह बोली, “ हाय रे दय्या, अब क्या करु? घर में चायपत्ती भी नहीं है l क्या करें अब “ वह खेत मालकीण के पास चली गई l और बोली , “ क्या करें कमला बहन घर मे बहन का पती आया है l और चायपत्ती भी नहीं है l कूछ रुपये दे दो न हाजरी ही सही “

कमला ने अपने कमर को भापा और वहा से बटवा निकालकर दो दिन के काम के पैसे दिये l राजू की मां ने वह रुपये राजू को दे दिये और कूछ राशन लाने को कहा l और वह कूछ देर बाद वो आयेगी ऐसा कहकर वह काम पर लग गई l राजू रुपये लेकरं घर में आया l उसने रसोई घर में लगनेवाले चीजो की यादी बनाई और वह बनिये के पास से वह सब ले आया l” उसके बाद अपने खेत से अटहल के पेड से अटहल और कूछ करवंदे, तोरणे, लिंबोलीया यह रान का मेवा लेके आया l काकाजी को रानमेवा खाणे को दिया l काकाजी खुश हो गये , और अटहल  रसोई घर. में रख आया l सुशीलाने घर में तबतक सफाई करके पानी भरा l और वह खाना बनाने के काम मे लग गई l

उसके बाद राजू काका के पास आ गया l तबतक काका सोकर उठ चुके थे l उन्होंने राजू को एक थैली दे दी, और कहा की ए ले जाओ और खाली कर लावो l उसमे एक गुड की ढेली और थोडीशी ज्वार है l जो तुम्हारी मौसी ने दी है l उसे रख दो l काकाजी की बाते सुनकर राजू ने वह थैली अंदर ले जाकर उसमे से गुड और ज्वार निकाल के रख् आया l उसके बाद अपने मित्र को लेकरं उसने अपने बाग के नारियल के पेड के नारियल निकाल लिये l और उसका पानी निकालकर उसने काकाजी को दे दिया l नरियल का पानी पिकार काकाजी को बहोत अच्छा लगा l बच्चो ने नारीयल निकालने के लिये किया हुवा प्रयास काका जी ने देखा था l बच्चो की अतिथ्य की तडफ देखकर अच्छा लगा l

राजू ने नारियल का पानी निकालने के बाद नारीयल के अंदर का गर निकाला l और बहण सुशिला को मसाला बनाने को कहकर वह दुकान जाकर कूछ अंडे लेकरं आया l और घर में अपने बहण के हातो में थैली दे दी l शाम होने को आई थी l सुशीलाने मां के आने तक चावल  पकाये और अटहल की सब्जी बनाई l

५) अतिथ्य कोकण का?


श्याम हो गई l राजू की मां काम से लौटी l जब वह घर आई l तब उसने देखा की बच्चोने घर का जादातर काम पुरा किया है l तो उसे वह देख बडा ही संतोष हुवा l घर मे आने के बाद अपने जिजाजी से देर से आने के लिये उसने माफी मांगी l फिर अंदर जाकर हात पैर धोकर चाय फिर से बनाकर जिजा को दे दी l उसके साथ कूछ बिस्कीट भी दिये l उसके बाद वह हालचाल पुंछकर घर के काम मे लग गई l देखते देखते आठ बज गये l राजू की मां ने खाना बनाया l और राजू को काकाजी को खाना खाने को बुलाने को कहा.

राजू ने पथरी बीछाई l पानी का लोटा काकाजी को हात धोणे को दिया l फिर उनके हात पैर पोंछने को टॉवेल दिया l और खाना खाणे को बुलाया l सुशीला ने मां ने बनाई नागली की रोटी, अटहल की सब्जी, और तरह के बनाये व्यंजन परोसे l सुशीला ने बनाई हुई नरियलं की सोलकडी भी परोसी l इतना ही नहीं बगीचे के आम् की बनाई मिठी सलाद भी परोसी l काकाजी को खाना मन को भाया l वह बडे चाव से खाने लगे l बच्चों को साथ बेठणें को उन्होंने कहा l लेकीन उन्होंने मना किया l बाद में वह खायेंगे ऐसा कहा l

खाना खाते वक्त काकाजी बोले, “क्या तुम्हारा पती तुम्हे रुपये नही भेजता क्या? जो तुम काम पे जाती हो l”

 राजू की मां बोली, “ जी भेजते है की, पिछले महिने ही भेजे थे l घर की मरम्मत करवा ली बारिश के दिन आणे वाले हे ना l यहा पर तो मुसलाधार बारिश होती है l और घर पर बैठकर मेरा मन भी नही लगता तो क्या करें l घर में बिना काम के बैठकर मुफ्त की रोटीयां तोडना क्या अच्छी बात है क्या?”

काकाजी बोले, “ ए भी सई है l आदमी को हमेशा कोई ना कोई काम करना चाहिए l तभीं तरक्की होती है l”

 इधर उधर की बतियां करते करते काकाजी ने खाना खाय l और वह बाद मे बाहर की तरफ चले गये l राजू ने उनके सोने के लिये इंतजाम किया l उनके सिरहाने पानी का लोटा भी रखा l और वह खाना खाने चला गया l काकाजी वाडी मे टेहलने लगे l तबतक बच्चों ने खाना खाया l बाद में वह काकाजी के पास गये l तबतक वाडी मे टेहलकर काकाजी आये थे l बच्चोने उनसे एक कहानी सूनाने को कहा l काकाजी ने एक अच्छी पंचतंत्र की कहानी सूनाई l कहानी सून ते वक्त राजुने काका की तेलमालिश की तो सुशीला ने पैर दबाये l कहानी सुनने के बाद काकाजी सो गये l और बच्चे भी भितर सोने गये l रात के रसोई के काम निपटाकर राजू की मां भी सोने को चली गई l

सवेरा होते ही काकाजीने स्नान किया l और राजू की मां ने किया हुवा नाष्टा करके वह अपने गावं की तरफ निकल पडे l जाणे से पहले काकाजी को बच्चोने प्रणाम किया l और पुरे संतोष पूर्ण होकर काकाजी निकल पडे l बच्चे बस स्टॉप तक पहुचाने गये l गाडी आ गई l काकाजी ने कूछ रुपये बच्चो के हात पर रखें l और वह गाडी में चड गये l गाडी निकल पडी l बच्चो ने टाटा किया l

५) अतिथ्य कोकण का?


गाडी मे बैठकार काकाजी के दिमाग मे खयाल आया l की हम इन्को तुच्छता पूर्ण नजरिये से देखते हुवे भी बच्चो ने मेरा ठेहराव अच्छी तरह किया l अगर में अपने बहण के घर गया l तो उसके बच्चे मुझे पानी तक ना पुछते l और ये बच्चे अपने घर मे मेहमान आये l तो जो भी रूखा सुखा हो वह देकर उनका आदरातिथ्य भली भाती करते है l गरीब हुवा तो क्या हैं l उनकी मेहमान का अतिथ्य करने की रीत तो अमिरो को भी ना आयेगी l ऐसा कहकर वह अपने गावं कोल्हापूर की तरफ चले गये l

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Wednesday, April 3, 2024

४) उजाले की ओर

 ४) उजाले की ओर

४) उजाले की ओर


निर्मलाजी का जन्म एक मध्यमवर्ग स्तर के परिवार मे हुवा l जन्मतहा वह एक बुद्धिमान लडकी थी l दिमाग तेज होने के बावजुद भी उसे उसके योग्य शिक्षा नहीं मिली l वह चाहती तो एक डॉक्टर या इंजिनीयर बन सकती थी l स्कूल मे हमेशा सबसे उच्चतम गुण पाती थी l लेकीन घर की आर्थिक स्थीती अच्छी ना होणे के कारण उसके प्रतिभा योग्य शिक्षा न मिल सकी l उसने फिर कला शाखा मे शिक्षण लेते हुवे एक स्कुल टीचर का कोर्स किया l वहा भी वह टॉप पर थी l इस कारण उसे जल्द ही एक स्कूल मे अध्यापिका की नोकरी लग गई l पढाई करते वक्त ही उनकी शादी हो गई l उनका घरबार ठीक था l उनके पती एक मेकॅनिक थे l उनके साथ काम करने वाले लोग कहते की आप एक टीचर होकार एक मेकॅनिक से शादी कैसे की आप इतनी सुंदर है l कोई ना कोई अच्छा अध्यापक मिल ही जाता l तब उनका दिया हुवा जवाब बडाही मार्मिक था l वह काहती के मेरा पती मोटर मेकॅनिक है तो क्या हुवा l है तो एक डॉक्टर ही ना l जिस तरह एक डॉक्टर रुग्ण को ठीक करता है l उस प्रकार बिगडी गाडीया मेरा पती ठीक करता है l वह हर वक्त हसी खुशी रहती थी l हर दम चेहरे पर मुस्कुराहट रहणे के कारण उनसे बाते करने में कईयों को आनंद मिलता था l बडे बुजुर्गो से लेकरं छोटे बच्चे भी उन्हे मास्टर जी ही बुलाते थे l


स्कुल मे हमेशा कूछ तो मनमुटाव होता ही है l कई स्कुल संस्थापक के बगल बच्चों की साजीश के कारण उनकी बदली शहर के नजदीक वाले स्कूल के उप विद्यालय मे करवा दी l वह उप विद्यालय शहर के नजदीक बिखरी हुई मजदूरों की बस्ती के नजदीक था l वहा के मजदुर के लडके बहुत ही चलाख थे l उनमे बुध्दीमत्ता कुट कुटकर भरी थी l वह एसी मिट्टी के बने थे, की जो बहुत ही उपजाऊ या मुलायम हो l लेकीन आजतक उन्हे योग्य आकार देणेवाला कोई कुम्हार या किसान नहीं मिला था l निर्मलाजी की जब वहा नियुक्ती हो गई l तब उसने देखा l स्कूल की इमारत बहुत बेचिदा हालत में हैं l लेकीन उसे वहा ही पढाना होगा l पहली दफा जब वह दसवी कक्षा के वर्ग मे पढणे गई l जब कक्षा मे प्रवेश किया l तब टेबल के नीचे बच्चोने फटाके फोड दिये l जिस कारण उनकी साडी पर कई ठीकरे गये l और वह थोडी जल गई l जब हेडमास्तर जी को यह बात पता चल गई l तब वह छात्रो को शिक्षा करने हेतू पधारे l तब निर्मला जी ने उन्हे रोका l

और कहा कूछ नहीं सर, ये तो छोटे बच्चे है l तब हेडमास्तर जी बोले, “ मॅडम इन लोगो की कर्तुत को नजर अंदाज ना करो l इनका बरताव खुंकार बिगडे जानवरो के भाती है l उनके कारण इस स्कूल का नाम खराब हो गया है l इनके तेवर बहुत ही बुरे है l लकडी के बिना उनकी मकडी ठीक नहीं होगी l


निर्मलाजी हेडमास्तर की बातो से सहमत नहीं थी l उन्हे लगता बच्चे तो बच्चे होते है l खेल कुद् की उम्र मे अगर शैतानी नहीं करेंग तो क्या बुढापे में करेंगे l लेकिन वह चुप्पी साद के बैठ गई l कूछ ही दिनों मे निर्मलाजी ने अपने अध्यापन और स्कूल के इतर कामो में अपना कौशल्य दिवाकर बचौ पर छाप बनाई l उन्होंने मन में ठाण ली की वे इस स्कूल के बच्चो में ऐसा बदलाव करेंगी l और उन्हे उन्नती के कगारपर उच्चतम स्थान पर खडा करेंगी l के सभी ओर उनकी तरक्की के चर्चे ही चर्चे होंगे l


इसकी पहली मंजिल की सिडी का पहला पाव उसने स्कूल की मरम्मत से सुरु किया l अध्यापक, छात्र की एकजूट करके चंदा मांगकर उन्होंने स्कूल की हालत सुधार दी l स्कूल के मैदान में अलग अलग कुशलता बढाणे हेतू बदल किये l स्कूल के बच्चों का मानस टेस्ट किया l उनके अंदर छिपे गुणों को भाटकर उसके अनुसार शिक्षा देणी शुरू की l सुंदर हस्ताक्षर होणेवाले बच्चो की मदत से स्कूल की दिवारे पेंट करके उनपर अध्ययन के डिजिटल रूप दिये l


निर्मलाजी को मानसशास्त्र विषय में बहुत ही रुची थी l वह छात्र देखकर उसकी मानस स्थिती समजती थी l हर इतवार के दिन वह बच्चों के लिये महत्त्वपूर्ण तासिका लेती थी l बच्चों को व्यावहारिक कुशलता, तथा व्यवसाय प्रशिक्षण, व्यापार, अर्थ का नियोजन इस प्रकार का ज्ञान देती थी l इसके लिये संगणक का इस्तेमाल करके उन्हे दुनिया के बाजार मे हम कैसे आगे बढे उसके बारे मे ज्ञान देती थीl उनके इस तरीके के पढाई के कारण उनके स्कूल के बच्चों ने बहुत तरक्की की, स्कूल के बच्चे हर क्षेत्र मे चमकणे लगे l बच्चे उन्हे मास्टर जी के नाम से बुलाने लगे l


स्कूल के कूछ अध्यापक को निर्मलाजी के प्रति बच्चों का स्नेह देखकर जलन होती थी l

वो हर वक्त उनके उपक्रमो में कूछ गलतिया मिलती है क्या? हर वक्त धुंडते रहते थे l उनमें से एक थे महेंद्र सिंग वह एक रईस घराणे मे से थे l उनको नोकरी संस्था के कोटे से लग गई थी l वो स्कूल मे चमचमाती कार मे बैठकर आते थे l हर दिन नया कुर्ता, घडी, अलग स्टायल का गॉगल लगाके आते थे l स्कूल के बच्चों से दुरी बनाके ही रहते l पढाना तो नहीं आता था l लेकीन बडी बडी डींगे हाकता था l निर्मलाजी से हरवक्त झगडता रहता l एक दिन जोर की बहस हो गई l बात मुख्य हेडअध्यापक तक पहुंची l तब हेड अध्यापक ने निर्मलाजी के तरफ से बोलते हुवे कहा, “ सर जी पहले आप पढाना सिको l ए सुट बूट पहनकर शायनर मत बनो l निर्मलाजी नही होती तो आज इस स्कूल को ताला लग जाता l ये ध्यान में रखो l”

तब वह गुस्सा होके वहा से निकल गया l उसका बदला लेने की उसने ठाणी l और एक दिन रात के वक्त स्कूल मे डुपलिकेट चाविया बनाकर उसने निर्मलाजी के खाने से उनके उपक्रम की फाईल चुराकर ले गया l और उसे जला दिये l दुसरे दिन जब पता चला की निर्मलाजी के लोकर में चोरी हुई है l तब बच्चो ने भाप लिये की उसके पीछे किस लोमडी का दिमाग है l उनमे दसवी छात्र के बच्चे बहुत ही चिडे थे l उन्होंने महेंद्र सर को सबक सिखाने की ठाणी l और वह सवेरे टेहलणे जाते थे l उस वक्त कूछ बाहरी अपने दूर के मित्रों को बुलाकर उसे टेहलने गये वक्त आकेला पाकर उसकी पिटाई की उस दिन से उसका व्यवहार बदल ही गया l क्यो की वह अब जान चूका था l की उसके पीछे कोण होगा l


साल पर साल बितते गये l स्कूल मे निर्मलाजी ने अनेक उपक्रम चलाये थे l कूछ सालों बाद निर्मलाजी अब रिटायर हो गई थी l एक दिन वह अपने परिवार के साथ घुमने के लिये एक किल्ले पर गये थे l किल्ले की सैर करके वह जब लौट रहे थे l तब रास्ते में एक भेल का ठेला उन्होंने देखा l वहा पर बहुत भिड थी l वो भी भेलं खाने के लिये रुके l एक लडका आकार भेल् देकर चला गया l भेल खाकर वह उसके पैसे देने के लिये ठेले के पास गई l तब ठेले के पास रुपये लेनेवाले लडके ने उनसे भेल के पैसे लेने से इन्कार किया l और उनके पैर उसने छुये l और वह बोला , मॅडम आपने मुझे पेहचाना नहीं l”


निर्मलाजीने अपने आंखों का ऐनक ठीक किया l और गौर से देखा l एक सुंदर युवक उनके सामने खडा था l

वह बोला, मॅडम मे अशीश आपका छात्र, जिसे आपने जीने की कला शिकाई l आप जो इतवार के दिन जादा तासिका लेकरं हम बच्चो को व्यवहार कुशल उद्योग के बारे में पढाती थी l उस कारण मेरे जैसे कई छात्र आज अपने पैरो पर खडा होकर स्वावलंबन से कमाई कर रहे है l”

४) उजाले की ओर


निर्मलाजी ने उसे पहचाना l फिर भी वह अपने भेल के पैसे देने लगी l लेकीन उसने लेणे से मना किया l निर्मलाजीने उसे आशीर्वाद दिया l और वह चल पडी l निर्मला जी आज बहुत खुश थी l उन्होंने जो उपक्रम स्कूल के नाकरा कहे गये बच्चों के लिये चलाया l वह अब यशस्वी हो गया था l उन बच्चो के लिये निर्मलाजी एक सुरज देवता की तरह थी l जिस प्रकार सूरज अपने असंख्य अंशू से सारी वसुंधरा प्रकाशमय बनाता है l उस प्रकार अपने किय गये उपक्रम से अनेक बच्ची के जीवन मे उजाला निर्मलाजीने लाया था l अपने घर की तरफ जाते वक्त गाडी मे उन्हे एक सुकून सा लग रहा था l उन्होंने बच्चों को उजाले की ओर जाने की राह दिखाई थी l महात्मा गांधीजी का मुलोद्योगी शिक्षा का उपक्रम जो निर्मलाजी ने चलाया था l वह अब यशस्वी हो गया था l


उस प्रकार ही निर्मलाजी की सोच थी l वे कहती ती की जो शिक्षा आपमे विनम्रता, साहस, स्वावलंबन और दो वक्त की रोटी कमाने का ज्ञान दे lवह सही शिक्षा है l

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